सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
- ३५५ § ३७५ ] तृतीयोऽध्यायः १५१
§ ३७२. किमेतेषां नारकाणां शीतोष्णजनितमेव दुःखमुतान्यथापि भवतीत्यत आह—
परस्परोदीरितदुःखाः ॥४॥
§ ३७३. कथं परस्परोदीरितदुःखत्वम् । नारकाः¹ भवप्रत्ययेनावधिना मिथ्यादर्शनोदयाद्वि-
भङ्गव्यपदेशभाजा च दूरादेव दुःखहेतूनवगम्योत्पन्नदुःखाः प्रत्यासत्तौ परस्परालोकनाच्च प्रज्वलित-
कोपाग्नयः पूर्वभवानुस्मरणाच्चातितीव्रानुबद्धवैराश्च श्वशृगालादिवत्स्वाभिघाते प्रवर्तमानाः ५
स्वविक्रियाकृतासिवासीपरशुभिण्डिमालशक्तितोमरकुन्तायोधनादिभिरायुधैः स्वकरचरणदशनैश्च
छेदनभेदनतक्षणदंशनादिभिः परस्परस्यातितीव्रं दुःखमुत्पादयन्ति ।
§ ३७४. किमेतावानेव दुःखोत्पत्तिकारणप्रकार उतान्योऽपि कश्चिदस्तीत्यत आह—
संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक् चतुर्थ्याः ॥५॥
§ ३७५. देवगतिनामकर्मविकल्पस्यासुरत्वसंवर्तकस्य कर्मण उदयादस्यन्ति परानित्यसुराः । १०
पूर्वजन्मनि² भावितेनातितीव्रेण संक्लेशपरिणामेन यदुपार्जितं पापकर्म तस्योदयात्सततं क्लिष्टाः³
संक्लिष्टाः, संक्लिष्टा असुराः, संक्लिष्टासुराः । संक्लिष्टा इति विशेषणान्न सर्वे असुरा नारकाणां
दुःखमुत्पादयन्ति । किं तर्हि । अम्बावरीषादय एव केचनेति । अवधिप्रदर्शनार्थं 'प्राक्चतुर्थ्याः' इति
योगप्रवृत्तिका नाम लेश्या है अतः योग और कषायके बदलनेसे वह भी बदल जाती है । मात्र जहाँ
कापोत लेश्याका जघन्य अंश कहां है वहाँ वही रहता है वह बदलकर कापोत लेश्याका मध्यम १५
और उत्कृष्ट अंश नहीं होता या जहाँ परम कृष्ण लेश्या कही है वहाँ वही रहती है वह बदल कर
अन्य लेश्या नहीं होती । शेष कथन सुगम है ।
§ ३७२. क्या इन नारकियोंके शीतोष्णजनित ही दुःख है या दूसरे प्रकारका भी दुःख है, इस
बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तथा वे परस्पर उत्पन्न किये गये दुःखवाले होते हैं ॥ ४ ॥ २०
§ ३७३. शंका—नारकी परस्पर एक-दूसरेको कैसे दुःख उत्पन्न करते हैं ? समाधान—नार-
कियोंके भवप्रत्यय अवधिज्ञान है जिसे मिथ्यादर्शनके उदयसे विभंगज्ञान कहते हैं । इस ज्ञानके कारण
दूरसे ही दुःखके कारणोंको जानकर उनको दुःख उत्पन्न हो जाता है और समीपमें आनेपर एक-
दूसरेको देखनेसे उनकी क्रोधाग्नि भभक उठती है । तथा पूर्वभवका स्मरण होनेसे उनकी वैरकी गांठ
और दृढ़तर हो जाती है । जिससे वे कुत्ता और गीदड़के समान एक-दूसरे का घात करनेके लिए २५
प्रवृत्त होते हैं। वे अपनी विक्रियासे तलवार, बसूला, फरसा, हाथसे चलानेका तीर, बर्छी, तोमर
नामका अस्त्र विशेष, बरछा और हथोड़ा आदि अस्त्र-शस्त्र बनाकर उनसे तथा अपने हाथ, पांव
और दांतोंसे छेदना, भेदना, छीलना और काटना आदिके द्वारा परस्पर अतितीव्र दुःखको उत्पन्न
करते हैं ।
§ ३७४. जिन कारणोंसे दुःख उत्पन्न होता है वे इतने ही हैं या और भी हैं ? अब इस बात- ३०
का ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
और चौथी भूमिसे पहले तक वे संक्लिष्ट असुरोंके द्वारा उत्पन्न किये गये दुःखवाले भी
होते हैं ॥५॥
§ ३७५. देवगति नामक नामकर्मके भेदोंमें एक असुर नामकर्म है जिसके उदयसे 'परान्
अस्यन्ति' जो दूसरोंको फेंकते हैं उन्हें असुर कहते हैं। पूर्व जन्ममें किये गये अतितीव्र संक्लेशरूप ३५
परिणामोंसे इन्होंने जो पापकर्म उपार्जित किया उसके उदयसे ये निरन्तर क्लिष्ट रहते हैं इसलिए
संक्लिष्ट असुर कहलाते हैं। सूत्रमें यद्यपि असुरोंको संक्लिष्ट विशेषण दिया है पर इसका यह अर्थ
१. नारकाणाम् ? भव-मु०, ता०, ना० । २. जन्मनि संभावि-मु० । ३. क्लिष्टाः संक्लिष्टा असुराः मु० ।
१५२ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।६ § ३७६ –
विशेषणम्। उपरि तिसृषु पृथिवीषु संक्लिष्टासुरा बाधाहेतवो नातः परमिति प्रदर्शनार्थम्। ‘च’-
शब्दः पूर्वोक्तदुःखहेतुसमुच्चयार्थः। सुतप्तायोरसपायननिष्ठप्तायस्तम्भालिङ्गनकूटशाल्मल्यारोहणाव-
तरणायोधनाभिघातवासीक्षुरतक्षणक्षारतप्ततैलावसेचनायःकुम्भीपाकाम्बरीषभर्जनवैतरणीमज्जन -
यन्त्रनिष्पीडनादिभिर्नारकाणां दुःखमुत्पादयन्ति। एवं छेदनभेदनादिभिः शकलीकृतमूर्तीनामपि तेषां
न मरणमकाले भवति। कुतः। अनपवर्त्यायुष्कत्वात् १।
§ ३७६. यद्येवं, तदेव तावदुच्यतां नारकाणामायुःपरिमाणमित्यत आह—
तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा सत्त्वानां
परा स्थितिः ॥६॥
§ ३७७. यथाक्रममित्यनुवर्तते । तेषु नरकेषु भूमिक्रमेण यथासंख्यमेकादयः स्थितयोऽभि-
संबध्यन्ते। रत्नप्रभायामुत्कृष्टा स्थितिरेकसागरोपमा। शर्कराप्रभायां त्रिसागरोपमा। वालुका-
प्रभायां सप्तसागरोपमा। पङ्कप्रभायां दशसागरोपमा। धूमप्रभायां सप्तदशसागरोपमा। तमःप्रभायां
नहीं कि सब असुर नारकियोंको दुःख उत्पन्न कराते हैं। किन्तु अम्बावरीष आदि कुछ असुर ही
दुःख उत्पन्न कराते हैं। मर्यादाके दिखलानेके लिए सूत्रमें ‘प्राक् चतुर्थ्याः' यह विशेषण दिया है।
इससे यह दिखलाया है कि ऊपरकी तीन पृथिवियोंमें ही संक्लिष्ट असुर बाधाके कारण हैं इससे
आगे नहीं। सूत्रमें ‘च’ शब्द पूर्वोक्त दुःखके कारणोंका समुच्चय करनेके लिए दिया है। परस्पर
खूब तपाया हुआ लोहेका रस पिलाना, अत्यन्त तपाये गये लौहस्तम्भका आलिंगन, कूट और
सेमरके वृक्षपर चढ़ाना-उतारना, लोहेके घनसे मारना, वसूला और छुरासे तरासना, तपाये गये
खारे तेलसे सींचना, तेलकी कढ़ाईमें पकाना, भाड़में भूंजना, वैतरणीमें डुबाना, यन्त्रसे पेलना
आदिके द्वारा नारकियोंके परस्पर दुःख उत्पन्न कराते हैं। इस प्रकार छेदन, भेदन आदिके द्वारा
उनका शरीर खण्ड-खण्ड हो जाता है तो भी उनका अकालमें मरण नहीं होता है, क्योंकि उनको
आयु घटती नहीं।
विशेषार्थ—नारक जीव स्वभावसे क्रूर स्वभाववाले होते हैं। एक-दूसरेको देखते ही उनका
क्रोध भभक उठता है और वे एक-दूसरेको मारने काटने लगते हैं। उनका शरीर वैक्रियिक होता है
इसलिए उससे वे नाना प्रकारके आयुध आदिका आकार धारण कर उनसे दूसरे नारकियोंको पीड़ा
पहुँचाते हैं। तीसरे नरक तक देवोंका भी गमन होता है, इसलिए ये भी कुतूहल वश उन्हें आपसमें
भिड़ा देते हैं और उनका घात-प्रत्याघात देखकर मजा लूटते हैं। पर यह काम सब देव नहीं करते
किन्तु अम्बावरीष आदि जातिके कुछ ही असुर कुमार देव करते हैं। इतना सब होते हुए भी उन
नारकियोंका अकाल मरण नहीं होता इतना यहाँ विशेष जानना चाहिए।
§ ३७६. यदि ऐसा है तो यह कहिए कि उन नारकियोंकी कितनी आयु है ? इसी बातको
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उन नरकोंमें जीवोंकी उत्कृष्ट स्थिति क्रमसे एक, तीन, सात, दस, सत्रह, बाईस और
तैंतीस सागर है ॥६॥
§ ३७७. इस सूत्रमें ‘यथाक्रमम्’ इस पदकी अनुवृत्ति होती है। जिससे उन नरकोंमें भूमिके क्रमसे
एक सागर आदि स्थितियोंका क्रमसे सम्बन्ध हो जाता है। रत्नप्रभामें एक सागर उत्कृष्ट स्थिति
है। शर्कराप्रभामें तीन सागर उत्कृष्ट स्थिति है। वालुकाप्रभामें सात सागर उत्कृष्ट स्थिति है।
पंकप्रभामें दस सागर उत्कृष्ट स्थिति है। धूमप्रभामें सत्रह सागर उत्कृष्ट स्थिति है। तमःप्रभामें
१. –युषत्वात् आ० दि० १, दि० २ ।
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द्वाविंशतिसागरोपमा । महातमःप्रभायां त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा इति । परा उत्कृष्टेत्यर्थः । 'सत्त्वानाम्'
इति वचनं भूमिनिवृत्त्यर्थम् । भूमिषु सत्त्वानामिदं स्थितिः, न भूमीनामिति ।
§ ३७८. उक्तः सप्तभूमिविस्तीर्णोऽधोलोकः । इदानीं तिर्यग्लोको वक्तव्यः । कथं पुनस्तिर्य-
ग्लोकः । यतोऽसंख्येयाः स्वयंभूरमणपर्यन्तास्तिर्यक्प्रचयविशेषेणावस्थिता द्वीपसमुद्रास्ततस्तिर्यग्लोक
इति । के¹ पुनस्तिर्यग्व्यवस्थिता इत्यत आह—
जम्बूद्वीपलवणोदादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्राः ॥७॥
§ ३७९. जम्बूद्वीपादयो द्वीपाः । लवणोदादयः समुद्राः । यानि लोके शुभानि नामानि
तन्नामानस्ते । तद्यथा—जम्बूद्वीपो द्वीपः । लवणोदः समुद्रः । घातकीखण्डो द्वीपः । कालोदः समुद्रः ।
पुष्करवरो द्वीपः । पुष्करवरः समुद्रः । ' वारुणीवरो द्वीपः । वारुणीवरः समुद्रः । क्षीरवरो द्वीपः ।
क्षीरवरः समुद्रः । घृतवरो द्वीपः । घृतवरः समुद्रः । इक्षुवरो द्वीपः । इक्षुवरः समुद्रः । नन्दीश्वरवरो
द्वीपः । नन्दीश्वरवरः समुद्रः । ' अरुणवरो द्वीपः । अरुणवरः समुद्रः । इत्येवमसंख्येया द्वीपसमुद्राः
स्वयंभूरमणपर्यन्ता वेदितव्याः ।
§ ३८०. अमीषां विष्कम्भसंनिवेशसंस्थानविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
द्विर्द्विर्विष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः ॥८॥
§ ३८१. द्विर्द्विरिति ²वीप्साभ्यावृत्तिवचनं विष्कम्भद्विगुणत्वव्याप्त्यर्थम् । आद्यस्य द्वीपस्य
यो विष्कम्भः तद्द्विगुणविष्कम्भो लवणजलधिः । तद्द्विगुणविष्कम्भो द्वितीयो द्वीपः । तद्द्विगुण-
बाईस सागर उत्कृष्ट स्थिति है और महातमःप्रभामें तैंतीस सागर उत्कृष्ट स्थिति है । 'परा' शब्द-
का अर्थ 'उत्कृष्ट' है । और 'सत्त्वानाम्' पद भूमियोंके निराकरण करनेके लिए दिया है । अभिप्राय
यह है कि भूमियोंमें जीवोंकी यह स्थिति है भूमियोंकी नहीं ।
§ ३७८. सात भूमियोंमें बंटे हुए अधोलोकका वर्णन किया । अब तिर्यग्लोकका कथन
करना चाहिए । शंका—तिर्यग्लोक यह संज्ञा क्यों है ? समाधान—चूँकि स्वयम्भूरमण समुद्र पर्यन्त
असंख्यात द्वीप-समुद्र तिर्यक् प्रचयविशेषरूपसे अवस्थित हैं इसलिए तिर्यग्लोक संज्ञा है । वे तिर्यक्
रूपसे अवस्थित क्या हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जम्बूद्वीप आदि शुभ नामवाले द्वीप और लवणोद आदि शुभ नामवाले समुद्र हैं ॥७॥
§ ३७९. जम्बूद्वीप आदिक द्वीप हैं और लवणोद आदिक समुद्र हैं। तात्पर्य यह है कि
लोकमें जितने शुभ नाम हैं उन नामवाले वे द्वीप समुद्र हैं। यथा-जम्बूद्वीप नामक द्वीप, लवणोद
समुद्र, घातकीखण्ड द्वीप, कालोद समुद्र, पुष्करवर द्वीप, पुष्करवर समुद्र, वारुणोवर द्वीप, वारुणी-
वर समुद्र, क्षीरवर द्वीप, क्षीरवर समुद्र, घृतवर द्वीप, घृतवर समुद्र, इक्षुवर द्वीप, इक्षुवर समुद्र,
नन्दीश्वरवर द्वीप, नन्दीश्वरवर समुद्र, अरुणवर द्वीप और अरुणवर समुद्र, इस प्रकार स्वयंभूरमण
पर्यन्त असंख्यात द्वीप-समुद्र जानने चाहिए ।
§ ३८०. अब इन द्वीप-समुद्रोंके विस्तार, रचना और आकारविशेषका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
वे सभी द्वीप और समुद्र दूने-दूने व्यासवाले, पूर्व-पूर्व द्वीप और समुद्रको वेष्टित करनेवाले
और चूड़ीके आकारवाले हैं ॥ ८ ॥
§ ३८१. द्वीप-समुद्रोंका विस्तार दूना-दूना है इस बातको दिखलानेके लिए सूत्रमें 'द्विर्द्विः'
इस प्रकार वीप्सा अर्थमें अभ्यावृत्ति वचन है । प्रथम द्वीपका जो विस्तार है लवणसमुद्रका विस्तार
१. के पुनस्ते तिर्य-आ०, दि० १ । २. वीप्सायां वृत्तिवचनं आ०, दि० १, दि० २, मु० ।
२०
विष्कम्भो द्वितीयो जलधिरिति । द्विद्विविष्कम्भो येषां ते द्विद्विविष्कम्भाः । पूर्वपूर्वपरिक्षेपिवचनं
ग्रामनगरादिवद्विनिवेशो मा विज्ञायीति । वलयाकृतिवचनं चतुरस्रादिसंस्थानान्तरनिवृत्त्यर्थम् ।
§ ३८२. अत्राह, जम्बूद्वीपस्य प्रदेशसंस्थानविष्कम्भा वक्तव्यास्तन्मूलत्वादितरविष्कम्भा-
दिविज्ञानस्येत्युच्यते—
तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तो योजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपः ॥६॥
§ ३८३. तेषां मध्ये तन्मध्ये । केषाम् । पूर्वोक्तानां द्वीपसमुद्राणाम् । नाभिरिव नाभिः२ ।
मेरुर्नाभिर्यस्य स मेरुनाभिः । वृत्त आदित्यमण्डलोपमानः । शतानां सहस्रं शतसहस्रम् । योजनानां
शतसहस्रं, योजनशतसहस्रम् । योजनशतसहस्रं विष्कम्भो यस्य सोऽयं योजनशतसहस्रविष्कम्भः ।
कोऽसौ । जम्बूद्वीपः । कथं जम्बूद्वीपः । जम्बूवृक्षोपलक्षितत्वात् । उत्तरकुरूणां मध्ये जम्बूवृक्षोऽना-
दिनिधनः पृथिवीपरिणामो ३ऽकृत्रिमः सपरिवारस्तदुपलक्षितोऽयं द्वीपः ।
उससे दूना है । तथा दूसरे द्वीपका विस्तार इससे दूना है और दूसरे समुद्रका इससे दूना है । इस
प्रकार उत्तरोत्तर दूना-दूना विस्तार है । तात्पर्य यह है कि इन द्वीप-समुद्रोंका विस्तार दूना-दूना
है इसलिए सूत्रमें उन्हें दूने-दूने विस्तारवाला कहा है । ग्राम और नगरादिकके समान इन द्वीप-
समुद्रोंकी रचना न समझी जाये इस बातके बतलानेके लिए सूत्रमें ‘पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणः’ यह वचन
दिया है । अर्थात् वे द्वीप और समुद्र उत्तरोत्तर एक दूसरेको घेरे हुए हैं । सूत्रमें जो ‘वलयाकृतयः’
वचन दिया है वह चौकोर आदि आकारोंके निराकरण करनेके लिए दिया है ।
§ ३८२. अब पहले जम्बू द्वीपका आकार और विस्तार कहना चाहिए, क्योंकि दूसरे द्वीप
समुद्रोंका विस्तार आदि तन्मूलक है, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उन सबके बीचमें गोल और एक लाख योजन विष्कम्भवाला जम्बूद्वीप है । जिसके मध्य-
में मेरु पर्वत है ॥ ९ ॥
§ ३८३. ‘तन्मध्ये’ पदका अर्थ है ‘उनके बीचमें’ । शंका—किनके बीचमें ? समाधान—
पूर्वोक्त द्वीप समुद्रोंके बीचमें । नाभिस्थानीय होनेसे नाभि कहा है । जिसका अर्थ मध्य है । अभि-
प्राय यह है कि जिसके मध्यमें मेरु पर्वत है, जो सूर्यके मण्डलके समान गोल है और जिसका एक
लाख योजन विस्तार है ऐसा यह जम्बूद्वीप है । शंका—इसे जम्बूद्वीप क्यों कहते हैं ? समाधान—
जम्बूवृक्षसे उपलक्षित होनेके कारण इसे जम्बूद्वीप कहते हैं । उत्तरकुरुमें अनादिनिधन, पृथिवी
से बना हुआ, अकृत्रिम और परिवार वृक्षोंसे युक्त जम्बूवृक्ष है जिसके कारण यह जम्बूद्वीप
कहलाता है ।
विशेषार्थ—अधोलोकका विवेचन कर आये हैं इसके बाद मध्यलोक है । यह रत्नप्रभा
पृथिवीके ऊपरी भागपर अवस्थित है । इसमें गोल आकारको लिये हुए और एकके बाद एकको
घेरे हुए असंख्यात द्वीप और समुद्र हैं । इन सबके बीचमें जम्बूद्वीप है । इसके बीचमें और दूसरा
द्वीप समुद्र नहीं है । यद्यपि गोल तो सब द्वीप और समुद्र हैं पर वे सब चूड़ीके समान गोल हैं और
यह थालीके समान गोल है । इसका व्यास एक लाख योजन है । इसके ठीक बीचमें मेरु पर्वत है ।
यह एक लाख चालीस योजन ऊँचा है । इसमेंसे एक हजार योजन जमीनमें है । चालीस योजनकी
आखीरमें चोटी है और शेष निन्यानबे हजार योजनका समतलसे चूलिका तक है । प्रारम्भमें
जमीनपर मेरु पर्वतका व्यास दस हजार योजन है । ऊपर क्रमसे घटता गया है । जिस हिसाबसे
ऊपर घटा है उसी हिसाबसे जमीनमें उसका व्यास बढ़ा है । मेरु पर्वतके तीन काण्ड हैं । पहला
काण्ड जमीनसे पाँच सौ योजनका, दूसरा साढ़े बासठ हजार योजनका और तीसरा छत्तीस हजार
१. पूर्वोक्तद्वीप—आ०, दि० १, दि० २, मु० । २. नाभिर्मध्यम । मेरु-आ०, दि० १, दि० २, मु० ।
३. परिणामोऽकृ-मु० ।
- ३।१० § ३८६ ] तृतीयोऽध्यायः १५५
§ ३८४. तत्र जम्बूद्वीपे षड्भिः कुलपर्वतैर्विभक्तानि सप्त क्षेत्राणि कानि तानीत्यत आह—
भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवतैरावतवर्षाः क्षेत्राणि १॥१०॥
§ ३८५. भरतादयः संज्ञा अनादिकालप्रवृत्ता अनिमित्ताः । तत्र भरतवर्षः क्व संनिविष्टः ।
दक्षिणदिग्भागे हिमवतोऽद्रेस्त्रयाणां २ समुद्राणां मध्ये आरोपितचापाकारो भरतवर्षः । विजयार्द्धेन
गङ्गासिन्धुभ्यां च विभक्तः ३ स षट्खण्डः । क्षुद्रहिमवन्तमुत्तरेण दक्षिणेन महाहिमवन्तं पूर्वापर- ५
समुद्रयोर्मध्ये हैमवतवर्षः । निषधस्य दक्षिणतो महाहिमवत उत्तरतः पूर्वापरसमुद्रयोरन्तराले
हरिवर्षः । निषधस्योत्तरान्नीलतो दक्षिणतः पूर्वापरसमुद्रयोरन्तरे विदेहस्य संनिवेशो द्रष्टव्यः ।
नीलत ४ उत्तरात् ५ (द्) रुक्मिणो दक्षिणात् पूर्वापरसमुद्रयोर्मध्ये रम्यकवर्षः । रुक्मिण उत्तराच्छिख-
रिणो दक्षिणात्पूर्वापरसमुद्रयोर्मध्ये संनिवेशी ६ हैरण्यवतवर्षः । शिखरिण उत्तरतस्त्रयाणां समुद्राणां
मध्ये ऐरावतवर्षः। विजयार्द्धेन रक्तारक्तोदाभ्यां च विभक्तः ७ स षट्खण्डः । १०
§ ३८६. षट् कुलपर्वता इत्युक्तं के पुनस्ते कथं वा व्यवस्थिता इत्यत आह—
योजनका है। प्रत्येक काण्डके अन्तमें एक-एक कटनी है। जिसका एक ओरका व्यास पाँचसौ
योजन है। अन्तिम कटनीका व्यास मात्र छह योजन कम है। एक जमीनपर और तीन इन तीन
कटनियोंपर इस प्रकार यह चार वनोंसे सुशोभित है। इनके क्रमसे भद्रसाल, नन्दन, सौमनस और
पाण्डुक ये नाम हैं। पहली और दूसरी कटनीके बाद मेरु पर्वत सीधा गया है फिर क्रमसे घटने १५
लगता है। इसके चारों वनोंमें चारों दिशाओंमें एक-एक वनमें चार-चार इस हिसाबसे सोलह
चैत्यालय हैं। पाण्डुक वनमें चारों दिशाओंमें चार पाण्डुक शिलाएँ हैं। जिनपर उस-उस दिशाके
क्षेत्रोंमें उत्पन्न हुए तीर्थंकरोंका अभिषेक होता है। इसका रंग पीला है।
§ ३८४. इस जम्बूद्वीप में छह कुलपर्वतोंसे विभाजित होकर जो सात क्षेत्र हैं वे कौन-से हैं?
इसी बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २०
भरतवर्ष, हैमवतवर्ष, हरिवर्ष, विदेहवर्ष, रम्यकवर्ष, हैरण्यवतवर्ष और ऐरावतवर्ष ये
सात क्षेत्र हैं ॥ १० ॥
§ ३८५. क्षेत्रोंकी भरत आदि संज्ञाएँ अनादि कालसे चली आ रही हैं और अनिमित्त हैं।
इनमें-से भरत क्षेत्र कहाँ स्थित है ? हिमवान् पर्वतके दक्षिणमें और तीन समुद्रोंके बीचमें चढ़े हुए
धनुषके आकारवाला भरत क्षेत्र है जो विजयार्ध और गंगा सिन्धुसे विभाजित होकर छह खण्डोंमें २५
बँटा हुआ है। क्षुद्र हिमवान्के उत्तरमें और महाहिमवान्के दक्षिणमें तथा पूर्व पश्चिम समुद्रके बीच-
में हैमवत क्षेत्र है। निषधके दक्षिणमें और महाहिमवान्के उत्तरमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके
बीचमें हरिक्षेत्र है। निषधके उत्तरमें और नीलके दक्षिणमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके बीचमें
विदेह क्षेत्रकी रचना है। नीलके उत्तरमें और रुक्मीके दक्षिणमें तथा पूर्व पश्चिम समुद्रके बीचमें
रम्यक क्षेत्र है। रुक्मीके उत्तरमें और शिखरीके दक्षिणमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके बीचमें ३०
हैरण्यवत क्षेत्र है। शिखरीके उत्तरमें और तीन समुद्रोंके बीचमें ऐरावत क्षेत्र है। जो विजयार्ध
और रक्ता रक्तोदासे विभाजित होकर छह खण्डोंमें बँटा हुआ है।
§ ३८६. कुलपर्वत छह हैं यह पहले कह आये हैं परन्तु वे कौन हैं और कहाँ स्थित हैं यह
बतलाना शेष है अतः आगेका सूत्र कहते हैं—
१. क्षेत्राणि ।।१०।। भिन्न-भिन्नानि भरता-। आ० । २. -याणां च समु-मु० । ३. विभक्तः षट्-मु० । ४. ३५
नीलवत उत्त-आ०, दि० १, दि० २ । ५. उत्तरः रुक्मिणो दक्षिणः मु० । ६. संनिवेशो हैर-मु० ।
७. -विभक्तः षट्- मु० ।
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१५६ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।११ § ३८७ –
तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनील-
रुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वताः ॥११॥
§ ३८७. तानि क्षेत्राणि विभजन्ति इत्येवंशीलास्तद्विभाजिनः । पूर्वापरायता इति पूर्वा-
परकोटिभ्यां लवणजलधिस्पर्शिन इत्यर्थः । हिमवदादयोऽनादिकालप्रवृत्ता अनिमित्तसंज्ञा वर्षविभाग-
हेतुत्वाद्वर्षधरपर्वता इत्युच्यन्ते । तत्र क्व हिमवान् । भरतस्य हैमवतस्य च सीमनि¹ व्यवस्थितः ।
क्षुद्रहिमवान् योजनशतोच्छ्रायः । हैमवतस्य हरिवर्षस्य² च विभागकरो महाहिमवान् द्वियोजन-
शतोच्छ्रायः³ । विदेहस्य दक्षिणतो हरिवर्षस्योत्तरतो निषधो नाम पर्वतश्चतुर्योजनशतोच्छ्रायः ।
उत्तरे त्रयोऽपि पर्वताः स्ववर्षविभाजिनो व्याख्याताः । उच्छ्रायश्च तेषां चत्वारि द्वे एकं च योजन-
शतं वेदितव्यम्⁴ । सर्वेषां पर्वतानामुच्छ्रायस्य चतुर्थांशोऽवगाहः ।
§ ३८८. तेषां वर्णविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः ॥१२॥
§ ३८९. त एते हिमवदादयः पर्वता हेमादिमया वेदितव्या यथाक्रमम् । हेममयो हिमवान्
चीनपट्टवर्णः । अर्जुनमयो महाहिमवान् शुक्लवर्णः । तपनीयमयो निषधस्तरुणादित्यवर्णः । वैडूर्य-
मयो नीलो मयूरग्रीवाभः । रजतमयो रुक्मी शुक्लः । हेममयः शिखरी चीनपट्टवर्णः ।
उन क्षेत्रोंको विभाजित करनेवाले और पूर्व-पश्चिम लम्बे ऐसे हिमवान्, महाहिमवान्,
निषध, नील, रुक्मी और शिखरिण ये छह वर्षधर पर्वत हैं ॥ ११ ॥
§ ३८७. इन पर्वतोंका स्वभाव उन क्षेत्रोंका विभाग करना है इसलिए इन्हें उनका विभाग
करनेवाला कहा है । ये पूर्वसे पश्चिम तक लम्बे हैं । इसका यह भाव है कि इन्होंने अपने पूर्व और
पश्चिम सिरेसे लवण समुद्रको स्पर्श किया है । ये हिमवान् आदि संज्ञाएँ अनादि कालसे चली आ
रही हैं और बिना निमित्तकी हैं । इन पर्वतोंके कारण क्षेत्रोंका विभाग होता है इसलिए इन्हें
वर्षधर पर्वत कहते हैं । हिमवान् पर्वत कहाँ है अब इसे बतलाते हैं-भरत और हैमवत क्षेत्रकी
सीमापर हिमवान् पर्वत स्थित है । इसे क्षुद्र हिमवान् भी कहते हैं। यह सौ योजन ऊँचा है ।
हैमवत और हरिवर्षका विभाग करनेवाला महाहिमवान् है। यह दो सो योजन ऊँचा है। विदेहके
दक्षिणमें और हरिवर्षके उत्तरमें निषध पर्वत है । यह चार सो योजन ऊँचा है । इसी प्रकार आगे-
के तीन पर्वत भी अपने-अपने क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले जानने चाहिए । उनकी ऊँचाई क्रमशः
चार सौ, दो सौ और सौ योजन जाननी चाहिए । इन सब पर्वतोंकी जड़ अपनी ऊँचाईका एक
बटे चार भाग है ।
§ ३८८. अब इन पर्वतोंके वर्णविशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ये छहों पर्वत क्रमसे सोना, चाँदी, तपाया हुआ सोना, वैडूर्यमणि, चाँदी और सोना इनके
समान रंगवाले हैं ॥ १२ ॥
§ ३८९. वे पर्वत क्रमसे हेम आदि वर्णवाले जानने चाहिए । हिमवान् पर्वतका रंग हेममय
अर्थात् चीनी रेशमके समान है । महाहिमवान्का रंग अर्जुनमय अर्थात् सफेद है । निषध पर्वतका
रंग तपाये गये सोनेके समान अर्थात् उगते हुए सूर्यके रंगके समान है । नील पर्वतका रंग वैडूर्यमय
अर्थात् मोरके गलेकी आभावाला है । रुक्मी पर्वतका रंग रजतमय अर्थात् सफेद है और शिखरी
पर्वतका रंग हेममय अर्थात् चीनी रेशमके समान है ।
१. सीमन्यव-आ०, दि० १, दि० २ । २. हरिवंशस्य च विभा-आ०, दि० १, दि० २ । ३. -च्छ्रायः । महा-
विदेहस्य आ०, दि० १, दि० २ । ४. -तव्यम् । पर्वता-मु० ।
– ३।१६ § ३९६ ] तृतीयाऽध्यायः १५७
§ ३९०. पुनरपि ¹तद्विशेषणार्थमाह—
मणिविचित्रपाश्र्वा उपरि मूले च तुल्यविस्ताराः ॥१३॥
§ ३९१. नानावर्णप्रभादिगुणोपेतैर्मणिभिर्विचित्राणि पाश्र्वाणि येषां ते मणिविचित्रपाश्र्वाः ।
अनिष्ट²संस्थानस्य निवृत्त्यर्थमुपर्यादिवचनं क्रियते । 'च'शब्दो मध्यसमुच्चयार्थः । य एषां मूले ५
विस्तारः स उपरि मध्ये च तुल्यः ।
§ ३९२. तेषां मध्ये लब्धास्पदा ह्रदा उच्यन्ते—
पद्ममहापद्मतिगिञ्छकेसरिमहापुण्डरीकपुण्डरीका ह्रदास्तेषामुपरि ॥१४॥
§ ३९३. पद्मो महापद्मस्तिगिञ्छः केसरी महापुण्डरीकः पुण्डरीक इति तेषां हिमवदादीना-
मुपरि यथाक्रममेते ह्रदा वेदितव्याः । १०
§ ३९४. तत्राद्यस्य संस्थानविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
प्रथमो योजनसहस्रायामस्तदर्द्धविष्कम्भो ह्रदः ॥१५॥
§ ३९५. प्राक्प्रत्यग् योजनसहस्रायाम उदग्वाक् पञ्चयोजनशतविस्तारो वज्रमयतलो
विविधमणिकनकविचित्रिततटः पद्मनामा ह्रदः ।
§ ३९६. तस्यावगाहप्रक्लृप्त्यर्थमिदमुच्यते— १५
दशयोजनावगाहः ॥१६॥
§ ३९०. इन पर्वतोंकी और विशेषताका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
इनके पार्श्व मणियोंसे चित्र-विचित्र हैं तथा वे ऊपर, मध्य और मूलमें समान विस्तार-
वाले हैं ॥ १३ ॥
§ ३९१. इन पर्वतोंके पार्श्व भाग नाना रंग और नाना प्रकारकी प्रभा आदि गुणोंसे युक्त
मणियोंसे विचित्र हैं इसलिए सूत्रमें इन्हें मणियोंसे विचित्र पार्श्ववाले कहा है । अनिष्ट आकारके २०
निराकरण करनेके लिए सूत्रमें 'उपरि' आदि पद रखे हैं। 'च' शब्द समुच्चयवाची है। तात्पर्य
यह है कि इनका मूलमें जो विस्तार है वही ऊपर और मध्यमें है ।
§ ३९२. इन पर्वतोंके मध्यमें जो तालाब हैं उनका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
इन पर्वतोंके ऊपर क्रमसे पद्म, महापद्म, तिगिंछ, केसरी, महापुण्डरीक और पुण्डरीक ये २५
तालाब हैं ॥ १४ ॥
§ ३९३. पद्म, महापद्म, तिगिञ्छ, केसरी, महापुण्डरीक और पुण्डरीक ये छह तालाब हैं जो
उन हिमवान् आदि पर्वतोंपर क्रमसे जानना चाहिए ।
§ ३९४. इनमें-से पहले तालाबके आकार-विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं— ३०
पहला तालाब एक हजार योजन लम्बा और इससे आधा चौड़ा हैं ॥ १५ ॥
§ ३९५. पद्म नामक तालाब पूर्व और पश्चिम एक हजार योजन लम्बा है और पांच सौ
योजन चौड़ा है । इसका तलभाग वज्रसे बना हुआ है। तथा इसका तट भाग नाना प्रकारके मणि
और सोनेसे चित्रविचित्र है ।
§ ३९६. अब इसकी गहराई दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— ३५
दस योजन गहरा है ॥ १६ ॥
१. तद्विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह मु० । २. -ष्टस्य संस्था-मु० ।
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§ ३९७. अवगाहोऽधःप्रवेशो निम्नता । दशयोजनान्यवगाहोऽस्य दशयोजनावगाहः ।
§ ३९८. १तन्मध्ये किम्—
तन्मध्ये योजनं पुष्करम् ॥१७॥
§ ३९९. योजनप्रमाणं योजनम्, क्रोशायामपत्रत्वात्क्रोशद्वयविष्कम्भकर्णिकत्वाच्च योजना-
यामविष्कम्भम् । जलतलात्क्रोशद्वयोच्छ्रायनालं तावद्बहुलपत्रप्रचयं पुष्करमवगन्तव्यम् ।
§ ४००. इतरेषां ह्रदानां पुष्कराणां चायामादिनिर्ज्ञानार्थमाह—
तद्द्विगुणद्विगुणा ह्रदाः पुष्कराणि च ॥१८॥
§ ४०१. स च तच्च ते, तयोर्द्विगुणा२ द्विगुणास्तद्विगुणद्विगुणा इति द्वित्वं व्याप्ति३ज्ञाप-
नार्थम् । केन द्विगुणाः । आयामादिना । पद्मह्रदस्य द्विगुणायामविष्कम्भावगाहो महापद्मो४ ह्रदः ।
तस्य द्विगुणायामविष्कम्भावगाहस्तिगिञ्छो५ ह्रद
- ३।२१ § ४०६ ] तृतीयोऽध्यायः १५९
§ ४०३. तेषु पुष्करेषु कर्णिकामध्यदेशनिवेशिनः शरद्विमलपूर्णचन्द्रद्युतिहराः क्रोशायामाः
क्रोशार्द्धविष्कम्भा देशोनक्रोशोत्सेधाः प्रासादाः । तेषु निवसन्तत्येवंशीलास्तन्निवासिन्यः, देव्यः
श्रीह्रीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्मीसंज्ञिकास्तेषु पद्मादिषु यथाक्रमं वेदितव्याः । 'पल्योपमस्थितयः' इत्यने-
नायुषः प्रमाणमुक्तम् । समाने स्थाने भवाः सामानिकाः । सामानिकाश्च परिषदश्च सामानिक-
परिषदः । सह सामानिकपरिषदभिर्वर्त्तन्त इति ससामानिकपरिषत्काः । तस्य पद्मस्य परिवार- ५
पद्मेषु प्रासादानामुपरि सामानिकाः परिषदश्च वसन्ति ।
§ ४०४. यकाभिः सरिद्भिस्तानि क्षेत्राणि प्रविभक्तानि ता उच्यन्ते—
गङ्गासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकान्तासीतासीतोदानारीनरकान्ता-
सुवर्णरूप्यकूलारक्तारक्तोदाः सरितस्तन्मध्यगाः ॥२०॥
§ ४०५. सरितो न वाप्यः । ताः किमन्र्तरा उत समीपाः । इत्यत आह तन्मध्यगाः । तेषां १०
क्षेत्राणां मध्यं, तन्मध्यम् । तन्मध्यं तन्मध्येन वा गच्छन्तीति तन्मध्यगाः। एकत्र सर्वासाम्
प्रसंगनिवृत्त्यर्थं दिग्विषेशप्रतिपत्त्यर्थं चाह—
द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः पूर्वगाः ॥२१॥
§ ४०६. द्वयोर्द्वयोः सरितोरेकैकं क्षेत्रं विषय इति वाक्यशेषाभिसंबन्धादेकत्र सर्वासाम्
प्रसंगनिवृत्तिः कृता । 'पूर्वाः पूर्वगाः' इति वचनं दिग्विषेशप्रतिपत्त्यर्थम् । तत्र पूर्वा याः सरितस्ताः १५
पूर्वगाः । ^१पूर्वजलधिं गच्छन्तीति पूर्वगाः । किमपेक्षं पूर्वत्वम् । सूत्रनिर्देशापेक्षम् । यद्येवं गङ्गा-
§ ४०३. इन कमलोंकी कर्णिकाके मध्यमें शरत्कालीन निर्मल पूर्ण चन्द्रमाकी कान्तिको
हरनेवाले एक कोस लम्बे, आधा कोस चौड़े और पौन कोस ऊँचे महल हैं । उनमें निवास करने-
वाली श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी नामवाली देवियाँ क्रमसे पद्म आदि छह कमलोंमें
जानना चाहिए। 'उनकी स्थिति एक पल्यकी है' इस पदके द्वारा उनकी आयुका प्रमाण कहा है। २०
समान स्थानमें जो होते हैं वे सामानिक कहलाते हैं। सामानिक और परिषत्क ये देव हैं । वे
देवियां इनके साथ रहती हैं। तात्पर्य यह है कि मुख्य कमलके जो परिवार कमल हैं उनके महलों-
में सामानिक और परिषद् जातिके देव रहते हैं ।
§ ४०४. जिन नदियोंसे क्षेत्रोंका विभाग हुआ है अब उन नदियोंका कथन करनेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं— २५
इन भरत आदि क्षेत्रोंमेंसे गंगा, सिन्धु, रोहित, रोहितास्या, हरित, हरिकान्ता, सीता,
सीतोदा, नारी, नरकान्ता, सुवर्णकूला, रूप्यंकूला, रक्ता और रक्तोदा नदियाँ बही हैं ॥ २० ॥
§ ४०५. ये नदियाँ हैं तालाब नहीं। वे नदियां अन्तरालसे हैं या पास-पास इस बातका
खुलासा करनेके लिए सूत्रमें 'तन्मध्यगाः' पद दिया है। इसका यह भाव है कि उन क्षेत्रोंमें या उन
क्षेत्रोंमें-से होकर वे नदियां बही हैं। एक स्थानमें सबका प्रसंग प्राप्त होता है अतः इसका ३०
निराकरण करके दिशा विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
दो-दो नदियोंमें-से पहली-पहली नदी पूर्व समुद्रको जाती है ॥ २१ ॥
§ ४०६. इस सूत्रमें 'दो-दो नदियां एक-एक क्षेत्रमें हैं' इस प्रकार वाक्यविशेषका सम्बन्ध
कर लेनेसे एक क्षेत्रमें सब नदियोंके प्रसंग होनेका निराकरण हो जाता है। 'पूर्वाः पूर्वगाः' यह
वचन दिशाविशेषका ज्ञान करानेके लिए दिया है । इन नदियोंमें जो प्रथम नदियां हैं वे पूर्व समुद्र- ३५
में जाकर मिली हैं । सूत्रमें जो 'पूर्वगाः' पद है उसका अर्थ 'पूर्व समुद्रको जाती हैं' यह है ।
१. मध्यं तन्मध्यं तन्मध्येन मु० । मध्यं तन्मध्येन आ०, दि० १, दि० २ । २. -पूर्वं जलंधि मु० ।
सिन्ध्वादयः सप्त पूर्वगा इति प्राप्तम् । नैष दोषः; द्वयोर्द्वयोरित्यभिसंबन्धात् । द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः
पूर्वगा इति वेदितव्याः ।
§ ४०७. इतरासां दिग्भागप्रतिपत्त्यर्थमाह—
शेषास्त्वपरगाः ॥२२॥
§ ४०८. द्वयोर्द्वयोर्या अवशिष्टास्ता अपरगाः प्रत्येतव्याः । अपरसमुद्रं गच्छन्तीत्यपरगाः ।
तत्र पद्मह्रदप्रभवा पूर्वतोरणद्वारनिर्गता गङ्गा । अपरतोरणद्वारनिर्गता सिन्धुः । उदीच्यतोरणद्वार-
निर्गता रोहितास्या । महापद्मह्रदप्रभवा १अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता रोहित् । उदीच्यतोरणद्वार-
निर्गता हरिकान्ता । तिगिञ्छह्रदप्रभवा दक्षिणतोरणद्वारनिर्गता हरित् । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता
सीतोदा । केसरिह्रदप्रभवा अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता सीता । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता नरकान्ता ।
महापुण्डरीकह्रदप्रभवा दक्षिणद्वारनिर्गता नारी । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता रूप्यकूला । पुण्डरीक-
ह्रदप्रभवा अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता सुवर्णकूला । पूर्वतोरणद्वारनिर्गता रक्ता । २प्रतीच्यतोरणद्वार-
निर्गता रक्तोदा ।
§ ४०९. तासां परिवारप्रतिपादनार्थमाह—
चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृत्ता गङ्गासिन्ध्वादयो नद्यः ॥२३॥
§ ४१०. किमर्थं 'गङ्गासिन्ध्वादि' ग्रहणं क्रियते । नदीग्रहणार्थम् । प्रकृतास्ता अभिसंब-
शंका—पूर्वत्व किस अपेक्षासे है ? समाधान—सूत्रमें किये गये निर्देशकी अपेक्षा । शंका—यदि
ऐसा है तो गंगा, सिन्धु आदि सात नदियां पूर्व समुद्रको जानेवाली प्राप्त होती हैं ? समाधान—यह
कोई दोष नहीं, क्योंकि 'द्वयोः द्वयोः' इन पदोंका सम्बन्ध है । तात्पर्य यह है कि दो-दो नदियोंमें-से
प्रथम-प्रथम नदी बहकर पूर्व समुद्रमें मिली है ।
§ ४०७. अब इतर नदियोंके दिशाविशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
किन्तु शेष नदियाँ पश्चिम समुद्रको जाती हैं ॥ २२ ॥
§ ४०८. दो-दो नदियोंमें जो शेष नदियाँ हैं वे बहकर पश्चिम समुद्रमें मिली हैं । 'अपरगाः'
पदका अर्थ अपर समुद्रको जाती हैं यह है । उनमें-से पद्म तालाबसे उत्पन्न हुई और पूर्व तोरण
द्वारसे निकली हुई गंगा नदी है । पश्चिम तोरण द्वारसे निकली हुई सिन्धु नदी है तथा उत्तर
तोरण द्वारसे निकली हुई रोहितास्या नदी है । महापद्म तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरण-
द्वारसे निकली हुई रोहित नदी है तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली हुई हरिकान्ता नदी है। तिगिञ्छ
तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई हरित नदी है और उत्तर तोरण द्वारसे
निकली हुई सीतोदा नदी है । केसरी तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई
सीता नदी है तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली हुई नरकान्ता नदी है । महापुण्डरीक तालाबसे
उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई नारी नदी है । तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली
हुई रूप्यकूला नदी है । पुण्डरीक तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई
सुवर्णकूला नदी है । पूर्व तोरणद्वारसे निकली हुई रक्ता नदी है और पश्चिम तोरणद्वारसे निकली
हुई रक्तोदा नदी है ।
§ ४०९. अब इनकी परिवार-नदियोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
गंगा और सिन्धु आदि नदियोंको चौदह-चौदह हजार परिवार नदियाँ हैं ॥ २३ ॥
§ ४१०. शंका—'गंगा सिन्धु आदि' पदका ग्रहण किसलिए किया है ? समाधान—नदियों-
१. अपाच्यतोरण-आ० २, दि० १, दि० २, ता०, ना० । २. अपरतोरण-मु० ।
- ३।२५ § ४१४ ] तृतीयोऽध्यायः १६१
ध्यन्ते । नैवं शङ्क्यम्; 'अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा' इति अपरगाणामेव ग्रहणं स्यात् ।
गङ्गादिग्रहणमेवास्तीति चेत् । पूर्वगाणामेव ग्रहणं स्यात् । अत उभयीनां ग्रहणार्थं 'गङ्गासिन्ध्वादि'
ग्रहणं क्रियते । 'नदी'ग्रहणं द्विगुणा द्विगुणा इत्यभिसंबन्धार्थम् । गङ्गा चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता ।
सिन्धुरपि । एवमुत्तरा अपि नद्यः प्रतिक्षेत्रं तद्द्विगुणद्विगुणा² भवन्ति; आ विदेहान्तात् । तत उत्तरा
अर्द्धार्द्धहीनाः ।
§ ४११. उक्तानां क्षेत्राणां विष्कम्भप्रतिपत्त्यर्थमाह—
भरतः षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तारः षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य ॥२४॥
§ ४१२. षडधिका विंशतिः षड्विंशतिः । षड्विंशतिरधिका³ येषु तानि षड्विंशानि ।
षड्विंशानि पञ्चयोजनशतानि विस्तारो यस्य षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तारो भरतः । किमेता-
वानेव । न; इत्याह षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य विस्तारोऽस्येत्यभिसंबध्यते ।
§ ४१३. इतरेषां विष्कम्भविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
तद्द्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ताः ॥२५॥
§ ४१४. ⁴ततो भरताद् द्विगुणो द्विगुणो विस्तारो येषां त इमे तद्द्विगुणद्विगुणविस्ताराः। के
ते वर्षधरवर्षाः । किं सर्वे । न; इत्याह विदेहान्ता इति ।
का ग्रहण करनेके लिए। शंका—उनका तो प्रकरण है ही, अतः 'गंगासिन्ध्वादि' पदके बिना ग्रहण
किये ही उनका सम्बन्ध हो जाता है ? समाधान—ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'अनन्तर-
का विधान होता है या प्रतिषेध' इस नियमके अनुसार पश्चिमकी ओर बहनेवाली नदियोंका ही
ग्रहण होता जो कि इष्ट नहीं अतः सूत्रमें 'गंगासिन्ध्वादि' पद दिया है। शंका—तो सूत्रमें 'गंगादि'
इतने पदका ही ग्रहण रहे ? समाधान—यदि 'गंगादि' इतना पदका ही ग्रहण किया जाये तो पूर्व-
की ओर बहनेवाली नदियोंका ही ग्रहण होवे जो भी इष्ट नहीं। अतः दोनों प्रकारकी नदियोंका
ग्रहण करनेके लिए 'गंगासिन्ध्वादि' पदका ग्रहण किया है। यद्यपि 'गंगासिन्ध्वादि' इतने पदके
ग्रहण करनेसे ही यह बोध हो जाता है कि ये नदियां हैं फिर भी सूत्रमें जो 'नदी' पदका ग्रहण
किया है वह 'द्विगुणा द्विगुणाः' इसके सम्बन्धके लिए किया है। गंगाकी परिवार नदियां चौदह
हजार हैं। इसी प्रकार सिन्धुकी भी परिवार नदियां चौदह हजार हैं। इस प्रकार आगेकी परिवार
नदियां विदेह क्षेत्र पर्यन्त दूनी-दूनी होती गयी हैं। और इससे आगेकी परिवार नदियां आधी-
आधी होती गयी हैं।
§ ४११. अब उक्त क्षेत्रोंके विस्तारका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भरत क्षेत्रका विस्तार पाँच सौ छब्बीस सही छह बटे उन्नीस योजन है ॥ २४ ॥
§ ४१२. यहाँ टीकामें 'पहले 'षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तारः' पदका समास किया गया
है जिसका अभिप्राय यह है कि भरतवर्ष पांच सौ छब्बीस योजनप्रमाण विस्तार है ? शंका—क्या
इसका इतना ही विस्तार है ? समाधान—नहीं, क्योंकि इसका एक योजनका छह बटे उन्नीस
योजन विस्तार और जोड़ लेना चाहिए।
§ ४१३. अब इतर क्षेत्रोंके विस्तार विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विदेह पर्यन्त पर्वत और क्षेत्रोंका विस्तार भरत क्षेत्रके विस्तारसे दूना-दूना है ॥ २५ ॥
§ ४१४. जिनका भरतसे दूना-दूना विस्तार है वे भरतसे दूने-दूने विस्तारवाले कहे गये हैं।
यहाँ 'तद्द्विगुणद्विगुणविस्ताराः' में बहुव्रीहि समास है। शंका—वे दूने-दूने विस्तारवाले क्या हैं ?
समाधान—पर्वत और क्षेत्र। शंका—क्या सबका दूना-दूना विस्तार है ? समाधान—नहीं, किन्तु
१. पा० म० मा०, पृ० ३३५ । २. -क्षेत्रं द्विगुणा द्विगुणा मु० । ३. -रधिकानि येषु मु० । ४. ततो
द्विगुणो ता०, ना० ।
२१
§ ४१५. अथोत्तरेषां कथमित्यत आह—
उत्तरा दक्षिणतुल्याः ॥२६॥
§ ४१६. उत्तरा ऐरावतादयो नीलान्ता भरतादिभिर्दक्षिणैस्तुल्या द्रष्टव्याः । अतीतस्य
सर्वस्यायं विशेषो वेदितव्यः । तेन ह्रदपुष्करादीनां तुल्यता योज्या ।
§ ४१७. अत्राह, उक्तेषु भरतादिषु क्षेत्रेषु मनुष्याणां किं तुल्योऽनुभवादिः१, आहोस्विदस्ति
कश्चित्प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते—
भरतैरावतयोर्वृद्धिह्रासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ॥२७॥
§ ४१८. वृद्धिश्च ह्रासश्च वृद्धिह्रासौ । काभ्याम् । षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ।
कयोः । भरतैरावतयोः । न तयोः क्षेत्रयोर्वृद्धिह्रासौ स्तः; असंभवात् । तत्स्थानां मनुष्याणां वृद्धि-
ह्रासौ भवतः । अथवाधिकरणनिर्देशः । भरते ऐरावते च मनुष्याणां वृद्धिह्रासाविति । किंकृतौ
वृद्धिह्रासौ । अनुभवायुःप्रमाणादिकृतौ । अनुभव उपभोगः, आयुर्जीवितपरिमाणम्३, प्रमाणं
शरीरोत्सेध इत्येवमादिभिर्वृद्धिह्रासौ मनुष्याणां भवतः४ । किंहेतुकौ पुनस्तौ । कालहेतुकौ । स च
कालो द्विविधः-उत्सर्पिणी अवसर्पिणी चेति । तद्भेदाः प्रत्येकं षट् । अन्वर्थसंज्ञे चैते । अनुभवादि-
विदेह तक दूना-दूना विस्तार है ।
§ ४१५. आगेके पर्वत और क्षेत्रोंका विस्तार किस प्रकार है अब इस बात के बतलानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
उत्तरके क्षेत्र और पर्वतोंका विस्तार दक्षिणके क्षेत्र और पर्वतोंके समान है ॥ २६ ॥
§ ४१६. 'उत्तर' इस पदसे ऐरावत क्षेत्रसे लेकर नील पर्यन्त क्षेत्र और पर्वत लिये गये हैं ।
इनका विस्तार दक्षिण दिशावर्ती भरतादिके समान जानना चाहिए । पहले जितना भी कथन कर
आये हैं उन सबमें यह विशेषता जाननी चाहिए । इससे तालाब और कमल आदिकी समानता
लगा लेनी चाहिए ।
§ ४१७. यहाँपर शंकाकार कहता है कि इन पूर्वोक्त, भरतादि क्षेत्रोंमें मनुष्योंका अनुभव आदि
क्या समान हैं या कुछ विशेषता है । इस शंकाका समाधान करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भरत और ऐरावत क्षेत्रोंमें उत्सर्पिणीके. और अवसर्पिणीके छह समयोंकी अपेक्षा वृद्धि और
ह्रास होता रहता है ॥ २७ ॥
§ ४१८. वृद्धि और ह्रास इन दोनों पदोंमें कर्मधारय समास है । शंका—किनकी अपेक्षा
वृद्धि और ह्रास होता है ? समाधान—छह समयोंकी अपेक्षा । शंका—किनका छह समयोंकी
अपेक्षा वृद्धि और ह्रास होता है ? समाधान—भरत और ऐरावत क्षेत्रका । इसका यह
मतलब नहीं कि उन क्षेत्रोंका वृद्धि और ह्रास होता है, क्योंकि ऐसा होना असम्भव है । किन्तु
उन क्षेत्रोंमें रहनेवाले मनुष्योंका वृद्धि और ह्रास होता है । अथवा, 'भरतैरावतयोः' षष्ठी
विभक्ति न होकर अधिकरणमें यह निर्देश किया है जिससे इस प्रकार अर्थ होता है कि भरत
और ऐरावत क्षेत्रमें मनुष्योंकी वृद्धि और ह्रास होता है । शंका—यह वृद्धि और ह्रास
किंनिमित्तक होता है ? समाधान—अनुभव, आयु और प्रमाण आदि निमित्तक होता है ।
अनुभव, उपभोगको कहते हैं, जीवित रहनेके परिमाणको आयु कहते हैं । और शरीरकी
ऊँचाईको प्रमाण कहते हैं । इस प्रकार इन पूर्वोक्त कारणोंसे और अन्य कारणोंसे मनुष्योंका वृद्धि
और ह्रास होता है । शंका—ये वृद्धि-ह्रास किस निमित्तसे होते हैं ? समाधान--ये कालके निमित्त
से होते हैं । वह काल दो प्रकारका है-उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी । और इनमें-से प्रत्येकके छह
१. -तुल्योऽनुभवः आहो-ता०, ना० । २. -याभ्याम् । कयोः मु० । ३. -परिमाणम्, शरी -मु० । ४. भवतः
तयोः । किहेतु-ता०, ना० ।
- ३।२९ § ४२१ ] तृतीयोऽध्यायः १६३
भिरुत्सर्पणशीला उत्सर्पिणी । तैरेवावसर्पणशीला अवसर्पिणी । तत्रावसर्पिणी षड्विधा—सुषमसुषमा
सुषमा सुषमदुःषमा दुःषमसुषमा दुःषमा अतिदुःषमा चेति । उत्सर्पिण्यपि अतिदुःषमाद्या सुषमसुष-
मान्ता षड्विधैव भवति । अवसर्पिण्याः परिमाणं दशसागरोपमकोटीकोट्यः । उत्सर्पिण्या अपि
तावत्य एव । सोभयी कल्प इत्याख्याते । तत्र सुषमसुषमा चतस्रः सागरोपमकोटीकोट्यः ।
तदादौ मनुष्या उत्तरकुरुमनुष्यतुल्याः । ततः क्रमेण हानौ सत्यां सुषमा भवति तिस्रः सागरोपम-
कोटीकोट्यः । तदादौ मनुष्या हरिवर्षमनुष्यसमाः । ततः क्रमेण हानौ सत्यां सुषमदुःषमा भवति
द्वे सागरोपमकोटीकोट्यौ । तदादौ मनुष्या हैमवतकमनुष्यसमाः । ततः क्रमेण हानौ सत्यां दुःषम-
सुषमा भवति एकसागरोपमकोटीकोटी द्विचत्वारिंशद्वर्षसहस्रोना । तदादौ मनुष्या विदेहजनतुल्या
भवन्ति । ततः क्रमेण हानौ सत्यां दुःषमा भवति एकविंशतिवर्षसहस्राणि । ततः क्रमेण हानौ सत्या-
मतिदुःषमा भवति एकविंशतिवर्षसहस्राणि । एवमुत्सर्पिण्यपि विपरीतक्रमा वेदितव्या ।
§ ४१९. अथेतरासु भूमिषु कावस्थेत्यत आह—
ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥२८॥
§ ४२०. ताभ्यां भरतैरावताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिता भवन्ति । न हि तत्रोत्सर्पिण्यव-
सर्पिण्यौ स्तः ।
§ ४२१. किं तासु भूमिषु मनुष्यास्तुल्यायुष आहोस्चित्कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत आह—
एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवतकहारिवर्षकदैवकुरवकाः ॥२९॥
भेद हैं । ये दोनों काल सार्थक नामवाले हैं। जिसमें अनुभव आदिकी वृद्धि होती है वह उत्सर्पिणी
काल है । और जिसमें इनका ह्रास होता है वह अवसर्पिणी काल है। अवसर्पिणीके छह
भेद हैं—सुषमसुषमा, सुषमा, सुषमदुःषमा, दुःषमसुषमा, दुःषमा और अतिदुःषमा । इसी प्रकार
उत्सर्पिणी भी अतिदुःषमासे लेकर सुषमसुषमा तक छह प्रकारकी है। अवसर्पिणी कालका
परिमाण दस कोड़ाकोड़ी सागर है और उत्सर्पिणी भी इतना ही है। ये दोनों मिलकर एक
कल्पकाल कहे जाते हैं। इनमें-से सुषमसुषमा चार कोड़ाकोड़ी सागरका होता है। इसके
प्रारम्भमें मनुष्य उत्तरकुरुके मनुष्योंके समान होते हैं। फिर क्रमसे हानि होनेपर तीन कोड़ा-
कोड़ी सागर प्रमाण सुषमा काल प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य हरिवर्षके मनुष्योंके
समान होते हैं। तदनन्तर क्रमसे हानि होनेपर दो कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण सुषमदुःषमा
काल प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य हैमवतके मनुष्योंके समान होते हैं। तदनन्तर
क्रमसे हानि होकर ब्यालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागरका दुःषमसुषमा काल
प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य विदेह क्षेत्रके मनुष्योंके समान होते हैं। तदनन्तर क्रमसे
हानि होकर इक्कीस हजार वर्षका दुःषमा काल प्राप्त होता है। तदनन्तर क्रमसे हानि
होकर इक्कीस हजार वर्षका अतिदुःषमा काल प्राप्त होता है। इसी प्रकार उत्सर्पिणी भी इससे
विपरीत क्रमसे जाननी चाहिए।
§ ४१९. इतर भूमियोंमें क्या अवस्था है अब इस बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
भरत और ऐरावतके सिवा शेष भूमियां अवस्थित हैं ॥ २८ ॥
§ ४२०. सूत्रमें 'ताभ्याम्' पदसे भरत और ऐरावत क्षेत्रका ग्रहण किया है। इन दोनों
क्षेत्रोंसे शेष भूमियां अवस्थित हैं। उन क्षेत्रोंमें उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल नहीं हैं।
§ ४२१. इन भूमियोंमें मनुष्य क्या तुल्य आयुवाले होते हैं या कुछ विशेषता है। इस बातके
बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
हैमवत, हरिवर्ष और देवकुरुके प्राणियोंकी स्थिति क्रमसे एक, दो और तीन पल्य
प्रमाण है ॥ २९ ॥
१६४ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३० § ४२२ –
§ ४२२. हैमवते भवा हैमवतका इत्येवं 'वुञि' सति मनुष्यसंप्रत्ययो भवति । एवमुत्तरयो-
रपि । हैमवतकादयस्त्रयः । एकादयस्त्रयः । तत्र यथासंख्यमभिसंबन्धः क्रियते । एकपल्योपमस्थितयो
हैमवतकाः । द्विपल्योपमस्थितयो हारिवर्षकाः । त्रिपल्योपमस्थितयो दैवकुरवका इति । तत्र पञ्चसु
हैमवतेषु सुषमदुःषमा सदावस्थिता । तत्र मनुष्या एकपल्योपमायुषो द्विधनुःसहस्रोच्छ्रिताश्चतुर्थ-
भक्ताहारा नीलोत्पलवर्णाः । पञ्चसु हरिवर्षेषु सुषमा सदावस्थिता । तत्र मनुष्या द्विपल्योपमायुष-
श्चापसहस्रोत्सेधाः षष्ठभक्ताहाराः शङ्खवर्णाः । पञ्चसु देवकुरुषु सुषमसुषमा सदावस्थिता । तत्र
मनुष्या स्त्रिपल्योपमायुषः षड्धनुःसहस्रोच्छ्राया अष्टमभक्ताहाराः कनकवर्णाः ।
§ ४२३. अथोत्तरेषु कावस्थेत्यत आह—
तथोत्तराः ॥३०॥
§ ४२४. यथा दक्षिणा व्याख्यातास्तथैवोत्तरा वेदितव्याः । हैरण्यवतका हैमवतकैस्तुल्याः ।
रम्यका हारिवर्षकैस्तुल्याः । दैवकुरवकैरौत्तरकुरवकाः समाख्याताः ।
§ ४२५. अथ विदेहेष्ववस्थितेषु का स्थितिरित्यत्रोच्यते—
विदेहेषु संख्येयकालाः ॥३१॥
§ ४२६. १सर्वेषु विदेहेषु संख्येयकाला मनुष्याः । तत्र कालः २सुषमदुष्षमान्तोपमः सदा-
§ ४२२. हैमवत क्षेत्रमें उत्पन्न हुए हैमवतक कहलाते हैं। यहां हैमवंत शब्दसे 'वुञ्' प्रत्यय
करके हैमवतक शब्द बना है जिससे मनुष्योंका ज्ञान होता है। इसी प्रकार आगेके हारिवर्षक और
दैवकुरवंक इन दो शब्दोंमें जान लेना चाहिए। हैमवतक आदि तीन हैं और एक आदि तीन हैं।
यहाँ इनका क्रमसे सम्बन्ध करते हैं जिससे यह अर्थ हुआ कि हैमवत क्षेत्रके मनुष्योंकी स्थिति एक
पल्यकी है। हरिवर्ष क्षेत्रके मनुष्योंकी स्थिति दो पल्यकी है और देवकुरुक्षेत्रके मनुष्योंकी स्थिति
तीन पल्यकी है। ढाई द्वीपमें जो पाँच हैमवत क्षेत्र हैं उनमें सदा सुषमदुषमा काल है । वहाँ
मनुष्योंकी आयु एक पल्यकी है, शरीरकी ऊँचाई दो हजार धनुष है, उनका आहार एक दिनके
अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग नील कमलके समान है। पाँच हरिवर्ष नामके क्षेत्रोंमें सदा
सुषमा काल रहता है। वहाँ मनुष्योंकी आयु दो पल्यकी है, शरीरकी ऊँचाई चार हजार धनुष है,
उनका आहार दो दिनके अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग शंखके समान सफेद है। पाँच
देवकुरु नामके क्षेत्रमें सदा सुषमसुषमा काल है। वहाँ मनुष्योंकी आयु तीन पल्यकी है, शरीरकी
ऊँचाई छह हजार धनुष है। उनका भोजन तीन दिनके अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग
सोनेके समान पीला है।
§ ४२३. उत्तर दिशावर्ती क्षेत्रोंमें क्या अवस्था है इसके बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र
कहते हैं—
दक्षिणके समान उत्तरमें है ॥ ३०॥
§ ४२४. जिस प्रकार दक्षिणके क्षेत्रोंका व्याख्यान किया उसी प्रकार उत्तरके क्षेत्रोंका
जानना चाहिए। हैरण्यवत क्षेत्रोंके मनुष्योंकी सब बातें हैमवतके मनुष्योंके समान हैं, रम्यक क्षेत्रके
मनुष्योंकी सब बातें हरिवर्ष क्षेत्रके मनुष्योंके समान हैं और देवकुरु क्षेत्रके मनुष्योंकी सब बातें
उत्तरकुरु क्षेत्रके मनुष्योंके समान हैं।
§ ४२५. पाँच विदेहोंमें क्या स्थिति है इसके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विदेहोंमें संख्यात वर्षकी आयुवाले प्राणी हैं ॥ ३१ ॥
§ ४२६. सब विदेहोंमें संख्यात वर्षकी आयुवाले मनुष्य होते हैं। वहाँ सुषमदुःषमा कालके
१. सर्वेषु पञ्चसु महाविदे-मु० । २. कालः दुःषमसुषमादिः सदा तां०, ना० ।
- ३।३३§ ४३० ] तृतीयाऽध्यायः १६५
वस्थितः । मनुष्याश्च पञ्चधनुःशतोत्सेधाः । नित्यहाराः । उत्कर्षेणैकपूर्वकोटिस्थितिकाः ।
जघन्येनान्तर्मुहूर्तायुषः । तस्याश्च १ सम्बन्धे गाथां पठन्ति—
"पुव्वस्स दु परिमाणं सदरि खलु कोडिसदसहस्साई ।
छप्पण्णं च सहस्सा बोद्धव्वा वासकोडीणं २ ॥"
§ ४२७. उक्तो भरतस्य विष्कम्भः । पुनः प्रकारान्तरेण तत्प्रतिपत्त्यर्थमाह—
भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभागः ॥३२॥
§ ४२८. जम्बूद्वीपविष्कम्भस्य योजनशतसहस्रस्य नवतिशतभागीकृतस्यैको भागो भरतस्य
विष्कम्भः । स पूर्वोक्त एव । उक्तं जम्बूद्वीपं परिवृत्य वेदिका स्थिता, ततः परो लवणोदः समुद्रो
द्वियोजनशतसहस्रवलयविष्कम्भः । ततः परो धातकीखण्डो द्वीपश्चतुर्योजनशतसहस्रवलयविष्कम्भः ।
§ ४२९. तत्र वर्षादीनां संख्यादि ३ विधिप्रतिपत्त्यर्थमाह—
द्विर्धातकीखण्डे ॥३३॥
§ ४३०. भरतादीनां द्रव्याणामिहावृत्तिर्विवक्षिता । तत्र कथं सुच् । अध्याह्रियमाण-
क्रियाभ्यावृत्तिद्योतनार्थः सुच् । यथा द्विस्तावानयं प्रासादो मीयत इति । एवं ४ द्विर्धातकीखण्डे
भरतादयो मीयन्ते इति । तद्यथा—द्वाभ्यामिष्वाकारपर्वताभ्यां दक्षिणोत्तरायताभ्यां लवणोदका-
लोदवेदिकास्पृष्टकोटिभ्यां विभक्तो धातकीखण्डः पूर्वापर इति । तत्र पूर्वस्य ५ अपरस्य च मध्ये द्वौ
अन्तके समान काल सदा अवस्थित है । मनुष्योंके शरीरकी ऊँचाई पांच सौ धनुष होती है, वे प्रति-
दिन आहार करते हैं । उनको उत्कृष्ट आयु एक पूर्वकोटि वर्षप्रमाण और जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त
प्रमाण है । इसके सम्बन्धमें एक गाथा कही जाती है—
“एक पूर्वकोटिका प्रमाण सत्तर लाख करोड़ और छप्पन हजार करोड़ वर्ष जानना चाहिए”
§ ४२७. भरतक्षेत्रका विस्तार पहले कह आये हैं । अब प्रकारान्तरसे उसका ज्ञान करानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भरत क्षेत्रका विस्तार जम्बूद्वीपका एकसौ नब्बेवां भाग है ॥ ३२ ॥
§ ४२८. एक लाख योजन प्रमाण जम्बूद्वीपके विस्तारके एक सौ नब्बे भाग करनेपर जो
एक भाग प्राप्त हो उतना भरतक्षेत्रका विस्तार है जो कि पूर्वोक्त पांचसौ छब्बीस सही छह बटे
उन्नीस योजन होता है ।
§ ४२९. जो पहले जम्बूद्वीप कह आये उसके चारों ओर एक वेदिका है। इसके बाद लवण-
समुद्र है जिसका विस्तार दो लाख योजन है। इसके बाद धातकीखण्ड द्वीप है जिसका विस्तार
चार लाख योजन है। अब इसमें क्षेत्र आदिकी संख्याका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
धातकीखण्डमें क्षेत्र तथा पर्वत आदि जम्बूद्वीपसे दूने हैं ॥ ३३ ॥
§ ४३०. भरत आदि क्षेत्रोंकी यहाँ आवृत्ति विवक्षित है । शंका—सूत्रमें 'सुच्' प्रत्यय किस-
लिए किया है ? समाधान—वाक्य पूरा करने के लिए जो क्रिया जोड़ी जाती है उसकी आवृत्ति बत-
लानेके लिए 'सुच्' प्रत्यय किया है। जैसे 'द्विस्तावान् अयं प्रासादः' यहाँ 'सुच्' प्रत्ययके रहनेसे
है यह अनुमान किया जाता है । इसी प्रकार धातकीखण्डमें 'सुच्' से भरतादिक दूने ज्ञात हो जाते
हैं । यथा—अपने सिरेसे लवणोद और कालोदको स्पर्श करनेवाले और दक्षिणसे उत्तर तक लम्बे
इष्वाकार नामक दो पर्वतोंसे विभक्त होकर धातकीखण्ड द्वीपके दो भाग हो जाते हैं—पूर्व धातकी-
१. तस्यास्ति सम्बन्धे आं०, दि० १, दि० २ । २. -डीणं ॥ ७०५६००००००००० उक्तो मु०, ता०,
ना० । ३. संख्याविधि-मु० । ४. -त्कीषंडे ता०, ना०, दि० १, दि० २, आ० । ५. -र्वस्य चापरस्य
मध्ये मु० ।
१६६ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३४ § ४३१ -
मन्दरौ । तयोरुभयतो भरतादीनि क्षेत्राणि हिमवदादयश्च वर्षधरपर्वताः । एवं द्वौ भरतौ द्वौ
हिमवन्तौ इत्येवमादि संख्यानं द्विगुणं वेदितव्यम् । जम्बूद्वीपहिमवदादीनां वर्षधराणां यो विष्कम्भ-
स्तद्विगुणो धातकीखण्डे हिमवदादीनां वर्षधराणाम् । वर्षधराश्चक्राकारवदवस्थिताः । अरविवर-
संस्थानानि क्षेत्राणि । जम्बूद्वीपे यत्र जम्बूवृक्षः स्थितः, तत्र धातकीखण्डे धातकीवृक्षः सपरिवारः ।
तद्योगाद्धातकीखण्ड इति द्वीपस्य नाम प्रतीतम् । तत्परिक्षेपी कालोदः समुद्रः टङ्कोच्छिन्नतीर्थः अष्ट-
योजनशतसहस्रवलयविष्कम्भः । कालोदपरिक्षेपी पुष्करद्वीपः षोडशयोजनशतसहस्रवलयविष्कम्भः ।
§ ४३१. तत्र द्वीपान्भोनिधिविष्कम्भद्विगुणपरिक्लृप्तिवद्धातकीखण्डवर्षादिद्विगुणवृद्धिप्रसङ्गे
विशेषावधारणार्थमाह-
पुष्करार्द्धे च ॥३४॥
§ ४३२. किम् । द्विरित्यनुवर्तते । किमपेक्षा द्विरावृत्तिः । जम्बूद्वीपभरतहिमवदाद्यपेक्षयैव¹ ।
कुतः । व्याख्यानतः । यथा धातकीखण्डे हिमवदादीनां विष्कम्भस्तथा पुष्करार्धे हिमवदादीनां
विष्कम्भो द्विगुण इति व्याख्यायते । नामानि तान्येव, इष्वाकारौ मन्दरौ च पूर्ववत् । यत्रे² जम्बू-
वृक्षस्तत्र पुष्करं सपरिवारम् । तत एव तस्य³ द्वीपस्य नाम रूढं पुष्करद्वीप इति । अथ कथं
पुष्करार्द्धसंज्ञा । मानुषोत्तरशैलेन विभक्तार्धत्वात्पुष्करार्धसंज्ञा ।
खण्ड और पश्चिम धातकीखण्ड । इन पूर्व और पश्चिम दोनों खण्डोंके मध्यमें दो मन्दर अर्थात्
मेरु पर्वत हैं। इन दोनोंके दोनों ओर भरत आदि क्षेत्र और हिमवान् आदि पर्वत हैं। इस प्रकार
दो भरत दो हिमवान् इत्यादि रूपसे जम्बूद्वीपसे धातकीखण्ड द्वीपमें दूनी संख्या जाननी चाहिए ।
जम्बूद्वीपमें हिमवान् आदि पर्वतोंका जो विस्तार है धातकीखण्ड द्वीपमें हिमवान् आदि पर्वतोंका
उससे दूना विस्तार है। चक्केमें जिस प्रकार आरे होते हैं उसी प्रकार ये पर्वत क्षेत्रोंके मध्यमें
अवस्थित हैं। और चक्केमें छिद्रोंका जो आकार होता है यहाँ क्षेत्रोंका वही आकार है। जम्बूद्वीपमें
जहाँ जम्बू वृक्ष स्थित है धातकीखण्डद्वीपमें परिवार वृक्षोंके साथ वहाँ धातकी वृक्ष स्थित है ।
और इसके सम्बन्धसे द्वीपका नाम धातकीखण्ड प्रसिद्ध है। इसको घेरे हुए कालोद समुद्र है ।
जिसका घाट ऐसा मालूम देता है कि उसे टांकीसे काट दिया हो और जिसका विस्तार आठ लाख
योजन है। कालोदको घेरे हुए पुष्करद्वीप है जिसका विस्तार सोलह लाख योजन है।
§ ४३१. द्वीप और समुद्रोंका उत्तरोत्तर जिस प्रकार दूना दूना विस्तार बतलाया है उसी
प्रकार यहाँ धातकीखण्ड द्वीपके क्षेत्र आदि की संख्या दूनी प्राप्त होती है अतः विशेष निश्चय
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
पुष्करार्धमें उतने ही हैं ॥३४॥
§ ४३२. यहाँ 'द्वि' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। शंका- 'द्वि' इस पदकी किसकी अपेक्षा
अनुवृत्ति होती है ? समाधान - जम्बूद्वीपके भरत आदि क्षेत्र और हिमवान् आदि पर्वतोंकी अपेक्षा
'द्विः' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। शंका- यह कैसे समझा जाता है ? समाधान - व्याख्यान-
से। जिस प्रकार धातकीखण्ड द्वीपमें हिमवान् आदिका विस्तार कहा है उसी प्रकार पुष्करार्धमें
हिमवान् आदिका विस्तार दूना बतलाया है। नाम वे ही हैं। दो इष्वाकार और दो मन्दर पर्वत
पहलेके समान जानना चाहिए। जहाँ पर जम्बूद्वीपमें जम्बू वृक्ष है पुष्कर द्वीपमें वहाँ अपने परि-
वार वृक्षोंके साथ पुष्करवृक्ष है। और इसीलिए इस द्वीपका पुष्करद्वीप यह नाम रूढ़ हुआ है।
शंका-इस द्वीपको पुष्करार्ध यह संज्ञा कैसे प्राप्त हुई ? समाधान - इस द्वीपके मानुषोत्तर पर्वतके
कारण दो विभाग हो गये हैं अतः आधे द्वीपको पुष्करार्ध यह संज्ञा प्राप्त हुई ।
१. -पेक्षयैव । जम्बूद्वीपात्पुष्करार्धे द्वौ भरतौ द्वौ हिमवन्तौ, इत्यादि । कुतः मु०, दि० १, दि० २, आ० ।
२. यत्र जम्बूद्वीपे जम्बू-मु०, दि०, दि० २, आ० । ३. तस्य द्वीपस्यानुरूढं पुष्करद्वीप इति नाम । अथ मु० ।
§ ४३३. अत्राह किमर्थं जम्बूद्वीपहिमवदादिसंख्या द्विरावृत्ता पुष्करार्धे कथ्यते, न पुनः
कृत्स्न एव पुष्करद्वीपे । इत्यत्रोच्यते—
प्राङ् मानुषोत्तरान्मनुष्याः ॥३५॥
§ ४३४. पुष्करद्वीपबहुमध्यदेशभागी वलयवृत्तो मानुषोत्तरो नाम शैलः। तस्मात्प्रागेव
मनुष्या न बहिरिति । ततो न बहिः पूर्वोक्तक्षेत्रविभागोऽस्ति । नास्मादुत्तरं कदाचिदपि विद्याधरा ५
ऋद्धिप्राप्ता अपि मनुष्या गच्छन्ति अन्यत्रोपपादसमुद्घाताभ्याम् । ततोऽस्यान्वर्थसंज्ञा । एवं जम्बू-
द्वीपादिष्वर्धतृतीयेषु¹ द्वीपेषु द्वयोश्च समुद्रयोर्मनुष्या वेदितव्याः । ते द्विविधाः—
आर्या म्लेच्छाश्च ॥३६॥
§ ४३५. गुणैर्गुणवद्भिर्वा अर्यन्त इत्यार्याः । ते द्विविधा ऋद्धिप्राप्तार्या अनृद्धिप्राप्तार्याश्चेति ।
अनृद्धिप्राप्तार्याः पञ्चविधाः क्षेत्रार्या जात्यार्याः कर्मार्याश्चारित्रार्या दर्शनार्याश्चेति । ऋद्धिप्राप्तार्याः १०
§ ४३३. यहां शंकाकारका कहना है कि जम्बूद्वीपमें हिमवान् आदिकी जो संख्या है उससे
हिमवान् आदिकी दूनी संख्या आधे पुष्करद्वीपमें क्यों कही जाती है पूरे पुष्कर द्वीपमें क्यों नहीं
कही जाती ? अब इस शंकाका समाधान करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मानुषोत्तर पर्वतके पहले तक ही मनुष्य हैं ॥३५॥
§ ४३४. पुष्करद्वीपके ठीक मध्यमें चूड़ीके समान गोल मानुषोत्तर नामका पर्वत है । उसके १५
पहले-पहले ही मनुष्य हैं, उसके बाहर नहीं । इसलिए मानुषोत्तर पर्वतके बाहर पूर्वोक्त क्षेत्रोंका
विभाग नहीं है । इस पर्वतके उस ओर उपपाद जन्मवाले और समुद्घातको प्राप्त हुए मनुष्योंको
छोड़ कर और दूसरे विद्याधर या ऋद्धिप्राप्त मुनि भी कदाचित् नहीं जाते हैं इसलिए इस
पर्वतका मानुषोत्तर यह सार्थक नाम है। इस प्रकार जम्बूद्वीप आदि ढाई द्वीपोंमें और दो समुद्रों-
में मनुष्य जानना चाहिए । २०
विशेषार्थ—ढाई द्वीप और इनके मध्यमें आनेवाले दो समुद्र यह मनुष्यलोक है । मनुष्य
इसी क्षेत्रमें पाये जाते हैं । मानुषोत्तर पर्वत मनुष्यलोककी सीमापर स्थित होनेसे इसका
मानुषोत्तर यह नाम सार्थक है। मनुष्य इसी क्षेत्रमें रहते हैं उनका बाहर जाना सम्भव
नहीं, इसका यह अभिप्राय है कि गर्भमें आनेके बाद मरण पर्यन्त औदारिक शरीर या आहारक
शरीरके साथ वे इस क्षेत्रसे बाहर नहीं जा सकते । सम्मूर्च्छन मनुष्य तो इसके औदारिक शरीर २५
के आश्रयसे होते हैं इसलिए उनका मनुष्यलोकके बाहर जाना कथमपि सम्भव नहीं है। पर
इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी भी अवस्थामें मनुष्य इस क्षेत्रके बाहर नहीं पाये जाते हैं । ऐसी
तीन अवस्थाएँ हैं जिनके होनेपर मनुष्य इस क्षेत्रके भी बाहर पाये जाते हैं, यथा—(१) जो मनुष्य
मरकर ढाई द्वीपके बाहर उत्पन्न होनेवाले हैं वे यदि मरणके पहले मारणान्तिक समुद्घात करते
हैं तो इसके द्वारा उनका ढाई द्वीपके बाहर गमन देखा जाता है । (२) ढाई द्वीपके बाहर निवास ३०
करनेवाले जो जीव मरकर मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं उनका मनुष्य गतिनाम कर्मका उदय होनेपर
भी ढाई द्वीपमें प्रवेश करनेके पूर्व तक इस क्षेत्रके बाहर अस्तित्व देखा जाता है । (३) केवलिसमुद्-
घातके समय उनका मनुष्यलोकके बाहर अस्तित्व देखा जाता है । इन तीन अपवादोंको छोड़कर
और किसी अवस्थामें मनुष्योंका मनुष्यलोकके बाहर अस्तित्व नहीं देखा जाता । वे मनुष्य दो
प्रकारके हैं अब ये बतलाने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं— ३५
मनुष्य दो प्रकारके हैं—आर्य और म्लेच्छ ॥३६॥
§ ४३५. जो गुणों या गुणवालोंके द्वारा माने जाते हैं—वे आर्य कहलाते हैं। उनके दो
भेद हैं—ऋद्धिप्राप्त आर्य और ऋद्धिरहित आर्य । ऋद्धिरहित आर्य पांच प्रकारके हैं—क्षेत्रार्य,
१. –तीयेषु द्वयोश्च मु० ।
१६८ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३६ ६ ४३५ –
सप्तविधाः; बुद्धिविक्रियातपोबलौषधरसार्क्षीणभेदात् । म्लेच्छा द्विविधाः — अन्तर्द्वीपजाः कर्मभूमिजा-
श्चेति । तत्रान्तर्द्वीपा लवणोदधेरभ्यन्तरे पार्ष्वेष्वष्टासु दिक्ष्वष्टौ । तदन्तरेषु चाष्टौ । हिमवच्छिख-
रिणोरुभयोश्च विजयार्द्धयोरन्तेष्वष्टौ । तत्र दिक्षु द्वीपा वेदिकायास्तिर्यक् पञ्चयोजनशतानि प्रविश्य
५ भवन्ति । विदिक्ष्वन्तरेषु च द्वीपाः पञ्चाशत्पञ्चयोजनशतेषु गतेषु भवन्ति । शैलान्तेषु द्वीपाः षड्-
योजनशतेषु गतेषु भवन्ति । दिक्षु द्वीपाः शतयोजनविस्ताराः । विदिक्ष्वन्तरेषु च द्वीपास्तदर्ध-
विष्कम्भाः । शैलान्तेषु पञ्चविंशतियोजनविस्ताराः । तत्र पूर्वस्यां दिश्येकोरुकाः । अपरस्यां दिशि
लाङ्गूलिनः । उत्तरस्यां दिश्यभाषकाः । दक्षिणस्यां दिशि विषाणिनः । शशकर्णशष्कुलीकर्ण-
प्रावेरणकर्णलम्बकर्णाः विदिक्षु । अश्वसिंहश्वमहिषवराहव्याघ्रकौककपामुखा अन्तरेषु । मेघमुख-
विद्युन्मुखाः शिखरिण उभयोरन्तयोः । मत्स्यमुखकालमुखा हिमवत उभयोरन्तयोः । हस्तिमुखा-
१० दर्दांमुखा उत्तरविजयार्धस्योभयोरन्तयोः । गोमुखमेषमुखा दक्षिणविजयार्धस्योभयोरन्तयोः ।
एकोरुका मृदाहारा गुहावासिनः । शेषाः पुष्पफलाहारा वृक्षवासिनः । सर्वे ते पल्योपमायुषः । तं
चतुर्विंशतिरपि द्वीपा जलतलादेकयोजनोत्सेधाः । लवणोदधेर्बाह्यपार्श्वेऽप्येवं चतुर्विंशतिर्दीपा
जात्यार्य, कर्मार्य, चारित्रार्य और दर्शनार्य । बुद्धि, विक्रिया, तप, बल, औषध, रस और अक्षीण
ऋद्धिके भेदसे ऋद्धि प्राप्त आर्य सात प्रकारके हैं। म्लेच्छ दो प्रकारके हैं—अन्तर्द्वीपज म्लेच्छ
और कर्मभूमिज म्लेच्छ । लवणसमुद्रके भीतर आठों दिशाओंमें आठ अन्तर्द्वीप हैं और उनके अन्त-
१५ रालमें आठ अन्तर्द्वीप और हैं। तथा हिमवान् और शिखरी इन दोनों पर्वतोंके अन्तमें और दोनों
विजयार्ध पर्वतोंके अन्तमें आठ अन्तर्द्वीप हैं। इनमें-से जो दिशाओंमें द्वीप हैं वे वेदिकासे तिरछे पाँचसौ
योजन भीतर जाकर हैं। विदिशाओं और अन्तरालोंमें जो द्वीप हैं वे पाँचसौ पचास योजन भीतर
जाकर हैं। तथा पर्वतोंके अन्तमें जो द्वीप हैं वे छहसौ योजन भीतर जाकर हैं। दिशाओंमें स्थित
द्वीपोंका विस्तार सौ योजन है। विदिशाओं और अन्तरालोंमें स्थित द्वीपोंका विस्तार उससे आधा
२० अर्थात् पचास योजन है। तथा पर्वतोंके अन्तमें स्थित द्वीपोंका विस्तार पच्चीस योजन है। पूर्व
दिशामें एक टाँगवाले मनुष्य हैं। पश्चिम दिशामें पूँछवाले मनुष्य हैं। उत्तर दिशामें गूँगे मनुष्य
हैं और दक्षिण दिशामें सींगवाले मनुष्य हैं। चारों विदिशाओंमें क्रमसे खरगोशके समान कानवाले,
शष्कुली अर्थात् मछली अथवा पूड़ीके समान कानवाले, प्रावरणके समान कानवाले और लम्बे
कानवाले मनुष्य हैं। आठों अन्तरालके द्वीपोंमें क्रमसे घोड़ेके समान मुखवाले, सिंहके समान मुख-
२५ वाले, कुत्तेके समान मुखवाले, भैंसाके समान मुखवाले, सुअरके समान मुखवाले, व्याघ्रके समान
मुखवाले, कौआके समान मुखवाले और बन्दरके समान मुखवाले मनुष्य हैं। —शिखरी पर्वतके
दोनों कोणोंकी सीधमें जो अन्तर्द्वीप हैं उनमें मेघके समान मुखवाले और बिजलीके समान मुखवाले
मनुष्य हैं। हिमवान् पर्वतके दोनों कोणोंकी सीधमें जो अन्तर्द्वीप हैं उनमें मछलीके समान मुखवाले
और कालके समान मुखवाले मनुष्य हैं। उत्तर विजयार्धके दोनों कोणोंकी सीधमें जो अन्तर्द्वीप हैं
३० उनमें हाथीके समान मुखवाले और दर्पणके समान मुखवाले मनुष्य हैं। तथा दक्षिण विजयार्धके
दोनों कोणोंकी सीधमें जो अन्तर्द्वीप हैं उनमें गायके समान मुखवाले और मेढ़ाके समान मुखवाले
मनुष्य हैं। इनमें-से एक टाँगवाले मनुष्य गुफाओंमें निवास करते हैं और मिट्टीका आहार करते
हैं। तथा शेष मनुष्य फूलों और फलोंका आहार करते हैं और पेड़ोंपर रहते हैं। इन सबकी आयु
१. लवणोदे अष्टासु दिक्ष्वष्टौ आ० दि० १, दि० २ । लवणोदधेरभ्यन्तरेऽष्टासु दिक्ष्वष्टौ मु० ।
३५ २. उत्तरस्यामभाषकाः आ० दि० १, दि० २ । ३. - णस्यां विषा- दि० १, दि० २ । ४. -वरणलम्ब मु० ।
५ काकवूककपि-मु० । ६. मेघविद्यु-मु० । ७. दक्षिणदिग्विण- मु० । ८. - शतिद्वितीयपक्षेऽपि उभयोस्त-
त्वेष्टचत्वारिंशद्द्बीपाः जलतला- दि० २ । ९. -त्सेधाः । तथा कालोदेऽपि आ०, दि० १ ।
- ३।३७ § ४३७ ] तृतीयोऽध्यायः १६९
विज्ञातव्याः । तथा कालोदेऽपि वेदितव्याः । त एतेऽन्तद्वीपजा म्लेच्छाः । कर्मभूमिजाश्च शक-
यवनशबरपुलिन्दादयः ।
§ ४३६. काः पुनः कर्मभूमय इत्यत आह—
भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरुत्तरकुरुभ्यः ॥३७॥
§ ४३७. भरता१ ऐरावता विदेहाश्च पञ्च, पञ्च, एताः कर्मभूमय इति व्यपदिश्यन्ते । तत्र ५
'विदेह'ग्रहणाद्देवकुरूत्तरकुरुग्रहणे प्रसक्ते तत्प्रतिषेधार्थमाह—'अन्यत्र देवकुरुत्तरकुरुभ्यः' इति ।
'अन्यत्र' शब्दो वर्जनार्थः । देवकुरव उत्तरकुरवो हैमवतो हरिवर्षो २रम्यको हैरण्यवतोऽन्तद्वीपाश्च
भोगभूमय इति व्यपदिश्यन्ते । अथ कथं कर्मभूमित्वम् । शुभाशुभलक्षणस्य कर्मणोऽधिष्ठानत्वात् ।
ननु सर्वं ३लोकत्रितयं कर्मणोऽधिष्ठानमेव । तत एवं ४ प्रकर्षगतिर्विज्ञास्यते, प्रकर्षेण यत्कर्मणोऽधि-
ष्ठानमिति । तत्राशुभकर्मणस्तावत्सप्तमनरकप्रापणस्य भरतादिष्वेवार्जनम्, शुभस्य५ च सर्वार्थ- १०
सिद्ध्यादि६स्थानविशेषप्रापणस्य कर्मण उपार्जनं तत्रैव, कृष्यादिलक्षणस्य षड्विधस्य कर्मणः
पात्रदानादिसहितस्य तत्रैवारम्भात्कर्मभूमिव्यपदेशो वेदितव्यः । इतरास्तु दशविधकल्पवृक्षकल्पित-
भोगानुभवनविषयत्वाद् भोगभूमय इति व्यपदिश्यन्ते ।
एक पल्यप्रमाण है । ये चौबीसों अन्तद्वीप जलकी सतहसे एक योजन ऊँचे हैं । इसी प्रकार कालोद
समुद्रमें भी जानना चाहिए । ये सब अन्तद्वीपज म्लेच्छ हैं । इनसे अतिरिक्त जो शक, यवन, शबर १५
और पुलिन्दादिक हैं वे सब कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं ।
विशेषार्थ—षट्खण्डागममें मनुष्योंके दो भेद किये गये हैं—कर्मभूमिज और अकर्मभूमिज ।
अकर्मभूमि भोगभूमिका दूसरा नाम है । भोगभूमिका एक भेद कुभोगभूमि है । उसमें जन्म लेनेवाले
मनुष्य ही यहाँ अन्तद्वीपज म्लेच्छ कहे गये हैं। शेष रहे शक, यवन, शबर और पुलिन्द आदि म्लेच्छ
कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं । इसी प्रकार आर्य भी क्षेत्रकी अपेक्षा दो भागोंमें विभक्त हैं-कर्मभूमिज आर्य २०
और अकर्मभूमिज आर्य । तीनों भोगभूमियोंके मनुष्य अकर्मभूमिज आर्य हैं और कर्मभूमिके आर्य
कर्मभूमिज आर्य हैं । इनमें-से अकर्मभूमिज आर्य और म्लेच्छोंके अविरत सम्यग्दृष्टि तक चार
गुणस्थान हो सकते हैं किन्तु कर्मभूमिज आर्य और म्लेच्छ अणुव्रत और महाव्रतके भी अधिकारी
हैं । इनके संयमासंयम और संयमस्थानोंका विशेष व्याख्यान लब्धिसार क्षपणासारमें किया है ।
§ ४३६. कर्मभूमियां कौन-कौन हैं, अब इस बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २५
देवकुरु और उत्तरकुरुके सिवा भरत, ऐरावत और विदेह ये सब कर्मभूमि हैं ॥३७॥
§ ४३७. भरत, ऐरावत और विदेह ये प्रत्येक पाँच-पाँच हैं । ये सब कर्मभूमियां कही जाती
हैं । इनमें विदेहका ग्रहण किया है इसलिए देवकुरु और उत्तरकुरुका भी ग्रहण प्राप्त होता है अतः
उनका निषेध करनेके लिए 'अन्यत्र देवकुरुत्तरकुरुभ्यः' यह पद रखा है । अन्यत्र शब्दका अर्थ
निषेध है । देवकुरु, उत्तरकुरु, हैमवत, हरिवर्ष, रम्यक, हैरण्यवत और अन्तद्वीप ये भोगभूमियां ३०
कही जाती हैं । शंका—कर्मभूमि यह संज्ञा कैसे प्राप्त होती है ? समाधान—जो शुभ और अशुभ
कर्मोंका आश्रय हो उसे कर्मभूमि कहते हैं । यद्यपि तीनों लोक कर्मका आश्रय है फिर भी इससे
उत्कृष्ट्ताका ज्ञान होता है कि ये प्रकर्ष रूपसे कर्मका आश्रय हैं । सातवें नरकको प्राप्त करनेवाले
अशुभ कर्मका भरतादि क्षेत्रोंमें ही अर्जन किया जाता है इसी प्रकार सर्वार्थसिद्धि आदि स्थान
विशेषको प्राप्त करानेवाले पुण्य कर्मका उपार्जन भी यहीं पर होता है । तथा पात्रदान आदिके ३५
साथ कृषि आदि छह प्रकारके कर्मका आरम्भ यहीं पर होता है इसलिए भरतादिकको कर्मभूमि
१. भरतैरावतविदेहाश्च मु०, ता०, ना० । २. हरिवंशः रम्य-आ०, दि० १, दि० २ । ३. सर्वो
लोकत्रितयः कर्म-आ०, दि० १, दि० २ । ४. एक प्रक-मु० । ५. शुभस्य सर्वा-मु० । ६. -द्ध्यादिषु
स्थान-आ०, दि० १, दि० २ । ७. -पणस्य पुण्यकर्म-मु० ।
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१७० सर्वार्थसिद्धौ [ २।३८ § ४३८ –
§ ४३८. उक्तासु भूमिषु मनुष्याणां स्थितिपरिच्छेदार्थमाह—
नृस्थिती परावरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते ॥३८॥
§ ४३९. त्रीणि पल्योपमानि यस्याः सा त्रिपल्योपमा । अन्तर्गतो मुहूर्तो यस्याः सा अन्त-
मुहूर्ता । यथासंख्येनभिसंबन्धः । मनुष्याणां परा उत्कृष्टा स्थितित्रिपल्योपमा । अपरा जघन्या
अन्तर्मुहूर्ता । मध्ये अनेकविकल्पाः । तत्र पल्यं त्रिविधम्—व्यवहारपल्यमुद्धारपल्यमद्धापल्यमिति ।
अन्वर्थसंज्ञा एताः । आद्यं व्यवहारपल्यमित्युच्यते; उत्तरपल्यद्वयव्यवहारबीजत्वात् । नानेन
किंचित्परिच्छेद्यमस्तीति । द्वितीयमुद्धारपल्यम् । तत उद्धृतैर्लोमकच्छेदैर्द्दीपसमुद्राः संख्यायन्त
इति । तृतीयमद्धापल्यम् । अद्धा कालस्थितिरित्यर्थः । तत्राद्यस्य प्रमाणं कथ्यते, तत्परिच्छेदनार्थ-
त्वात् । तद्यथा—प्रमाणाङ्गुलपरिमितयोजनविष्कम्भायामावगाहानि त्रीणि पल्यानि कुशूला
इत्यर्थः । एकादिसप्तान्ताराहोरात्रजाताविवालाग्राणि तावच्छिन्नानि यावद्द्वितीयं कर्तरिच्छेदं
नैवाप्नुवन्ति, तादृशैर्लोमच्छेदैः परिपूर्णं घनीकृतं व्यवहारपल्यमित्युच्यते । ततो वर्षशते वर्षशते
गते एकैक्लोमापकर्षणविधिना यावता कालेन तद्रिक्तं भवेत्तावान्कालो व्यवहारपल्योपमाख्यः ।
चाहिए । इतर क्षेत्रोंमें दस प्रकारके कल्पवृक्षोंसे प्राप्त भोगोंकी मुख्यता है इसलिए वे भोगभूमियां
कहलाती हैं।
विशेषार्थ—यह पहले ही बतला आये हैं कि भरतादि क्षेत्रोंका विभाग ढाई द्वीपमें ही है ।
जम्बूद्वीपमें भरतादि क्षेत्र एक-एक हैं और धातकीखण्ड व पुष्करार्धमें ये दो-दो हैं । इस प्रकार कुल
क्षेत्र ३५ होते हैं। उसमें भी उत्तरकुरु और देवकुरु विदेह क्षेत्रमें होकर भी अलग गिने जाते हैं,
क्योंकि यहां उत्तम भोगभूमिकी व्यवस्था है, इसलिए पांच विदेहोंके पांच देवकुरु और पांच उत्तरकुरु
इनको उक्त ३५ क्षेत्रोंमें मिलानेपर कुल ४५ क्षेत्र होते हैं। इनमें से ५ भरत, ५ विदेह और ५ ऐरावत
ये १५ कर्मभूमियां हैं और शेष ३० भोगभूमियां हैं। ये सब कर्मभूमि और भोगभूमि क्यों कहलाती
हैं इस बातको निर्देश मूल टीकामें किया ही है।
§ ४३८. उक्त भूमियोंमें स्थितिका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मनुष्योंकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य और जघन्य अन्तर्मुहूर्त है ॥३८॥
§ ४३९. 'त्रिपल्योपमा' इस वाक्यमें 'त्रि' और 'पल्योपम' का बहुव्रीहि समास है। मुहूर्तके
भीतरके कालको अन्तर्मुहूर्त कहते हैं। पर और अपर के साथ इन दोनोंका क्रमसे सम्बन्ध है ।
मनुष्योंकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य है और जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है। तथा मध्यकी स्थिति
अनेक प्रकारकी है। पल्य तीन प्रकारका है—व्यवहार पल्य, उद्धारपल्य और अद्धापल्य । ये तीनों
सार्थक नाम हैं। आदिके पल्यको व्यवहारपल्य कहते हैं, क्योंकि वह आगेके दो पल्योंके व्यवहारका
मूल है। इसके द्वारा और किसी वस्तुका परिमाण नहीं किया जाता। दूसरा उद्धारपल्य है।
उद्धारपल्यमें-से निकाले गये लोमके छेदोंके द्वारा द्वीप और समुद्रोंकी गिनती की जाती है। तीसरा
अद्धापल्य है। अद्धा और कालस्थिति ये एकार्थवाची शब्द हैं। इनमें-से अब प्रथम पल्यका प्रमाण
कहते हैं—जो इस प्रकार है—प्रमाणांगुलकी गणनासे एक-एक योजन लम्बे, चौड़े और गहरे तीन
गढ़ा करो और इनमें-से एकमें एक दिनसे लेकर सात दिन तक के पैदा हुए मेढ़ेके रोमोंके अग्र
भागोंको ऐसे टुकड़े करके भरो जिससे कैंचीसे उसके दूसरे टुकड़े न किये जा सकें। अनन्तर सौ-सौ
वर्षमें एक-एक रोमका टुकड़ा निकालो। इस विधिसे जितने कालमें वह गढ़ा खाली हो वह सब
काल व्यवहार पल्योपम नामसे कहा जाता है। अनन्तर असंख्यात करोड़ वर्षोंके जितने समय हों
१. -मिषु स्थिति-मु० । २. -द्वयस्य व्यव- मु० । ३. कथ्यते । तद्यथा मु० । ४. नाप्नु-मु० । ५. घनीभूतं
मु० । ६. ततो वर्षशते एकैक- मु० ।