सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।११ § ३८७ –
तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनील-
रुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वताः ॥११॥
§ ३८७. तानि क्षेत्राणि विभजन्ति इत्येवंशीलास्तद्विभाजिनः । पूर्वापरायता इति पूर्वा-
परकोटिभ्यां लवणजलधिस्पर्शिन इत्यर्थः । हिमवदादयोऽनादिकालप्रवृत्ता अनिमित्तसंज्ञा वर्षविभाग-
हेतुत्वाद्वर्षधरपर्वता इत्युच्यन्ते । तत्र क्व हिमवान् । भरतस्य हैमवतस्य च सीमनि¹ व्यवस्थितः ।
क्षुद्रहिमवान् योजनशतोच्छ्रायः । हैमवतस्य हरिवर्षस्य² च विभागकरो महाहिमवान् द्वियोजन-
शतोच्छ्रायः³ । विदेहस्य दक्षिणतो हरिवर्षस्योत्तरतो निषधो नाम पर्वतश्चतुर्योजनशतोच्छ्रायः ।
उत्तरे त्रयोऽपि पर्वताः स्ववर्षविभाजिनो व्याख्याताः । उच्छ्रायश्च तेषां चत्वारि द्वे एकं च योजन-
शतं वेदितव्यम्⁴ । सर्वेषां पर्वतानामुच्छ्रायस्य चतुर्थांशोऽवगाहः ।
§ ३८८. तेषां वर्णविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः ॥१२॥
§ ३८९. त एते हिमवदादयः पर्वता हेमादिमया वेदितव्या यथाक्रमम् । हेममयो हिमवान्
चीनपट्टवर्णः । अर्जुनमयो महाहिमवान् शुक्लवर्णः । तपनीयमयो निषधस्तरुणादित्यवर्णः । वैडूर्य-
मयो नीलो मयूरग्रीवाभः । रजतमयो रुक्मी शुक्लः । हेममयः शिखरी चीनपट्टवर्णः ।
उन क्षेत्रोंको विभाजित करनेवाले और पूर्व-पश्चिम लम्बे ऐसे हिमवान्, महाहिमवान्,
निषध, नील, रुक्मी और शिखरिण ये छह वर्षधर पर्वत हैं ॥ ११ ॥
§ ३८७. इन पर्वतोंका स्वभाव उन क्षेत्रोंका विभाग करना है इसलिए इन्हें उनका विभाग
करनेवाला कहा है । ये पूर्वसे पश्चिम तक लम्बे हैं । इसका यह भाव है कि इन्होंने अपने पूर्व और
पश्चिम सिरेसे लवण समुद्रको स्पर्श किया है । ये हिमवान् आदि संज्ञाएँ अनादि कालसे चली आ
रही हैं और बिना निमित्तकी हैं । इन पर्वतोंके कारण क्षेत्रोंका विभाग होता है इसलिए इन्हें
वर्षधर पर्वत कहते हैं । हिमवान् पर्वत कहाँ है अब इसे बतलाते हैं-भरत और हैमवत क्षेत्रकी
सीमापर हिमवान् पर्वत स्थित है । इसे क्षुद्र हिमवान् भी कहते हैं। यह सौ योजन ऊँचा है ।
हैमवत और हरिवर्षका विभाग करनेवाला महाहिमवान् है। यह दो सो योजन ऊँचा है। विदेहके
दक्षिणमें और हरिवर्षके उत्तरमें निषध पर्वत है । यह चार सो योजन ऊँचा है । इसी प्रकार आगे-
के तीन पर्वत भी अपने-अपने क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले जानने चाहिए । उनकी ऊँचाई क्रमशः
चार सौ, दो सौ और सौ योजन जाननी चाहिए । इन सब पर्वतोंकी जड़ अपनी ऊँचाईका एक
बटे चार भाग है ।
§ ३८८. अब इन पर्वतोंके वर्णविशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ये छहों पर्वत क्रमसे सोना, चाँदी, तपाया हुआ सोना, वैडूर्यमणि, चाँदी और सोना इनके
समान रंगवाले हैं ॥ १२ ॥
§ ३८९. वे पर्वत क्रमसे हेम आदि वर्णवाले जानने चाहिए । हिमवान् पर्वतका रंग हेममय
अर्थात् चीनी रेशमके समान है । महाहिमवान्का रंग अर्जुनमय अर्थात् सफेद है । निषध पर्वतका
रंग तपाये गये सोनेके समान अर्थात् उगते हुए सूर्यके रंगके समान है । नील पर्वतका रंग वैडूर्यमय
अर्थात् मोरके गलेकी आभावाला है । रुक्मी पर्वतका रंग रजतमय अर्थात् सफेद है और शिखरी
पर्वतका रंग हेममय अर्थात् चीनी रेशमके समान है ।
१. सीमन्यव-आ०, दि० १, दि० २ । २. हरिवंशस्य च विभा-आ०, दि० १, दि० २ । ३. -च्छ्रायः । महा-
विदेहस्य आ०, दि० १, दि० २ । ४. -तव्यम् । पर्वता-मु० ।