सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें– ३।१६ § ३९६ ] तृतीयाऽध्यायः १५७
§ ३९०. पुनरपि ¹तद्विशेषणार्थमाह—
मणिविचित्रपाश्र्वा उपरि मूले च तुल्यविस्ताराः ॥१३॥
§ ३९१. नानावर्णप्रभादिगुणोपेतैर्मणिभिर्विचित्राणि पाश्र्वाणि येषां ते मणिविचित्रपाश्र्वाः ।
अनिष्ट²संस्थानस्य निवृत्त्यर्थमुपर्यादिवचनं क्रियते । 'च'शब्दो मध्यसमुच्चयार्थः । य एषां मूले ५
विस्तारः स उपरि मध्ये च तुल्यः ।
§ ३९२. तेषां मध्ये लब्धास्पदा ह्रदा उच्यन्ते—
पद्ममहापद्मतिगिञ्छकेसरिमहापुण्डरीकपुण्डरीका ह्रदास्तेषामुपरि ॥१४॥
§ ३९३. पद्मो महापद्मस्तिगिञ्छः केसरी महापुण्डरीकः पुण्डरीक इति तेषां हिमवदादीना-
मुपरि यथाक्रममेते ह्रदा वेदितव्याः । १०
§ ३९४. तत्राद्यस्य संस्थानविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
प्रथमो योजनसहस्रायामस्तदर्द्धविष्कम्भो ह्रदः ॥१५॥
§ ३९५. प्राक्प्रत्यग् योजनसहस्रायाम उदग्वाक् पञ्चयोजनशतविस्तारो वज्रमयतलो
विविधमणिकनकविचित्रिततटः पद्मनामा ह्रदः ।
§ ३९६. तस्यावगाहप्रक्लृप्त्यर्थमिदमुच्यते— १५
दशयोजनावगाहः ॥१६॥
§ ३९०. इन पर्वतोंकी और विशेषताका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
इनके पार्श्व मणियोंसे चित्र-विचित्र हैं तथा वे ऊपर, मध्य और मूलमें समान विस्तार-
वाले हैं ॥ १३ ॥
§ ३९१. इन पर्वतोंके पार्श्व भाग नाना रंग और नाना प्रकारकी प्रभा आदि गुणोंसे युक्त
मणियोंसे विचित्र हैं इसलिए सूत्रमें इन्हें मणियोंसे विचित्र पार्श्ववाले कहा है । अनिष्ट आकारके २०
निराकरण करनेके लिए सूत्रमें 'उपरि' आदि पद रखे हैं। 'च' शब्द समुच्चयवाची है। तात्पर्य
यह है कि इनका मूलमें जो विस्तार है वही ऊपर और मध्यमें है ।
§ ३९२. इन पर्वतोंके मध्यमें जो तालाब हैं उनका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
इन पर्वतोंके ऊपर क्रमसे पद्म, महापद्म, तिगिंछ, केसरी, महापुण्डरीक और पुण्डरीक ये २५
तालाब हैं ॥ १४ ॥
§ ३९३. पद्म, महापद्म, तिगिञ्छ, केसरी, महापुण्डरीक और पुण्डरीक ये छह तालाब हैं जो
उन हिमवान् आदि पर्वतोंपर क्रमसे जानना चाहिए ।
§ ३९४. इनमें-से पहले तालाबके आकार-विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं— ३०
पहला तालाब एक हजार योजन लम्बा और इससे आधा चौड़ा हैं ॥ १५ ॥
§ ३९५. पद्म नामक तालाब पूर्व और पश्चिम एक हजार योजन लम्बा है और पांच सौ
योजन चौड़ा है । इसका तलभाग वज्रसे बना हुआ है। तथा इसका तट भाग नाना प्रकारके मणि
और सोनेसे चित्रविचित्र है ।
§ ३९६. अब इसकी गहराई दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— ३५
दस योजन गहरा है ॥ १६ ॥
१. तद्विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह मु० । २. -ष्टस्य संस्था-मु० ।
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