सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 271, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 271
- ३।२१ § ४०६ ] तृतीयोऽध्यायः १५९
§ ४०३. तेषु पुष्करेषु कर्णिकामध्यदेशनिवेशिनः शरद्विमलपूर्णचन्द्रद्युतिहराः क्रोशायामाः
क्रोशार्द्धविष्कम्भा देशोनक्रोशोत्सेधाः प्रासादाः । तेषु निवसन्तत्येवंशीलास्तन्निवासिन्यः, देव्यः
श्रीह्रीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्मीसंज्ञिकास्तेषु पद्मादिषु यथाक्रमं वेदितव्याः । 'पल्योपमस्थितयः' इत्यने-
नायुषः प्रमाणमुक्तम् । समाने स्थाने भवाः सामानिकाः । सामानिकाश्च परिषदश्च सामानिक-
परिषदः । सह सामानिकपरिषदभिर्वर्त्तन्त इति ससामानिकपरिषत्काः । तस्य पद्मस्य परिवार- ५
पद्मेषु प्रासादानामुपरि सामानिकाः परिषदश्च वसन्ति ।
§ ४०४. यकाभिः सरिद्भिस्तानि क्षेत्राणि प्रविभक्तानि ता उच्यन्ते—
गङ्गासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकान्तासीतासीतोदानारीनरकान्ता-
सुवर्णरूप्यकूलारक्तारक्तोदाः सरितस्तन्मध्यगाः ॥२०॥
§ ४०५. सरितो न वाप्यः । ताः किमन्र्तरा उत समीपाः । इत्यत आह तन्मध्यगाः । तेषां १०
क्षेत्राणां मध्यं, तन्मध्यम् । तन्मध्यं तन्मध्येन वा गच्छन्तीति तन्मध्यगाः। एकत्र सर्वासाम्
प्रसंगनिवृत्त्यर्थं दिग्विषेशप्रतिपत्त्यर्थं चाह—
द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः पूर्वगाः ॥२१॥
§ ४०६. द्वयोर्द्वयोः सरितोरेकैकं क्षेत्रं विषय इति वाक्यशेषाभिसंबन्धादेकत्र सर्वासाम्
प्रसंगनिवृत्तिः कृता । 'पूर्वाः पूर्वगाः' इति वचनं दिग्विषेशप्रतिपत्त्यर्थम् । तत्र पूर्वा याः सरितस्ताः १५
पूर्वगाः । ^१पूर्वजलधिं गच्छन्तीति पूर्वगाः । किमपेक्षं पूर्वत्वम् । सूत्रनिर्देशापेक्षम् । यद्येवं गङ्गा-
§ ४०३. इन कमलोंकी कर्णिकाके मध्यमें शरत्कालीन निर्मल पूर्ण चन्द्रमाकी कान्तिको
हरनेवाले एक कोस लम्बे, आधा कोस चौड़े और पौन कोस ऊँचे महल हैं । उनमें निवास करने-
वाली श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी नामवाली देवियाँ क्रमसे पद्म आदि छह कमलोंमें
जानना चाहिए। 'उनकी स्थिति एक पल्यकी है' इस पदके द्वारा उनकी आयुका प्रमाण कहा है। २०
समान स्थानमें जो होते हैं वे सामानिक कहलाते हैं। सामानिक और परिषत्क ये देव हैं । वे
देवियां इनके साथ रहती हैं। तात्पर्य यह है कि मुख्य कमलके जो परिवार कमल हैं उनके महलों-
में सामानिक और परिषद् जातिके देव रहते हैं ।
§ ४०४. जिन नदियोंसे क्षेत्रोंका विभाग हुआ है अब उन नदियोंका कथन करनेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं— २५
इन भरत आदि क्षेत्रोंमेंसे गंगा, सिन्धु, रोहित, रोहितास्या, हरित, हरिकान्ता, सीता,
सीतोदा, नारी, नरकान्ता, सुवर्णकूला, रूप्यंकूला, रक्ता और रक्तोदा नदियाँ बही हैं ॥ २० ॥
§ ४०५. ये नदियाँ हैं तालाब नहीं। वे नदियां अन्तरालसे हैं या पास-पास इस बातका
खुलासा करनेके लिए सूत्रमें 'तन्मध्यगाः' पद दिया है। इसका यह भाव है कि उन क्षेत्रोंमें या उन
क्षेत्रोंमें-से होकर वे नदियां बही हैं। एक स्थानमें सबका प्रसंग प्राप्त होता है अतः इसका ३०
निराकरण करके दिशा विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
दो-दो नदियोंमें-से पहली-पहली नदी पूर्व समुद्रको जाती है ॥ २१ ॥
§ ४०६. इस सूत्रमें 'दो-दो नदियां एक-एक क्षेत्रमें हैं' इस प्रकार वाक्यविशेषका सम्बन्ध
कर लेनेसे एक क्षेत्रमें सब नदियोंके प्रसंग होनेका निराकरण हो जाता है। 'पूर्वाः पूर्वगाः' यह
वचन दिशाविशेषका ज्ञान करानेके लिए दिया है । इन नदियोंमें जो प्रथम नदियां हैं वे पूर्व समुद्र- ३५
में जाकर मिली हैं । सूत्रमें जो 'पूर्वगाः' पद है उसका अर्थ 'पूर्व समुद्रको जाती हैं' यह है ।
१. मध्यं तन्मध्यं तन्मध्येन मु० । मध्यं तन्मध्येन आ०, दि० १, दि० २ । २. -पूर्वं जलंधि मु० ।