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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 558 में से

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पृष्ठ 281
  • ३।३७ § ४३७ ] तृतीयोऽध्यायः १६९
    विज्ञातव्याः । तथा कालोदेऽपि वेदितव्याः । त एतेऽन्तद्वीपजा म्लेच्छाः । कर्मभूमिजाश्च शक-
    यवनशबरपुलिन्दादयः ।
    § ४३६. काः पुनः कर्मभूमय इत्यत आह—
    भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरुत्तरकुरुभ्यः ॥३७॥
    § ४३७. भरता१ ऐरावता विदेहाश्च पञ्च, पञ्च, एताः कर्मभूमय इति व्यपदिश्यन्ते । तत्र ५
    'विदेह'ग्रहणाद्देवकुरूत्तरकुरुग्रहणे प्रसक्ते तत्प्रतिषेधार्थमाह—'अन्यत्र देवकुरुत्तरकुरुभ्यः' इति ।
    'अन्यत्र' शब्दो वर्जनार्थः । देवकुरव उत्तरकुरवो हैमवतो हरिवर्षो २रम्यको हैरण्यवतोऽन्तद्वीपाश्च
    भोगभूमय इति व्यपदिश्यन्ते । अथ कथं कर्मभूमित्वम् । शुभाशुभलक्षणस्य कर्मणोऽधिष्ठानत्वात् ।
    ननु सर्वं ३लोकत्रितयं कर्मणोऽधिष्ठानमेव । तत एवं ४ प्रकर्षगतिर्विज्ञास्यते, प्रकर्षेण यत्कर्मणोऽधि-
    ष्ठानमिति । तत्राशुभकर्मणस्तावत्सप्तमनरकप्रापणस्य भरतादिष्वेवार्जनम्, शुभस्य५ च सर्वार्थ- १०
    सिद्ध्यादि६स्थानविशेषप्रापणस्य कर्मण उपार्जनं तत्रैव, कृष्यादिलक्षणस्य षड्विधस्य कर्मणः
    पात्रदानादिसहितस्य तत्रैवारम्भात्कर्मभूमिव्यपदेशो वेदितव्यः । इतरास्तु दशविधकल्पवृक्षकल्पित-
    भोगानुभवनविषयत्वाद् भोगभूमय इति व्यपदिश्यन्ते ।
    एक पल्यप्रमाण है । ये चौबीसों अन्तद्वीप जलकी सतहसे एक योजन ऊँचे हैं । इसी प्रकार कालोद
    समुद्रमें भी जानना चाहिए । ये सब अन्तद्वीपज म्लेच्छ हैं । इनसे अतिरिक्त जो शक, यवन, शबर १५
    और पुलिन्दादिक हैं वे सब कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं ।
    विशेषार्थ—षट्खण्डागममें मनुष्योंके दो भेद किये गये हैं—कर्मभूमिज और अकर्मभूमिज ।
    अकर्मभूमि भोगभूमिका दूसरा नाम है । भोगभूमिका एक भेद कुभोगभूमि है । उसमें जन्म लेनेवाले
    मनुष्य ही यहाँ अन्तद्वीपज म्लेच्छ कहे गये हैं। शेष रहे शक, यवन, शबर और पुलिन्द आदि म्लेच्छ
    कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं । इसी प्रकार आर्य भी क्षेत्रकी अपेक्षा दो भागोंमें विभक्त हैं-कर्मभूमिज आर्य २०
    और अकर्मभूमिज आर्य । तीनों भोगभूमियोंके मनुष्य अकर्मभूमिज आर्य हैं और कर्मभूमिके आर्य
    कर्मभूमिज आर्य हैं । इनमें-से अकर्मभूमिज आर्य और म्लेच्छोंके अविरत सम्यग्दृष्टि तक चार
    गुणस्थान हो सकते हैं किन्तु कर्मभूमिज आर्य और म्लेच्छ अणुव्रत और महाव्रतके भी अधिकारी
    हैं । इनके संयमासंयम और संयमस्थानोंका विशेष व्याख्यान लब्धिसार क्षपणासारमें किया है ।
    § ४३६. कर्मभूमियां कौन-कौन हैं, अब इस बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २५
    देवकुरु और उत्तरकुरुके सिवा भरत, ऐरावत और विदेह ये सब कर्मभूमि हैं ॥३७॥
    § ४३७. भरत, ऐरावत और विदेह ये प्रत्येक पाँच-पाँच हैं । ये सब कर्मभूमियां कही जाती
    हैं । इनमें विदेहका ग्रहण किया है इसलिए देवकुरु और उत्तरकुरुका भी ग्रहण प्राप्त होता है अतः
    उनका निषेध करनेके लिए 'अन्यत्र देवकुरुत्तरकुरुभ्यः' यह पद रखा है । अन्यत्र शब्दका अर्थ
    निषेध है । देवकुरु, उत्तरकुरु, हैमवत, हरिवर्ष, रम्यक, हैरण्यवत और अन्तद्वीप ये भोगभूमियां ३०
    कही जाती हैं । शंका—कर्मभूमि यह संज्ञा कैसे प्राप्त होती है ? समाधान—जो शुभ और अशुभ
    कर्मोंका आश्रय हो उसे कर्मभूमि कहते हैं । यद्यपि तीनों लोक कर्मका आश्रय है फिर भी इससे
    उत्कृष्ट्ताका ज्ञान होता है कि ये प्रकर्ष रूपसे कर्मका आश्रय हैं । सातवें नरकको प्राप्त करनेवाले
    अशुभ कर्मका भरतादि क्षेत्रोंमें ही अर्जन किया जाता है इसी प्रकार सर्वार्थसिद्धि आदि स्थान
    विशेषको प्राप्त करानेवाले पुण्य कर्मका उपार्जन भी यहीं पर होता है । तथा पात्रदान आदिके ३५
    साथ कृषि आदि छह प्रकारके कर्मका आरम्भ यहीं पर होता है इसलिए भरतादिकको कर्मभूमि
    १. भरतैरावतविदेहाश्च मु०, ता०, ना० । २. हरिवंशः रम्य-आ०, दि० १, दि० २ । ३. सर्वो
    लोकत्रितयः कर्म-आ०, दि० १, दि० २ । ४. एक प्रक-मु० । ५. शुभस्य सर्वा-मु० । ६. -द्ध्यादिषु
    स्थान-आ०, दि० १, दि० २ । ७. -पणस्य पुण्यकर्म-मु० ।
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