सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
§ २६२. य उक्तः क्षायोपशमिको भावोऽष्टादशविकल्पस्तद्भेदनिरूपणार्थमाह—
ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्त्रित्रिपञ्चभेदाः सम्यक्त्वचारित्रसंयमासंयमाश्च ॥५॥
§ २६३. चत्वारश्च त्रयश्च त्रयश्च पञ्च च चतुस्त्रित्रिपञ्च¹ । ते भेदाः यासां ताश्चतु-
स्त्रित्रिपञ्चभेदाः । यथाक्रममित्यनुवर्तते । तेनाभिसंबन्धाच्चतुरादिभिर्ज्ञानादीन्यभिसंबध्यन्ते ।
चत्वारि ज्ञानानि, त्रीण्यज्ञानानि, त्रीणि दर्शनानि, पञ्च लब्धय इति । सर्वघातिस्पर्द्धकानामुदय-
आकर माताकी सेवा करती हैं, गर्भशोधन करती हैं, रक्षा करती हैं। तीर्थंकरके गर्भमें आनेपर
देव-देवियां उत्सव मनाते हैं। जन्म, तप, केवल और निर्वाणके समय भी ऐसा ही करते हैं।
केवलज्ञान होनेके बाद समवसरणकी रचना करते हैं, कुसुमवृष्टि करते हैं आदि। इसलिए मुख्यतः
ये अभयदानादि देवादिकोंकी भक्ति और धर्मानुरागके कार्य हैं, शरीर नामकर्म और तीर्थंकर
नामकर्मकी अपेक्षा रखनेवाले क्षायिक दान आदिके नहीं। फिर भी इन अभयदानादिको उपचारसे
इनका कार्य कहा है। ऐसा नहीं माननेपर ये तीन दोष आते हैं—१. निर्वाण कल्याणकके समय
शरीर नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म नहीं रहता, इसलिए वह नहीं बन सकेगा। २. गर्भमें
आनेके पहले जो रत्नवर्षा आदि कार्य होते हैं उन्हें अकारण मानना पड़ेगा। ३. गर्भ, जन्म और
तप कल्याणकके समय न तो क्षायिक दान आदि ही पाये जाते हैं और न तीर्थंकर प्रकृतिका उदय
ही रहता है, इसलिए इन कारणोंके अभावमें इन्हें भी अकारण मानना पड़ेगा। इन सब दोषोंसे
बचनेका एक ही उपाय है कि पांच कल्याणकोंको और समवसरण आदि बाह्य विभूतिको देवादिक-
की भक्ति और धर्मानुरागका कार्य मान लिया जाय। जिस प्रकार जिन-प्रतिमाका अभिषेक आदि
महोत्सव भी इसीके कार्य हैं इसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए। इसपर यह प्रश्न होता है कि
उक्त कार्य भले ही देवादिककी भक्ति और धर्मानुराग वश होते हों पर जन्मकल्याणकके समय जो
घण्टानाद आदि कार्य विशेष होते हैं उनका कारण तो धर्मानुराग और भक्ति नहीं है। यदि उनका
कारण पुण्यातिशय माना जाता है तो शेष कार्योंका कारण पुण्यातिशय माननेमें क्या आपत्ति है ?
समाधान यह है कि जिस प्रकार एक अवसर्पिणी या उत्सर्पिणीमें चौबीस तीर्थंकर, बारह चक्रवर्ती,
नौ नारायण, नौ प्रतिनारायण और नौ बलभद्र आदिके होनेका नियम है। यह कर्म विशेषका कार्य
नहीं। उस-उस कालके साथ ऐसा ही निमित्तनैमित्तिक सम्बन्ध है कि इस कालमें इतने तीर्थंकर, इतने
चक्रवर्ती आदि ही होंगे न्यूनाधिक नहीं, इसी प्रकार तीर्थंकरके जन्मकालके साथ ऐसा ही निमित्त-
नैमित्तिक सम्बन्ध है कि इस समय अमुक स्थानके अमुक प्रकारके बाजे बजेंगे, इसलिए इसे कर्म
विशेषका कार्य मानना उचित नहीं। कर्मकी अपनी मर्यादाएँ हैं। उन तक ही वह सीमित है।
फिर भी मूलमें जिस स्थितिके रहते हुए ये कार्य होते हैं उस स्थितिको ध्यानमें रखकर उपचारसे
उस स्थितिको इनका कारण कहा है। और हमने कार्यकारणभावका सीधा विचार करके यह
लिखा है। शेष कथन सुगम है।
§ २६२. जो अठारह प्रकारका क्षायोपशमिक भाव कहा है उसके भेदोंका कथन करनेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
क्षायोपशमिक भावके अठारह भेद हैं—चार ज्ञान, तीन अज्ञान, तीन दर्शन, पांच दानादि
लब्धियाँ, सम्यक्त्व, चारित्र और संयमासंयम ॥५॥
§ २६३. जिनके चार, तीन, तीन और पांच भेद हैं वे चार, तीन, तीन और पांच भेदवाले
कहलाते हैं। इस सूत्रमें 'यथाक्रमम्' पदकी अनुवृत्ति होती है, जिससे चार आदि पदोंके साथ ज्ञान
आदि पदोंका क्रमसे सम्बन्ध होता है। यथा—चार ज्ञान, तीन अज्ञान, तीन दर्शन और पाँच
लब्धियाँ। वर्तमान कालमें सर्वघाती स्पर्द्धकोंका उदयाभावी क्षय होनेसे और आगामी कालकी
१. पञ्च भेदा यासां मु० ।
- २१५ § २६३ ] द्वितीयोऽध्यायः १११
क्षयात्तेषामेव सदुपशमाद्देशघातिस्पर्द्धकानामुदये क्षायोपशमिको भावो भवति । तत्र ज्ञानादीनां
वृत्तिः स्वावरणान्तरायक्षयोपशमाद् व्याख्यातव्या । 'सम्यक्त्व'ग्रहणेन वेदकसम्यक्त्वं गृह्यते ।
अनन्तानुबन्धिकषायचतुष्टयस्य मिथ्यात्वसम्यङ्मिथ्यात्वयोश्चोदयक्षयात्सदुपशमाच्च सम्यक्त्वस्य
देशघातिस्पर्द्धकस्योदये तत्त्वार्थश्रद्धानं क्षायोपशमिकं सम्यक्त्वम् । अनन्तानुबन्धप्रत्याख्यानप्रत्या-
ख्यानद्वादशकषायोदयक्षयात्सदुपशमाच्च संज्वलनकषायचतुष्टयान्यतमदेशघातिस्पर्द्धकोदये नोकषाय- ५
नवकस्य यथासंभवोदये च निवृत्तिपरिणाम आत्मनः क्षायोपशमिकं चारित्रम् । अनन्तानुबन्धप्रत्या-
ख्यानकषायाष्टकोदयक्षयात्सदुपशमाच्च प्रत्याख्यानकषायोदये संज्वलनकषायस्य देशघातिस्पर्द्धकोदये
नोकषायनवकस्य यथासंभवोदये च विरताविरतपरिणामः क्षायोपशमिकः संयमासंयम इत्याख्यायते ।
अपेक्षा उन्हींका सदवस्था रूप उपशम होनेसे देशघाती स्पर्द्धकोंका उदय रहते हुए क्षायोपशमिक
भाव होता है । इन उपर्युक्त भावोंमें-से ज्ञान आदि भाव अपने-अपने आवरण और अन्तराय कर्मके १०
क्षयोपशमसे होते हैं ऐसा व्याख्यान यहां कर लेना चाहिए । सूत्रमें आये हुए सम्यक्त्वपदसे वेदक
सम्यक्त्व लेना चाहिए । तात्पर्य यह है कि चार अनन्तानुबन्धी कषाय, मिथ्यात्व और सम्यग्मि-
थ्यात्व इन छह प्रकृतियोंके उदयाभावी क्षय और सदवस्थारूप उपशमसे देशघाती स्पर्धकवाली
सम्यक्त्व प्रकृतिके उदयमें जो तत्त्वार्थश्रद्धान होता है वह क्षायोपशमिक सम्यक्त्व है । अनन्ता-
नुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण इन बारह कषायोंके उदयाभावी क्षय होनेसे १५
और इन्हींके सदवस्थारूप उपशम होनेसे तथा चार संज्वलनोंमें-से किसी एक देशघाती प्रकृतिके
उदय होनेपर और नौ नोकषायोंका यथासम्भव उदय होनेपर जो त्यागरूप परिणाम होता है वह
क्षायोपशमिक चारित्र है । अनन्तानुबन्धी और अप्रत्याख्यानावरण इन आठ कषायोंके उदयाभावी
क्षय होनेसे और सदवस्थारूप उपशम होनेसे तथा प्रत्याख्यानावरण कषायके और संज्वलन
कषायके देशघाती स्पर्द्धकोंके उदय होनेपर तथा नौ नोकषायोंका यथासम्भव उदय होनेपर जो २०
विरताविरतरूप परिणाम होता है वह संयमासंयम कहलाता है ।
**विशेषार्थ—**वर्तमान समयमें सर्वघाति स्पर्धकोंका उदयाभावी क्षय, आगामी कालकी अपेक्षा
उन्हींका सदवस्था रूप उपशम और देशघाति स्पर्धकोंका उदय यह क्षयोपशमका लक्षण है । यह
तो सुनिश्चित है कि अधिकतर देशघाति कर्म ऐसे होते हैं जिनमें देशघाति और सर्वघाति दोनों
प्रकारके स्पर्धक पाये जाते हैं । केवल नौ नोकषाय और सम्यक् प्रकृति ये दस प्रकृतियां इसके २५
अपवाद हैं । इनमें मात्र देशघाति स्पर्धक पाये जाते हैं, अतः नौ नोकषायोंके सिवा शेष सब
देशघाति कर्मोंका क्षयोपशम सम्भव है, क्योंकि पूर्वोक्त लक्षणके अनुसार क्षयोपशममें दोनों प्रकारके
कर्म लगते हैं । उसमें भी संयमासंयम भावकी प्राप्तिमें प्रत्याख्यानावरण कर्म अपेक्षा भेदसे देशघाति
मान लिया जाता है और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व व सम्यग्मिथ्यात्वसे मिलकर क्षायोपशमिक
भावको जन्म देती है, इसलिए क्षायोपशमिक भावके कुल अठारह भेद ही घटित होते हैं । ३०
उदाहरणार्थ-ज्ञानावरणकी देशघाति प्रकृतियाँ चार हैं, अतः इनके क्षंयोपशमसे चार ज्ञान प्रकट
होते हैं, पर मिथ्यादृष्टिके तीन अज्ञान और सम्यग्दृष्टिके चार ज्ञान इस प्रकार क्षायोपशमिक ज्ञानके
कुल भेद सात होते हैं । इसीसे अठारह क्षायोपशमिक भावोंमें इन सात ज्ञानोंकी परिगणना की
जाती है । प्रकृतमें दर्शन तीन और लब्धि पाँच क्षायोपशमिक भाव हैं यह स्पष्ट ही है । शेष रहे
तीन भाव सो ये वेदक सम्यक्त्व, संयमासंयम और संयम लिये गये हैं । इन सब भावोंमें देशघाति ३५
स्पर्धकोंका उदय होता है इसलिए इन्हें वेदक भाव भी कहते हैं । जितने भी क्षायोपशमिक भाव
होते हैं वे देशघाति स्पर्धकोंके उदयसे वेदक भी होते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इसमें सर्व-
घाति स्पर्धकों या सर्वघाति प्रकृतियोंका वर्तमान समयमें अनुदय रहता है, इसलिए इनका उदय
कालके एक समय पहले उदयरूप स्पर्धकों या प्रकृतिमं स्तिवुक संक्रमण हो जाता है । प्रकृतमें इसे
११२ सर्वार्थसिद्धौ [ २।६ § २६४ -
§ २६४. य एकविंशतिविकल्प औदयिको भाव उद्दिष्टस्तस्य १भेदसंज्ञासंकीर्तनार्थमिद-
मुच्यते—
गतिकषायलिङ्गमिथ्यादर्शनाज्ञानासंयतासिद्धलेश्याश्चतुश्चतुस्त्र्येकैकैकषड्भेदाः ॥६॥
§ २६५. यथाक्रममित्यनुवर्तते, तेनाभिसंबन्धाद् गतिश्चतुर्भेदा, नरकगतिस्तिर्यग्गतिर्मनुष्य-
गतिर्देवगतिरिति । तत्र नरकगतिनामकर्मोदयान्नारको भावो भवतीति नरकगतिरौदयिकी ।
एवमितरत्रापि । कषायश्चतुर्भेदः, क्रोधो मानो माया लोभ इति । तत्र क्रोधनिर्वर्तनस्य कर्मण
उदयात्क्रोधः औदयिकः । एवमितरत्रापि । लिङ्गं त्रिवेदं, स्त्रीवेदः पुंवेदो नपुंसकवेद इति । स्त्री-
वेदकर्मण उदयात्स्त्रीवेद औदयिकः । एवमितरत्रापि । मिथ्यादर्शनमेकभेदम् । मिथ्यादर्शनकर्मण
उदयात्तत्त्वार्थाश्रद्धानपरिणामो मिथ्यादर्शनमौदयिकम् । ज्ञानावरणकर्मण उदयात्पदार्थानवबोधो
भवति तदज्ञानमौदयिकम् । चारित्रमोहस्य सर्वघातिस्पर्द्धकस्योदयादसंयतं औदयिकः । कर्मोदय-
सामान्यापेक्षोऽसिद्ध औदयिकः । लेश्या द्विविधा, द्रव्यलेश्या भावलेश्या चेति । जीवभावाधिकाराद्
द्रव्यलेश्या नाधिकृता । भावलेश्या कषायोदयरञ्जिता योगप्रवृत्तिरिति कृत्वा औदयिकोत्युच्यते । सा
षड्विधा-कृष्णलेश्या नीललेश्या कापोतलेश्या तेजोलेश्या पद्मलेश्या शुक्ललेश्या चेति ।
हो उदयाभावी क्षय कहते हैं। यहां उदयका अभाव ही क्षय रूपसे विवक्षित है। और आगामी कालमें
उदयमें आने योग्य इन्हीं सर्वघाति स्पर्धकों व प्रकृतियोंका सदवस्था रूप उपशम रहता है। इसका
आशय यह है कि वे सत्तामें रहते हैं। उनकी उदीरणा नहीं होती। मात्र स्तिवुक संक्रमणके द्वारा
इनका उदय कालसे एक समय पहले सजातीय देशघाति प्रकृति या स्पर्धकरूपसे संक्रमण होता
रहता है। सर्वघाति अंशका उदय और उदीरणा न होनेसे जीवका निजभाव प्रकाशमें आता है
और देशघाति अंशका उदय रहनेसे उसमें सदोषता आती है यह इस भावका तात्पर्य है।
§ २६४. अब जो इक्कीस प्रकारका औदयिक भाव कहा है उसके भेदोंका कथन करनेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
- औदयिक भावके इक्कीस भेद हैं-चार गति, चार कषाय, तीन लिंग, एक मिथ्यादर्शन,
एक अज्ञान, एक असंयम, एक असिद्ध भाव और छह लेश्याएँ ॥६॥
§ २६५. इस सूत्रमें 'यथाक्रमम्' पदकी अनुवृत्ति होती है, क्योंकि यहां उसका सम्बन्ध
है। गति चार प्रकारकी है—नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति । इनमें-से नरकगति
नामकर्मके उदयसे नारकभाव होता है इसलिए नरकगति औदयिक है। इसी प्रकार शेष तीन
गतियोंका भी अर्थ करना चाहिए। कषाय चार प्रकारका है-क्रोध, मान, माया और लोभ ।
इनमें-से क्रोधको पैदा करनेवाले कर्मके उदयसे क्रोध औदयिक होता है। इसी प्रकार शेष तीन
कषायोंको औदयिक जानना चाहिए। लिंग तीन प्रकारका है स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद ।
स्त्रीवेद कर्मके उदयसे स्त्रीवेद औदयिक होता है। इसो प्रकार शेष दो वेद औदयिक हैं। मिथ्या-
दर्शन एक प्रकारका है। मिथ्यादर्शन कर्मके उदयसे जो तत्त्वोंका अश्रद्धानरूप परिणाम होता है वह
मिथ्यादर्शन है इसलिए वह औदयिक है। पदार्थोंके नहीं जाननेको अज्ञान कहते हैं। चूंकि वह
ज्ञानावरण कर्मके उदयसे होता है इसलिए औदयिक है। असंयतभाव चारित्रमोहनीय कर्मके सर्व-
घातीस्पर्द्धकोंके उदयसे होता है इसलिए औदयिक है। असिद्धभाव कर्मोदय सामान्यकी अपेक्षा
होता है इसलिए औदयिक है। लेश्या दो प्रकारकी है-द्रव्यलेश्या और भावलेश्या । यहाँ जीवके
भावोंका अधिकार होनेसे द्रव्यलेश्या नहीं ली गयी है। चूंकि भावलेश्या कषायके उदयसे अनुरंजित
योगकी प्रवृत्तिरूप है इसलिए वह औदयिक कही जाती है। वह छह प्रकारकी है-कृष्णलेश्या,
नीललेश्या, कापोतलेश्या, पीतलेश्या, पद्मलेश्या और शुक्ललेश्या ।
१. संज्ञाकीर्त-आ०, दि० १, दि० २।
- २।७ § २६८ ] द्वितीयोऽध्यायः ११३
§ २६६. ननु च उपशान्तकषाये क्षीणकषाये सयोगकेवलिनि च शुक्ललेश्याऽस्तीत्यागमः ।
तत्र कषायानुरञ्जनाभावादौदयिकत्वं नोपपद्यते । नैष दोषः; पूर्वभावप्रज्ञापननयोपेक्षया यासौ
योगप्रवृत्तिः कषायानुरञ्जिता सैवेत्युपचारादौदयिकीत्युच्यते । तदभावादयोगकेवल्यलेश्य इति
निश्चीयते ।
§ २६७. यः पारिणामिको भावस्त्रिभेद उक्तस्तद्भेदस्वरूपप्रतिपादनार्थमाह—
जीवभव्याभव्यत्वानि च ॥७॥
· § २६८. जीवत्वं भव्यत्वमभव्यत्वमिति त्रयो भावाः पारिणामिका अन्यद्रव्यासधारणा
आत्मनो वेदितव्याः । कुतः पुनरेषां पारिणामिकत्वम् । कर्मोदयोपशमक्षयक्षयोपशमानपेक्षित्वान् ।
जीवत्वं चैतन्यमिहार्थः । सम्यग्दर्शनादिभावेन भविष्यतीति भव्यः । तद्विपरीतोऽभव्यः । त एते
त्रयो भावा जीवस्य पारिणामिकाः ।
§ २६६. शंका—उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगकेवली गुणस्थानमें शुक्ललेश्या
है ऐसा आगम है परन्तु वहाँपर कषायका उदय नहीं है इसलिए औदयिकपना नहीं बन सकता ?
समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जो योगप्रवृत्तिके उदयसे अनुरंजित है वही यह है इस
प्रकार पूर्वभावप्रज्ञापन नयकी अपेक्षा उपशान्तकषाय आदि गुणस्थानोंमें भी लेश्याको औदयिक कहा
गया है। किन्तु अयोगकेवलीके योगप्रवृत्ति नहीं होतो इसलिए वे लेश्यारहित हैं ऐसा निश्चय
होता है।
विशेषार्थ—कर्मोंकी जातियां और उनके अवान्तर भेद अनेक हैं, इसलिए उनके उदयसे
होनेवाले भाव भी अनेक हैं, पर यहाँ मुख्य-मुख्य औदयिक भाव ही गिनाये गये हैं। ऐसे भाव
इक्कीस होते हैं। प्रथम चार भेद चार गति हैं। ये गंति-नामकर्मके उदयसे होते हैं। नामकर्म
अघातिकर्म है। गति-नामकर्म उसीका एक भेद है। जो प्रकृतमें अन्य जीवविपाकी अघाति कर्मोंका
उपलक्षण है। पुद्गलविपाकी कर्मोंके जीवभाव नहीं होते, इसलिए उनको यहाँ परिगणना नहीं
की गयी है। घाति कर्मोंमें क्रोधादि चारों कषायोंके उदयसे क्रोधादि चार भाव होते हैं। तीन
वेदोंके उदयसे तीन लिंग होते हैं। तीन वेद उपलक्षण हैं। इनसे हास्य आदि छह भावोंका भी
ग्रहण होता है। दर्शनमोहनीयके उदयसे मिथ्यादर्शन होता है। दर्शनावरणके उदयसे होनेवाले
अदर्शनभावोंका इसीमें ग्रहण होता है। ज्ञानावरणके उदयसे अज्ञानभाव होता है, असंयत भाव
चारित्रमोहनीयके उदयका कार्य है और असिद्ध भाव सब कर्मोंके उदयका कार्य है। रहीं लेश्याएँ
सो ये कषाय और योग इनके मिलनेसे उत्पन्न हुई परिणति विशेष हैं। फिर भी इनमें कर्मोदयकी
मुख्यता होनेसे इनकी औदयिक भावोंमें परिगणना की गयी है। इन भावोंमें कर्मोंका उदय निमित्त
है, इसलिए इन्हें औदयिक कहते हैं ।
§ २६७. अब जो तीन प्रकारका पारिणामिक भाव कहा है उसके भेदोंके स्वरूपका कथन
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पारिणामिक भावके तीन भेद हैं—जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व ॥७॥
§ २६८. जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व ये तीन पारिणामिक भाव अन्य द्रव्योंमें नहीं होते
इसलिए ये आत्माके जानने चाहिए। शंका—ये पारिणामिक क्यों हैं ? समाधान—ये तीनों भाव
कर्मके उदय, उपशम, क्षय और क्षयोपशमके बिना होते हैं, इसलिए पारिणामिक हैं। जीवत्वका
अर्थ चैतन्य है। जिसके सम्यग्दर्शन आदि भाव प्रकट होनेकी योग्यता है वह भव्य कहलाता है।
अभव्य इसका उलटा है। ये तीनों जीवके पारिणामिक भाव हैं।
१. -पनापेक्ष-आ०, दि० १, दि० २ ।
१५
§ २६९. ननु चास्तित्वनित्यत्वप्रदेशवत्त्वादयोऽपि भावाः पारिणामिकाः सन्ति, तेषामिह
ग्रहणं कर्तव्यम् । न कर्तव्यम्; कृतमेव । कथम् । 'च'२शब्देन समुच्चितत्वात् । यद्येवं त्रय इति
संख्या विरुध्यते । न विरुध्यते, असाधारणा जीवस्य भावाः पारिणामिकास्त्रय एव । अस्तित्वादयः
पुनर्जीवाजीवविषयत्वात्साधारणा इति 'च'शब्देन पृथग्गृह्यन्ते । आह, औपशमिकादिभावानुप-
पत्तिरमूर्तत्वादात्मनः । कर्मबन्धापेक्षा हि ३ते भावाः । न चामूर्तेः कर्मणां बन्धो युज्यत इति । तन्न;
अनेकान्तात् । नायमेकान्तः अमूर्तिरेवात्मेति । कर्मबन्धपर्यायापेक्षया तदावेशात्स्यान्मूर्तः । शुद्ध-
स्वरूपापेक्षया स्यादमूर्तः । यद्येवं कर्मबन्धावेशादस्यैकत्वे सत्यविवेकः प्राप्नोति । नैष दोषः; बन्धं
४प्रत्येकत्वे सत्यपि लक्षणभेदादस्य नानात्वमवसीयते । उक्तं च—
§ २६९. शंका—अस्तित्व, नित्यत्व और प्रदेशवत्त्व आदिक भी पारिणामिक भाव हैं उनका
इस सूत्रमें ग्रहण करना चाहिए ? समाधान—अलगसे उनके ग्रहण करनेका कोई काम नहीं; क्योंकि
उनका ग्रहण किया ही है । शंका—कैसे ? समाधान—क्योंकि सूत्रमें आये हुए 'च'शब्दसे इनका
समुच्चय हो जाता है । शंका—यदि ऐसा है तो 'तीन' संख्या विरोधको प्राप्त होती है, क्योंकि इस
प्रकार तीनसे अधिक पारिणामिक भाव हो जाते हैं ? समाधान—तब भी 'तीन' यह संख्या विरोध-
को नहीं प्राप्त होती, क्योंकि जीवके असाधारण पारिणामिक भाव तीन ही हैं । अस्तित्वादिक तो
जीव और अजीव दोनोंके साधारण हैं इसलिए उनका 'च'शब्दके द्वारा अलगसे ग्रहण किया है ।
शंका—औपशामिक आदि भाव नहीं बन सकते; क्योंकि आत्मा अमूर्त है। ये औपशमिक आदि भाव
कर्मबन्धको अपेक्षा होते हैं परन्तु अमूर्त आत्माके कर्मोंका बन्ध नहीं बनता है ? समाधान—आत्माके
अमूर्तत्वके विषयमें अनेकान्त है । यह कोई एकान्त नहीं कि आत्मा अमूर्ति ही है । कर्मबन्धरूप
पर्यायकी अपेक्षा उससे युक्त होनेके कारण कथंचित् मूर्त है और शुद्ध स्वरूपकी अपेक्षा कथंचित्
अमूर्त है। शंका—यदि ऐसा है तो कर्मबन्धके आवेशसे आत्माका ऐक्य हो जानेपर आत्माका
उससे भेद नहीं रहता ? अमूर्ति । समाधान—यह कोई दोष नहीं, क्योंकि यद्यपि बन्धकी अपेक्षा
अभेद है तो भी लक्षणके भेदसे कर्मसे आत्माका भेद जाना जाता है। कहा भी है—
'आत्मा बन्धको अपेक्षा एक है तो भी लक्षणकी अपेक्षा वह भिन्न है। इसलिए जीवका
अमूर्तीकभाव अनेकान्तरूप है। वह एक अपेक्षासे है और एक अपेक्षासे नहीं है।
विशेषार्थ—पारिणामिक भाव तीन हैं—जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व । जीवत्वके दो
भेद हैं—एक जीवन-क्रियासापेक्ष और दूसरा चैतन्यगुणमापेक्ष । जीवनक्रिया प्राणसापेक्ष होती है,
इसलिए ऐसे जीवत्वकी मुख्यता नहीं है, यहाँ तो चैतन्यगुणसापेक्ष जीवत्वकी ही मुख्यता है। यह
सब जीवोंमें साधारणरूपसे पाया जाता है और कारणनिरपेक्ष होता है इसलिए इसे पारिणामिक
कहा है। यही बात भव्यत्व और अभव्यत्वके सम्बन्धमें भी जाननी चाहिए, क्योंकि ये दोनों भाव
भी कारणनिरपेक्ष होते हैं । साधारणतः जिनमें रत्नत्रय गुण प्रकट होनेकी योग्यता होती है वे भव्य
कहलाते हैं और जिनमें ऐसी योग्यता नहीं होती उन्हें अभव्य कहते हैं । जीवोंमें ये दोनों प्रकारकी
योग्यताएँ स्वभावसे होती हैं। इसीसे भव्यत्व और अभव्यत्व ये दोनों भाव भी पारिणामिक माने
गये हैं। अभिप्राय यह है कि किन्हीं जीवोंका स्वभावसे अनादि-अनन्त बन्ध होता है और किन्हींका
अनादिसान्त । जीवोंका इस तरहका बन्ध कारणनिरपेक्ष होता है । यह किसी कर्मविशेषका कार्य
नहीं है, किन्तु ऐसी योग्यता पारिणामिक मानी गयी है । इसीसे जीवत्वके साथ भव्यत्व और
अभव्यत्व ये दोनों भाव भी पारिणामिक कहे गये हैं। यद्यपि जीवमें अस्तित्व आदि और बहुत-से
१. प्रदेशात्वा-आ०, दि० १, दि० २, मु० । २. कथं चेच्चशब्देन मु० । कथं चेतनशब्देन आ०, । ३. ते ।
न चामूर्तः कर्मणा आ० दि० १, दि० २; ता०, ना० । ४. प्रत्येकत्वे ( ऽविवेके ) सत्य-मु० ।
- २।९ ६ २७३ ] द्वितीयोऽध्यायः १९५
"बंधं पडि एयत्तं लक्खणदो हवइ तस्स णाणत्तं ।
तम्हा अमुत्तिभावो णेयंतो होइ जीवस्स ॥" इति ।
§ २७०. यद्येवं तदेव लक्षणमुच्यतां येन नानात्वमवसीयते इत्यत आह—
उपयोगो लक्षणम् ॥ ८ ॥
§ २७१. उभयनिमित्तवशादुत्पद्यमानश्चैतन्यानुविधायी परिणाम उपयोगः । तेन बन्धं ५
प्रत्येकत्वे सत्यप्यात्मा लक्ष्यते सुवर्णरजतयोर्बन्धं प्रत्येकत्वे सत्यपि वर्णादिभेदवत् ।
§ २७२. तद्भेदप्रदर्शनार्थमाह—
स द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥ ६ ॥
§ २७३. स उपयोगो द्विविधः — ज्ञानोपयोगो दर्शनोपयोगश्चेति । ज्ञानोपयोगोऽष्टभेदः-
मतिज्ञानं श्रुतज्ञानमवधिज्ञानं मनःपर्ययज्ञानं केवलज्ञानं मत्यज्ञानं श्रुताज्ञानं विभङ्गज्ञानं चेति । १०
दर्शनोपयोगश्चतुर्विधः - चक्षुर्दर्शनमचक्षुर्दर्शनमवधिदर्शनं केवलदर्शनं चेति । तयोः कथं भेदः ।
साकारानाकारभेदात् । साकारं ज्ञानमनाकारं दर्शनमिति । तच्छद्मस्थेषु क्रमेण वर्तते । निरा-
पारिणामिक भाव पाये जाते हैं पर वे जीवके असाधारण धर्म न होनेसे उनकी यहाँ परिगणना
नहीं की गयी है।
इन भावोंके सम्बन्धमें मुख्य प्रश्न यह है कि जब कि जीव अमूर्त है ऐसी दशामें उसका १५
कर्मके साथ बन्ध नहीं हो सकता और कर्मबन्धके अभावमें औपशमिक आदि भावोंकी उत्पत्ति नहीं
बन सकती, क्योंकि पारिणामिक भावोंके सिवा शेष सब भाव कर्मनिमित्तक माने गये हैं ? उत्तर यह
कि कर्मका आत्मासे अनादि सम्बन्ध है, इसलिए कोई दोष नहीं आता । आशय यह है कि संसार
अवस्थामें जीवका कर्मके साथ अनादिकालीन बन्ध होनेके कारण वह व्यवहारसे मूर्त हो रहा
है । और यह बात असिद्ध भी नहीं है, क्योंकि मदिरा आदिका सेवन करनेपर ज्ञानमें मूर्च्छा २०
देखी जाती है । पर इतने मात्रसे आत्माको मूर्तस्वभाव नहीं माना जा सकता, क्योंकि रूप, रस,
गन्ध और स्पर्श ये पुद्गलके धर्म हैं । आत्मा मूर्तरूप इन धर्मोंसे भिन्न स्वभाववाला है ।
§ २७०. यदि ऐसा है तो वही लक्षण कहिए जिससे कर्मसे आत्माका भेद जाना जाता है,
इसी बातको ध्यानमें रखकर आगेका सूत्र कहते हैं—
उपयोग जीवका लक्षण है ॥ ८ ॥ २५
§ २७१. जो अन्तरंग और बहिरंग दोनों प्रकारके निमित्तोंसे होता है और चैतन्यका
अन्वयी है अर्थात् चैतन्यको छोड़कर अन्यत्र नहीं रहता वह परिणाम उपयोग कहलाता है। यद्यपि
आत्मा बन्धकी अपेक्षा एक है तो भी इससे वह स्वतन्त्र जाना जाता है । जिस प्रकार स्वर्ण और
चांदी बन्धकी अपेक्षा एक हैं तो भी वर्णादिके भेदसे उनमें पार्थक्य रहता है उसी प्रकार प्रकृतमें
समझना चाहिए । ३०
§ २७२. अब उपयोगके भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वह उपयोग दो प्रकारका है- ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग । ज्ञानोपयोग आठ प्रकारका
है और दर्शनोपयोग चार प्रकारका है ॥ ९ ॥
§ २७३. वह उपयोग दो प्रकारका है, ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग । ज्ञानोपयोग आठ
प्रकारका है— मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान, केवलज्ञान, मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान, और ३५
विभंगज्ञान । दर्शनोपयोग चार प्रकारका है— चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन ।
शंका—इन दोनों उपयोगोंमें किस कारणसे भेद है ? समाधान—साकार और अनाकारके
भेदसे इन दोनों उपयोगोंमें भेद है । साकार ज्ञानोपयोग है और अनाकार दर्शनोपयोग । ये दोनों.
११६ सर्वार्थसिद्धौ [ २।१०.§ २७४ -
वरणेषु युगपत् । पूर्वकालभाविनोऽपि दर्शनाज्ज्ञानस्य प्रागुपन्यासः; अभ्यर्हितत्वात् । सम्यग्ज्ञान-
प्रकरणात्पूर्वं पञ्चविधो ज्ञानोपयोगो व्याख्यातः । इह पुनरुपयोगग्रहणाद्विपर्ययोऽपि गृह्यते इत्यष्ट-
विध¹ इति उच्यते ।
§ २७४. यथोक्तेनानेनाभिहितपरिणामेन सर्वात्मसाधारणेनोपयोगेन ये उपलक्षिता उप-
योगिनस्ते द्विविधाः—
संसारिणो मुक्ताश्च ॥ १० ॥
§ २७५. संसरणं संसारः परिवर्तनमित्यर्थः । स एषामस्ति ते संसारिणः । तत्परिवर्तनं
पञ्चविधं द्रव्यपरिवर्तनं क्षेत्रपरिवर्तनं कालपरिवर्तनं भवपरिवर्तनं भावपरिवर्तनं चेति । तत्र
छद्मस्थोंके क्रमसे होते हैं और आवरणरहित जीवोंके युगपत् होते हैं । यद्यपि दर्शन पहले होता है
तो भी श्रेष्ठ होनेके कारण सूत्रमें ज्ञानको दर्शनसे पहले रखा है । सम्यग्ज्ञानका प्रकरण होनेके
कारण पहले पांच प्रकारके ज्ञानोपयोगका व्याख्यान कर आये हैं । परन्तु यहाँ उपयोगका ग्रहण
करनेसे विपर्ययका भी ग्रहण होता है इसलिए वह आठ प्रकारका कहा है ।
विशेषार्थ—यहाँ जीवका लक्षण उपयोग बतलाकर उसके भेदोंकी परिगणना की गयी है ।
उपयोगके मुख्य भेद दो हैं—ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग । ये दोनों प्रकारके उपयोग सब जीवोंके
पाये जाते हैं । इनके अवान्तर भेद कई हैं जो निमित्तविशेषसे होते हैं । ज्ञानावरण और दर्शनावरणके
अवान्तर भेदोंका यथायोग्य क्षयोपशम और क्षय तथा दर्शनमोहनीयका उदय ये प्रधान निमित्त हैं ।
इनके कारण दोनों प्रकारके उपयोग बारह भेदोंमें विभक्त हो जाते हैं । इस प्रकार ज्ञानोपयोगके
आठ और दर्शनोपयोगके चार भेद प्राप्त होते हैं । मुख्यतया संसारी जीवके एक कालमें एक
उपयोग और केवलीके दो उपयोग होते हैं । पर नाना जीवोंकी अपेक्षा परिगणना करनेपर वे
बारह होते हैं । यद्यपि प्रथम अध्यायमें एक जीवके एक साथ चार ज्ञान बतला आये हैं और जिसके
एक साथ चार ज्ञान होंगे उसके उसी समय तीन दर्शन भी पाये जायेंगे, पर यह कथन क्षयोपशमकी
प्रधानतासे किया गया जानना चाहिए । एक जीवके एक कालमें मतिज्ञानावरण आदि चार ज्ञाना-
वरण और चक्षुदर्शनावरण आदि तीन दर्शनावरण इन सात कर्मोंका क्षयोपशम हो सकता है पर
तत्त्वतः उनके उस समय उपयोग एक ही होगा । क्षयोपशम ज्ञानोत्पत्ति और दर्शनोत्पत्तिमें
निमित्त है और उपयोग ज्ञान दर्शनकी प्रवृत्ति है । जीवमें ज्ञान और दर्शन गुणकी धारा निरन्तर
प्रवर्तित होती रहती है । वह जिस समय बाह्य और अन्तरंग जैसा निमित्त मिलता है उसके अनु-
सार काम करने लगती है । इतना अवश्य है कि संसार अवस्थामें वह मलिन, मलिनतर और
मलिनतम रहती है और कैवल्य लाभ होनेपर वह विशुद्ध हो जाती है फिर उसकी प्रवृत्तिके लिए
अन्तरंग व बाह्य कारण अपेक्षित नहीं रहते । यही कारण है कि यहाँ जीवका लक्षण उपयोग
कहा है ।
§ २७४. सब आत्माओंमें साधारण उपयोगरूप जिस आत्मपरिणामका पहले व्याख्यान
किया है उससे उपलक्षित सब उपयोगवाले जीव दो प्रकारके हैं, इस बातका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
जीव दो प्रकारके हैं—संसारी और मुक्त ॥ १० ॥
§ २७५. संसरण करनेको संसार कहते हैं जिसका अर्थ परिवर्तन है । यह जिन जीवोंके
पाया जाता है वे संसारी हैं । परिवर्तनके पाँच भेद हैं—द्रव्यपरिवर्तन, क्षेत्रपरिवर्तन, कालपरि-
१. -विध उच्यते दि० २, मु० ।
- २।१० § २७६ ] द्वितीयोऽध्यायः १९७
द्रव्यपरिवर्तनं द्विविधम्—नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनं कर्मद्रव्यपरिवर्तनं चेति । तत्र नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनं
नाम त्रयाणां शरीराणां षण्णां पर्याप्तीनां च योग्या ये पुद्गला एकेन जीवेन एकस्मिन्समये गृहीताः
स्निग्धरूक्षवर्णगन्धादिभिस्तीव्रमन्दमध्यमभावेन च यथावस्थिता द्वितीयादिषु समयेषु निर्जीर्णा
अगृहीतानन्तवारानतीत्य मिश्रकांश्चानन्तवारानतीत्य मध्ये गृहीतांश्चानन्तवारानतीत्य त एव
तेनैव प्रकारेण तस्यैव जीवस्य नोकर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्समुदितं नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनम् । ५
कर्मद्रव्यपरिवर्तनमुच्यते—एकस्मिन्समये एकेन जीवेनाष्टविधकर्मभावेन ये गृहीताः पुद्गलाः
समयाधिकामावलिकामतीत्य द्वितीयादिषु समयेषु निर्जीर्णाः, पूर्वोक्तेनैव क्रमेण त एव तेनैव
प्रकारेण तस्य जीवस्य कर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्कर्मद्रव्यपरिवर्तनम् । उक्तं च—
"सव्वे वि पुग्गला खलु कमसो भुत्तुज्झिया य जीवेणं ।
१असइं अणंतखुत्तो पुग्गलपरियट्टसंसारे२ ॥" १०
§ २७६. क्षेत्रपरिवर्तनमुच्यते—सूक्ष्मनिगोदजीवोऽपर्याप्तकः सर्वजघन्यप्रदेशशरीरो लोकस्या-
ष्टमध्यप्रदेशान्स्वशरीरमध्ये३ कृत्वोत्पन्नः क्षुद्रभवग्रहणं जीवित्व़ा मृतः । स एव पुनस्तेनैवावगाहेन
द्विरुत्पन्नस्तथा त्रिस्तथा चतुरित्येवं यावद् ४घनाङ्गुलस्यासंख्येयभागप्रमिताकाशप्रदेशास्तावत्कृत्व-
स्तत्रैव जनित्वा पुनरेकैकप्रदेशाधिकभावेन सर्वो लोक आत्मनो जन्मक्षेत्रभावमुपनीतो भवति याव-
त्तावत्क्षेत्रपरिवर्तनम् । उक्तं च— १५
वर्तन, भवपरिवर्तन और भावपरिवर्तन । द्रव्यपरिवर्तनके दो भेद हैं—नोकर्म द्रव्यपरिवर्तन और
कर्म द्रव्यपरिवर्तन । अब नोकर्म द्रव्य परिवर्तनका स्वरूप कहते हैं—किसी एक जीवने तीन शरीर
और छह पर्याप्तियोंके योग्य पुद्गलोंको एक समयमें ग्रहण किया। अनन्तर वे पुद्गल स्निग्ध या
रूक्ष स्पर्श तथा वर्ण और गन्ध आदिके द्वारा जिस तीव्र, मन्द और मध्यम भावसे ग्रहण किये थे
उस रूपसे अवस्थित रहकर द्वितीयादि समयोंमें निर्जीर्ण हो गये। तत्पश्चात् अगृहीत परमाणुओंको २०
अनन्त बार ग्रहण करके छोड़ा, मिश्र परमाणुओंको अनन्त बार ग्रहण करके छोड़ा और बीचमें
गृहीत परमाणुओंको अनन्त बार ग्रहण करके छोड़ा। तत्पश्चात् जब उसी जीवके सर्व प्रथम ग्रहण
किये गये वे ही कर्म परमाणु उसी प्रकारसे नोकर्म भावको प्राप्त होते हैं तब यह सब मिलकर एक
नोकर्म द्रव्यपरिवर्तन होता है। अब कर्मद्रव्यपरिवर्तनका कथन करते हैं—एक जीवने आठ प्रकारके
कर्मरूपसे जिन पुद्गलोंको ग्रहण किया वे समयाधिक एक आवलिकालके बाद द्वितीयादिक समयोंमें २५
झर गये। पश्चात् जो क्रम नोकर्म द्रव्यपरिवर्तनमें बतलाया है उसी क्रमसे वे ही पुद्गल उसी
प्रकारसे उस जीवके जब कर्मभावको प्राप्त होते हैं तब यह सब एक कर्म द्रव्यपरिवर्तन कहलाता
है। कहा भी है—
'इस जीवने सभी पुद्गलोंको क्रमसे भोगकर छोड़ दिया। और इस प्रकार यह जीव
अनन्तबार पुद्गल परिवर्तनरूप संसारमें घूमता है।' ३०
§ २७६. अब क्षेत्रपरिवर्तनका कथन करते हैं—जिसका शरीर आकाशके सबसे कम प्रदेशों-
पर स्थित है ऐसा एक सूक्ष्म निगोद लब्ध्यपर्याप्तक जीव लोकके आठ मध्य प्रदेशोंको अपने शरीरके
मध्यमें करके उत्पन्न हुआ और क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीकर मर गया। पश्चात् वही जीव पुनः
उसी अवगाहनासे वहाँ दूसरी बार उत्पन्न हुआ, तीसरी बार उत्पन्न हुआ, चौथी बार उत्पन्न
हुआ। इस प्रकार अंगुलके असंख्यातवें भागमें आकाशके जितने प्रदेश प्राप्त हों उतनी बार वहीं ३५
उत्पन्न हुआ। पुनः उसने आकाशका एक-एक प्रदेश बढ़ाकर सब लोकको अपना जन्मक्षेत्र बनाया।
इस प्रकार यह सब मिलकर एक क्षेत्रपरिवर्तन होता है। कहा भी है—
१. अच्छइ अणं-दि० १, दि० २, आ०, मु० । २. बा० अणु०, गा० २५ । ३. शरीरमध्यप्रदेशान् कृत्वा
मु० । ४. यावदङ्गुलस्या-दि० १, दि० २, आ० ।
११८ सर्वार्थसिद्धौ [ २।१० § २७७ –
"सव्वम्हि लोयखेत्ते कमसो तं णत्थि जं ण उप्पण्णं ।
ओगाहणाए² बहुसो परिब्भमिदो खेत्तसंसारे ॥"
§ २७७. कालपरिवर्तनमुच्यते—उत्सर्पिण्याः प्रथमसमये जातः कश्चिज्जीवः स्वायुषः
परिसमाप्तौ मृतः । स एव ³पुनर्द्वितीयाया उत्सर्पिण्या द्वितीयसमये जातः स्वायुषः क्षयान्मृतः । स
एव पुनस्तृतीयाया उत्सर्पिण्यास्तृतीयसमये जातः । एवमनेन क्रमेणोत्सर्पिणी परिसमाप्ता । तथा-
वसर्पिणी च । एवं जन्मनैरन्तर्यमुक्तम् । ⁴मरणस्यापि नैरन्तर्यं तथैव ग्राह्यम् । एतावत्कालपरि-
वर्तनम् । उक्तं च—
"⁵उस्सप्पिणिअवसप्पिणिसमयावलियासु णिरवसेसासु ।
जादो मुदो य बहुसो भमणेण दु कालसंसारे ॥"
§ २७८. भवपरिवर्तनमुच्यते—नरकगतौ सर्वजघन्यमायुर्दशवर्षसहस्राणि । तेनायुषा तत्रो-
त्पन्नः पुनः परिभ्रम्य तेनैवायुषा जातः । एवं दशवर्षसहस्राणां यावन्तः समयास्तावत्कृत्वस्तत्रैव
जातो मृतः । पुनरेकैकसमयाधिकभावेन त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि परिसमापितानि । ततः प्रच्युत्य
तिर्यग्गतावन्तर्मुहूर्तायुः समुत्पन्नः । पूर्वोक्तेनैव क्रमेण त्रीणि पल्योपमानि तेन परिसमापितानि ।
एवं मनुष्यगतौ च⁶ । देवगतौ च नारकवत् । अयं तु विशेषः—एकत्रिंशत्सागरोपमाणि परिसमा-
पितानि यावत्तावद् भवपरिवर्तनम् । उक्तं च—
'सब लोक क्षेत्रमें ऐसा एक प्रदेश नहीं है जहाँ यह अवगाहनाके साथ क्रमसे नहीं उत्पन्न
हुआ । इस प्रकार इस जीवने क्षेत्र संसारमें अनेक बार परिभ्रमण किया ।'
§ २७७. अब कालपरिवर्तनका कथन करते हैं—कोई जीव उत्सर्पिणीके प्रथम समयमें
उत्पन्न हुआ और आयुके समाप्त हो जानेपर मर गया । पुनः वही जीव दूसरी उत्सर्पिणीके दूसरे
समयमें उत्पन्न हुआ और अपनी आयुके समाप्त होनेपर मर गया । पुनः वही जीव तीसरी
उत्सर्पिणीके तीसरे समयमें उत्पन्न हुआ । इस प्रकार इसने क्रमसे उत्सर्पिणी समाप्त की और इसी
प्रकार अवसर्पिणी भी । यह जन्मका नैरन्तर्य कहा । तथा इसी प्रकार मरण का भी नैरन्तर्य लेना
चाहिए । इस प्रकार यह सब मिलकर एक कालपरिवर्तन है । कहा भी है—
'कालसंसारमें परिभ्रमण करता हुआ यह जीव उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीके सब समयोंमें
अनेक बार जन्मा और मरा ।'
§ २७८. अब भवपरिवर्तनका कथन करते हैं—नरकगतिमें सबसे जघन्य आयु दस हजार
वर्षकी है । एक जीव उस आयुसे वहाँ उत्पन्न हुआ पुनः घूम-फिरकर उसी आयुसे वहीं उत्पन्न
हुआ । इस प्रकार दस हजार वर्षके जितने समय हैं उतनी बार वहीं उत्पन्न हुआ और मरा ।
पुनः आयुमें एक-एक समय बढ़ाकर नरककी तैंतीस सागर आयु समाप्त की । तदनन्तर नरकसे
निकलकर अन्तर्मुहूर्त आयुके साथ तिर्यंचगतिमें उत्पन्न हुआ । और पूर्वोक्त क्रमसे उससे तिर्यंच-
गतिकी तीन पल्य आयु समाप्त की । इसी प्रकार मनुष्यगतिमें अन्तर्मुहूर्तसे लेकर तीन पल्य आयु
समाप्त की । तथा देवगतिमें नरकगतिके समान आयु समाप्त की । किन्तु देवगतिमें इतनी विशे-
षता है कि यहाँ इकतीस सागर आयु समाप्त होने तक कथन करना चाहिए । इस प्रकार यह सब
मिलकर एक भवपरिवर्तन है । कहा भी है—
१. बा० अणु०, गा० २६ । २. -हणेण बहुसो मु०, ना० । ३. एव तृती-आ०, दि० १, दि० २ ।
४. मरणमपि तथैव ग्रा-ता० । मरणस्यापि तथैव ग्रा-ना० । ५. बा० अणु० गा० २७ । ६. च तिर्यञ्चवत् । देव-मु०, ता० ।
अध्याय ५-६: अजीव-तत्त्व (पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल) एवं आस्रव-निरूपण
- २।१० § २७९ ] द्वितीयोऽध्यायः ११९
“णिरयादिजहण्णादिसु जाव दु उबरिल्लया दु गेवज्जा ।
मिच्छत्तसंसिदेण दु बहुसो वि भवट्ठिदी भमिदा ॥”
§ २७९. भावपरिवर्तनमुच्यते—पञ्चेन्द्रियः संज्ञी पर्याप्तको मिथ्यादृष्टिः कश्चिज्जीवः स
सर्वजघन्यां स्वयोग्यां ज्ञानावरणप्रकृतेः स्थितिमन्तःकोटीकोटीसंज्ञिकामपद्यते । तस्य कषायाध्यव-
सायस्थानान्यसंख्येयलोकप्रमितानि षट्स्थानपतितानि तत्स्थितियोग्यानि भवन्ति । तत्र सर्वजघन्य-
कषायाध्यवसायस्थाननिमित्तान्यनु२भागाध्यवसायस्थानान्यसंख्येयलोकप्रमितानि भवन्ति । एवं सर्व-
जघन्यां स्थितिं सर्वजघन्यं च कषायाध्यवसायस्थानं सर्वजघन्यमेवानुभागबन्धस्थानमास्कन्दतस्त-
द्योग्यं सर्वजघन्यं योगस्थानं भवति । तेषामेव स्थितिकषायानुभागस्थानानां द्वितीयमसंख्येयभाग-
वृद्धियुक्तं योगस्थानं भवति । एवं च तृतीयादिषु४ चतुःस्थानपतितानि श्रेण्यसंख्येयभागप्रमितानि
योगस्थानानि भवन्ति । तथा तामेव स्थितिं तदेव कषायाध्यवसायस्थानं च प्रतिपद्यमानस्य द्वितीय-
मनुभवाध्यवसायस्थानं भवति । तस्य च योगस्थानानि पूर्ववद्वेदितव्यानि । एवं तृतीयादिष्वपि
अनुभवाध्यवसायस्थानेषु आ असंख्येयलोकपरिसमाप्तेः । एवं तामेव स्थितिमापद्यमानस्य द्वितीयं
कषायाध्यवसायस्थानं भवति । तस्याप्यनुभवाध्यवसायस्थानानि योगस्थानानि च पूर्ववद्वेदित-
·'इस जीवने मिथ्यात्वके संसर्गसे उपरिम ग्रैवेयक तक नरक आदि गतियोंकी जघन्य आदि
स्थितियोंमें उत्पन्न हो-होकर अनेक बार परिभ्रमण किया।'
§ २७९. अब भावपरिवर्तनका कथन करते हैं—पंचेन्द्रिय संज्ञी पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि कोई
एक जीव ज्ञानावरण प्रकृतिकी सबसे जघन्य अपने योग्य अन्तःकोड़ाकोड़ी प्रमाण स्थितिको प्राप्त
होता है। उसके उस स्थितिके योग्य षट्स्थानपतित असंख्यात लोकप्रमाण कषाय अध्यवसाय
स्थान होते हैं। और सबसे जघन्य इन कषाय अध्यवसाय स्थानोंके निमित्तसे असंख्यात लोक-
प्रमाण अनुभाग अध्यवसाय स्थान होते हैं। इस प्रकार सबसे जघन्य स्थिति, सबसे जघन्य कषाय
अध्यवसाय स्थान और सबसे जघन्य अनुभाग अध्यवसाय स्थानको धारण करनेवाले इस जीवके
तद्योग्य सबसे जघन्य योगस्थान होता है। तत्पश्चात् स्थिति, कषाय अध्यवसायस्थान और अनु-
भाग अध्यवसाय स्थान वही रहते हैं किन्तु योगस्थान दूसरा हो जाता है जो असंख्यात भागवृद्धि
संयुक्त होता है। इसी प्रकार तीसरे, चौथे आदि योगस्थानोंमें समझना चाहिए। ये सब योगस्थान
चार स्थान पतित होते हैं और इनका प्रमाण श्रेणीके असंख्यातवें भाग है। तदनन्तर उसी स्थिति
और उसी कषाय अध्यवसाय स्थानको धारण करनेवाले जीवके दूसरा अनुभाग अध्यवसाय स्थान
होता है। इसके योगस्थान पहलेके समान जानना चाहिए। तात्पर्य यह है कि यहाँ भी पूर्वोक्त
तीनों बातें ध्रुव रहती हैं किन्तु योगस्थान जगश्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण होते हैं। इस प्रकार
असंख्यात लोकप्रमाण अनुभाग अध्यवसाय स्थानोंके होने तक तीसरे आदि अनुभाग अध्यवसाय
स्थानोंमें जानना चाहिए। तात्पर्य यह है कि यहाँ स्थिति और कषाय अध्यवसाय स्थान तो जघन्य
ही रहते हैं। किन्तु अनुभाग अध्यवसायस्थान क्रमसे असंख्यात लोकप्रमाण हो जाते हैं और एक-
एक अनुभाग अध्यवसाय स्थानके प्रति जगश्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण योगस्थान होते हैं।
तत्पश्चात् उसो स्थितिको प्राप्त होनेवाले जीवके दूसरा कषाय अध्यवसाय स्थान होता है। इसके
भी अनुभाग अध्यवसाय स्थान और योगस्थान पहलेके समान जानना चाहिए। अर्थात् एक-एक
कषाय अध्यवसाय स्थानके प्रति असंख्यात लोकप्रमाण अनुभाग अध्यवसाय स्थान होते हैं और
एक-एक अनुभाग अध्यवसायस्थानके प्रति जगश्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण योगस्थान होते हैं।
१. बा० अ० गा० २८ । २. -नुभवाध्य-दि० । ३. नुभवस्था-मु० । ४. -दिषु योगस्थानेषु चतुः
-मु०, ता० ।
.१२० सर्वार्थसिद्धौ [ २।१० § २८० –
व्वानि । एवं तृतीयादिष्वपि कषायाध्यवसायस्थानेषु आ असंख्येयलोकपरिसमाप्तेर्वृद्धिक्रमो
वेदितव्यः । उक्ताया जघन्यायाः स्थितेः समयाधिकायाः कषायादिस्थानानि पूर्ववत्¹ । एवं
समयाधिकक्रमेण आ उत्कृष्टस्थितेस्त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोटीपरिमितायाः कषायादिस्थानानि²
वेदितव्यानि । अनन्तभागवृद्धिः असंख्येयभागवृद्धिः संख्येयभागवृद्धिः संख्येयगुणवृद्धिः असंख्येयगुण-
५ वृद्धिः अनन्तगुणवृद्धिः इमानि षट् वृद्धिस्थानानि । हानिरपि तथैव । अनन्तभागवृद्ध्यनन्तगुणवृद्धि-
रहितानि चत्वारि स्थानानि । एवं सर्वेषां कर्मणां मूलप्रकृतीनामुत्तरप्रकृतीनां च परिवर्तनक्रमो
वेदितव्यः । तदेतत्सर्वं समुदितं भावपरिवर्तनम् । उक्तं च—
³“सव्वा पयडिट्ठिदीओ अणुभागपदेसबंधठाणानि ।
मिच्छत्तसंसिदेण य भमिदा पुण भावसंसारे ॥”
१० § २८०. उक्तात्पञ्चविधात्संसारान्निवृत्ता ये ते मुक्ताः । संसारिणां प्रागुपादानं तत्पूर्वक-
त्वान्मुक्तव्यपदेशस्य ।
इस प्रकार असंख्यात लोकप्रमाण कषाय अध्यवसाय स्थानोंके होने तक तीसरे आदि कषाय अध्य-
वसाय स्थानोंमें वृद्धिका क्रम जानना चाहिए । जिस प्रकार सबसे जघन्य स्थितिके कषायादि स्थान
कहे हैं उसी प्रकार एक समय अधिक जघन्य स्थितिके भी कषायादि स्थान जानना चाहिए और
१५ इसी प्रकार एक-एक समय अधिकके क्रमसे तीस कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति तक
प्रत्येक स्थिति विकल्पके भी कषायादि स्थान जानना चाहिए । अनन्त भागवृद्धि, असंख्यात भाग-
वृद्धि, संख्यात भागवृद्धि, संख्यात गुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि और अनन्त गुणवृद्धि इस प्रकार ये
वृद्धिके छह स्थान हैं तथा इसी प्रकार हानि भी छह प्रकारकी है। इनमें-से अनन्त भागवृद्धि और
अनन्त गुणवृद्धि इन दो स्थानोंके कम कर देनेपर चार स्थान होते हैं । इसी प्रकार सब मूल प्रकृ-
२० तियोंका और उनकी उत्तर प्रकृतियोंके परिवर्तनका क्रम जानना चाहिए । यह सब मिलकर एक
भावपरिवर्तन होता है। कहा भी है—
'इस जीवने मिथ्यात्वके संसर्गसे सब प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशबन्धके स्थानोंको
प्राप्त कर भावसंसारमें परिभ्रमण किया।'
§ २८०. जो उक्त पाँच प्रकारके संसारसे निवृत्त हैं वे मुक्त हैं। सूत्रमें 'संसारि' पदका
२५ पहले ग्रहण किया, क्योंकि 'मुक्त' यह संज्ञा संसारपूर्वक प्राप्त होती है ।
विशेषार्थ—जीवके मुख्य भेद दो हैं—संसारी और मुक्त । ये भेद जीवकी बद्ध और अबद्ध
अवस्थाको ध्यानमें रखकर किये गये हैं । वस्तुतः ये जीवकी दो अवस्थाएँ हैं। पहले जीव बद्ध
अवस्थामें रहता है इसलिए उसे संसारी कहते हैं और बादमें उसके मुक्त होनेपर वही मुक्त कह-
लाता है । जीवका संसार निमित्त-सापेक्ष होता है, इसलिए इस अपेक्षासे संसारके पाँच भेद किये
३० गये हैं—द्रव्यसंसार, क्षेत्रसंसार, कालसंसार, भवसंसार और भावसंसार । इनका दूसरा नाम परि-
वर्तन भी है। द्रव्य पदसे कर्म और नोकर्म लिये गये हैं, क्षेत्र पद से आकाशके प्रदेशों का ग्रहण
किया है, काल पदसे समयका ग्रहण किया है, भव पदसे जीवकी नर नारक आदि अवस्थाओंका
ग्रहण किया है और भाव पदसे जीवके योग और कषायस्थान विवक्षित हैं। इन द्रव्यादिके निमित्त-
से संसारमें जीवका परिभ्रमण किस प्रकार होता रहता है यही यहाँ बतलाया गया है । इन परि-
३५ वर्तनोंके होनेमें उत्तरोत्तर अधिक-अधिक काल लगता है। मुख्य रूपसे जीवका संसार सम्यग्दर्शन-
के प्राप्त होनेके पूर्वतक माना गया है, इससे ये परिवर्तन जीवकी मिथ्यात्व अवस्थामें होते हैं यह
सिद्ध होता है । सम्यग्दर्शनके होनेपर जीवका ईषत् संसार शेष रहनेपर भी वह इन परिवर्तनोंसे
१. पूर्ववदेकसम-मु० । २. -स्थानानि (पूर्ववत्) वेदि-मु० । ३. बा० अणु० गा० २९ ।
- २१२ § २८४ ] द्वितीयोऽध्यायः १३१
§ २८१. य एते संसारिणस्ते द्विविधाः-
समनस्कामनस्काः ॥११॥
§ २८२. मनो द्विविधम्—द्रव्यमनो भावमनश्चेति । तत्र पुद्गलविपाकिकर्मोदयापेक्षं
द्रव्यमनः । वीर्यान्तरायनोइन्द्रियावरणक्षयोपशमापेक्षा१ आत्मनो विशुद्धिर्भावमनः । तेन मनसा
सह वर्तन्त इति समनस्काः । न विद्यते मनो येषां त इमे अमनस्काः । एवं मनसो भावाभावाभ्यां ५
संसारिणो द्विविधा विभज्यन्ते । समनस्काश्चामनस्काश्च समनस्कामनस्का इति । अभ्यर्हितत्वात्स-
मनस्कशब्दस्य पूर्वनिपातः । कथमभ्यर्हितत्वम् । गुणदोषविचारकत्वात् ।
§ २८३. पुनरपि संसारिणां भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
संसारिणस्त्रसस्थावराः ॥१२॥
§ २८४. 'संसारि' ग्रहणमनर्थकम्; प्रकृतत्वात् । क्व प्रकृतम् । 'संसारिणो मुक्ताश्च' इति । १०
नानर्थकम् । पूर्वापेक्षार्थम् । ये उक्ताः समनस्का अमनस्कास्ते संसारिण इति । यदि हि पूर्वस्य
विशेषणं न स्यात् समनस्कामनस्कग्रहणं संसारिणो मुक्ताश्चेत्यनेन यथासंख्यमभिसंबद्ध्येत । एवं
च कृत्वा 'संसारि'ग्रहणमादौ क्रियमाणमुपपन्नं भवति । तत्पूर्वापेक्षं सदुत्तरार्थमपि भवति२ । ते
संसारिणो द्विविधाः-त्रसाः स्थावरा इति । त्रसनामकर्मोदयवशीकृतास्त्रसाः३ । स्थावरनामकर्मोदय-
मुक्त हो जाता है । पूर्ण मोक्ष मुक्त अवस्थामें होता है । इसीसे जीवके संसारी और मुक्त ये दो १५
भेद किये गये हैं ।
§ २८१. पहले जो संसारी जीव कह आये हैं वे दो प्रकारके हैं । आगेके सूत्र द्वारा इसी
बातको बतलाते हैं—
मनवाले और मनरहित ऐसे संसारी जीव हैं ॥११॥
§ २८२. मन दो प्रकारका है द्रव्यमन और भावमन । उनमें से द्रव्यमन पुद्गलविपाकी २०
आंगोपांग नामकर्मके उदयसे होता है तथा वीर्यान्तराय और नोइन्द्रियावरण कर्मके क्षयोपशमकी
अपेक्षा रखनेवाले आत्माकी विशुद्धिको भावमन कहते हैं । यह मन जिन जीवोंके पाया जाता है
वे समनस्क हैं । और जिनके मन नहीं पाया जाता है वे अमनस्क हैं । इस प्रकार मनके सद्भाव
और असद्भावकी अपेक्षा संसारी जीव दो भागोंमें बँट जाते हैं। 'समनस्कामनस्काः' इसमें समनस्क
और अमनस्क इस प्रकार द्वन्द्व समास है । समनस्क शब्द श्रेष्ठ है अतः उसे सूत्रमें पहले रखा । २५
शंका—श्रेष्ठता किस कारणसे हैं ? समाधान—क्योंकि समनस्क जीव गुण और दोषोंके विचारक
होते हैं । इसलिए समनस्क पद श्रेष्ठ है ।
§ २८३. अब फिरसे भी संसारी जीवोंके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तथा संसारी जीव त्रस और स्थावरके भेदसे दो प्रकार हैं ॥१२॥
§ २८४. शंका—सूत्रमें 'संसारी' पदका ग्रहण करना निरर्थक है क्योंकि वह प्रकरण प्राप्त ३०
है ? प्रतिशंका—इसका प्रकरण कहाँ है ? शंकाकार—'संसारिणो मुक्ताश्च' इस सूत्रसे उसका
प्रकरण है । समाधान—सूत्रमें 'संसारी' पदका ग्रहण करना अनर्थक नहीं है, क्योंकि पूर्व सूत्रकी
अपेक्षा इस सूत्रमें 'संसारी' पदका ग्रहण किया है । तात्पर्य यह है कि पूर्व सूत्रमें जो समनस्क और
अमनस्क जीव बतलाये हैं वे संसारी हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए इस सूत्रमें 'संसारी' पद दिया
है । यदि 'संसारी' पदको पूर्वका विशेषण न माना जाय तो समनस्क और अमनस्क इनका संसारी ३५
और मुक्त इनके साथ क्रमसे सम्बन्ध हो जायगा । और इस अभिप्रायसे 'संसारी' पदका आदिमें
ग्रहण करना बन जाता है । इस प्रकार 'संसारी' पदका ग्रहण पूर्व सूत्रकी अपेक्षासे होकर अगले
१. -पेक्ष्या आत्मनो मु०, ता० । २. भवति । संसा-मु० । ३. त्रसनाम भा०, दि० १, दि० २, ता० ।
१६
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वशवर्तिनः स्थावराः । त्रस्यन्तीति त्रसाः, स्थानशीलाः स्थावरा इति चेत् । न; आगमविरोधात् ।
आगमे हि कायानुवादेन त्रसा द्वीन्द्रियादारभ्य आ अयोगकेवलिन इति । तस्मान्न चलनाचलनापेक्षं
त्रसस्थावरत्वम् । कर्मोदयापेक्षमेव । त्रसग्रहणमादौ क्रियते; अल्पाच्तरत्वादभ्यर्हितत्वाच्च । सर्वो-
प्रयोगसंभवादभ्यर्हितत्वम् ।
§ २८५. एकेन्द्रियाणामतिबहुवक्तव्याभावादुल्लङ्घ्यानुपूर्वी स्थावरभेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः ॥१३॥
§ २८६. स्थावरनामकर्मभेदाः पृथिवीकायादयः सन्ति । तदुदयनिमित्ता¹ जीवेषु पृथिव्यादयः
संज्ञा वेदितव्याः । प्रथनादिप्रकृतिनिष्पन्ना अपि रूढिवशात्प्रथनाद्यनपेक्षा वर्तन्ते । एषां पृथिव्यादी-
नामार्षे चातुर्विध्यमुक्तं प्रत्येकम् । तत्कथमिति चेद् । उच्यते—पृथिवी पृथिवीकायः पृथिवीकायिकः
पृथिवीजीव इत्यादि । तत्र अचेतना वैश्रसिकपरिणामनिर्वृत्ता काठिन्यगुणात्मिका पृथिवी । अचेतन-
त्वादसत्यपि पृथिवीकायनामकर्मोदये प्रथनक्रियोपलक्षितैवेयम् । अथवा पृथिवीति सामान्यम्;
उत्तरत्रयेऽपि सद्भावात् । कायः शरीरम् । पृथिवीकायिकजीवपरित्यक्तः पृथिवीकायो मृतमनुष्यादि-
सूत्रके लिए भी हो जाता है । यथा—वे संसारी जीव दो प्रकारके हैं त्रस और स्थावर । जिनके
त्रस नामकर्मका उदय है वे त्रस कहलाते हैं और जिनके स्थावर नाम कर्मका उदय है उन्हें स्थावर
कहते हैं। शंका—'त्रस्यन्ति' अर्थात् जो चलते-फिरते हैं वे त्रस हैं और जो स्थिति स्वभाववाले हैं
वे स्थावर हैं, क्या त्रस और स्थावरका यह लक्षण ठीक है ? समाधान—यह कहना ठीक नहीं,
क्योंकि ऐसा माननेमें आगमसे विरोध आता है । क्योंकि कायानुवादकी अपेक्षा कथन करते हुए
आगम में बतलाया है कि द्वीन्द्रिय जीवोंसे लेकर अयोग केवली तकके सब जीव त्रस हैं । इसलिए
गमन करने और न करनेकी अपेक्षा त्रस और स्थावर यह भेद नहीं है किन्तु त्रस और स्थावर
कर्मोंके उदयकी अपेक्षासे ही है । सूत्रमें त्रसपदका प्रारम्भमें ग्रहण किया है क्योंकि स्थावर पदसे
इसमें कम अक्षर हैं और यह श्रेष्ठ है । त्रस श्रेष्ठ इसलिए हैं कि इनके सब उपयोगोंका पाया जाना
सम्भव है ।
§ २८५. एकेन्द्रियोंके विषयमें अधिक वक्तव्य नहीं है इसलिए आनुपूर्वीको छोड़कर पहले
स्थावरके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक ये पाँच
स्थावर हैं ॥ १३ ॥
§ २८६. पृथिवीकाय आदि स्थावर नामकर्मके भेद हैं । उनके उदयके निमित्तसे जीवोंके
पृथिवी आदिक नाम जानने चाहिए । यद्यपि ये नाम प्रथन आदि धातुओंसे बने हैं तो भी ये रूढिक
हैं इसलिए इनमें प्रथन आदि धर्मोंकी अपेक्षा नहीं है । शंका—आर्षमें ये पृथिवी आदिक अलग-
अलग चार प्रकारके कहे हैं सो ये चार-चार भेद किस प्रकार प्राप्त होते हैं ? समाधान—
पृथिवी, पृथिवीकाय, पृथिवीकायिक और पृथिवीजीव ये पृथिवीके चार भेद हैं । इनमेंसे जो
अचेतन है, प्राकृतिक परिणमनोंसे बनी है और कठिन गुणवाली है वह पृथिवी है । अचेतन होनेसे
यद्यपि इसमें पृथिवी नामकर्मका उदय नहीं है तो भी प्रथनक्रियासे उपलक्षित होनेके कारण अर्थात्
विस्तार आदि गुणवाली होनेके कारण यह पृथिवी कहलाती है । अथवा पृथिवी यह सामान्य भेद
है क्योंकि आगेके तीन भेदोंमें भी यह पाया जाता है । कायका अर्थ शरीर है, अतः पृथिवीकायिक
जीवके द्वारा जो शरीर छोड़ दिया जाता है वह पृथिवीकाय कहलाता है । यथा मरे हुए मनुष्य
१. –निमित्ता अमी इति जीवेषु मु० ना० ।
- २।१४ § २८८ ] द्वितीयोऽध्यायः १२३
कायवत् । पृथिवीकायोऽस्यास्तीति पृथिवीकायिकः । तत्कायसंबन्धवशीकृत आत्मा । समवाप्त-
पृथिवीकायनामकर्मोदयः कार्मणकाययोगस्थो यो न तावत्पृथिवीं कायत्वेन गृह्णाति स पृथिवीजीवः।१
एवमबादिष्वपि योज्यम् । एते पञ्चविधाः प्राणिनः स्थावराः । कति पुनरेषां प्राणाः । चत्वारः
स्पर्शेनेन्द्रियप्राणः कायबलप्राणः उच्छ्वासनिश्वासप्राणः आयुःप्राणश्चेति ।
§ २८७. अथ त्रसाः के ते, इत्यत्रोच्यते--
द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः ॥१४॥
§ २८८. द्वे इन्द्रिये यस्य सोऽयं द्वीन्द्रियः । द्वीन्द्रिय आदिर्येषां ते द्वीन्द्रियादयः२ । 'आदि'-
शब्दो व्यवस्थावाची । क्व व्यवस्थिताः । आगमे । कथम् । द्वीन्द्रियस्त्रीन्द्रियश्चतुरिन्द्रियः पञ्चेन्द्रिय-
श्चेति । 'तद्गुणसंविज्ञानवृत्तिग्रहणाद् द्वीन्द्रियस्याप्यन्तर्भावः । कति पुनरेषां प्राणाः । द्वीन्द्रियस्य
तावत् षट् प्राणाः, पूर्वोक्ता एव रसनवाक्प्राणाधिकाः । त्रीन्द्रियस्य सप्त त एव घ्राणप्राणाधिकाः ।
चतुरिन्द्रियस्याष्टौ त एव चक्षुःप्राणाधिकाः । पञ्चेन्द्रियस्य तिर्यञ्चोऽसंज्ञिनो नव त एव श्रोत्र-
प्राणाधिकाः । संज्ञिनो दश त एव मनोबलै३प्राणाधिकाः ।
आदिकका शरीर । जिस जीवके पृथिवीरूप काय विद्यमान है उसे पृथिवीकायिक कहते हैं । तात्पर्य
यह है कि यह जीव पृथिवीरूप शरीरके सम्बन्धसे युक्त है । कार्मणकाययोगमें स्थित जिस जीवने
जबतक पृथिवीको कायरूपसे ग्रहण नहीं किया है तबतक वह पृथिवीजीव कहलाता है इसी प्रकार
जलादिकमें भी चार-चार भेद कर लेने चाहिए । ये पाँचों प्रकारके प्राणी स्थावर हैं । शंका-
इनके कितने प्राण होते हैं ? समाधान-इनके चार प्राण होते हैं-स्पर्शन इन्द्रियप्राण, कायबल-
प्राण, उच्छ्वास निःश्वासप्राण और आयुःप्राण ।
§ २८७. अब त्रस कौन हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
दो इन्द्रिय आदि त्रस हैं ॥ १४ ॥
§ २८८. जिन जीवोंके दो इन्द्रियां होती हैं उन्हें दो इन्द्रिय कहते हैं । तथा जिनके
प्रारम्भमें दो इन्द्रिय जीव हैं वे दो इन्द्रियादिक कहलाते हैं । यहाँ आदि शब्द व्यवस्थावाची
है । शंका-ये व्यवस्थित जीव कहाँ बतलाये हैं ? समाधान-आगममें बतलाये हैं । शंका-
किस क्रमसे ? समाधान-दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पंचेन्द्रिय इस क्रमसे
व्यवस्थित हैं । यहाँ तद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि समासका ग्रहण किया है इसलिए द्वीन्द्रियका
भी अन्तर्भाव हो जाता है । शंका-इन द्वीन्द्रिय आदि जीवोंके कितने प्राण होते हैं ?
समाधान-पूर्वोक्त चार प्राणोंमें रसनाप्राण और वचनप्राण इन दो प्राणोंके मिला देनेपर दो
इन्द्रिय जीवोंके छह प्राण होते हैं । इनमें घ्राणप्राणके मिला देनेपर तीनइन्द्रिय जीवके
सात प्राण होते हैं । इनमें चक्षुप्राणके मिला देनेपर चौइन्द्रिय जीवके आठ प्राण होते हैं ।
इनमें श्रोत्रप्राणके मिला देनेपर तिर्यंच असंज्ञीके नौ प्राण होते हैं । इनमें मनोबलके मिला
देनेपर संज्ञी जीवोंके दस प्राण होते हैं ।
विशेषार्थ-यहाँ द्वीन्द्रियके छह, त्रीन्द्रियके सात, चतुरिन्द्रियके आठ, असंज्ञीके
नौ और संज्ञीके दस प्राण पर्याप्त अवस्थाकी अपेक्षा बतलाये हैं । अपर्याप्त अवस्था में इनके
क्रमसे चार, पाँच, छह और सात प्राण होते हैं । खुलासा इस प्रकार है-कुल
प्राण दस हैं-पाँच इन्द्रिय प्राण, तीन बल प्राण, आयु और श्वासोच्छ्वास । इनमें-से संज्ञी
और असंज्ञीके अपर्याप्त अवस्था में श्वासोच्छ्वास, मनोबल और वचनबल ये तीन प्राण नहीं
१. जीवः । उक्तं च-पुढवी पुढवीकायो पुढवीकाइय पुढविजीवो य । साहारणोपमुक्को सरीरगहिदो
भवंतरिदो ॥ एव -मु० । २. 'बहुव्रीहौ तद्गुणसंविज्ञानमपि-परि०-शे० प० ४।४ । ३. बलाधिकाः,
आ०, दि० १, दि० २।
१२४ सर्वार्थसिद्धौ [ २।१५ § २८९ -
§ २८९. 'आदि'शब्देन निर्दिष्टानामनिर्ज्ञातसंख्यानामियत्तावधारणं कर्त्तव्यमित्यत आह-
पञ्चेन्द्रियाणि ॥१५॥
§ २९०. 'इन्द्रिय'शब्दो व्याख्यातार्थः । 'पञ्च'ग्रहणमवधारणार्थम्, पञ्चैव नाधिक-
संख्यानीति । कर्मेन्द्रियाणां १वागादीनामिह ग्रहणं कर्तव्यम् । न कर्तव्यम्; उपयोगप्रकरणात् ।
उपयोगसाधनानामिह ग्रहणं२ न क्रियासाधनानाम्; अनवस्थानाच्च । क्रियासाधनानामङ्गोपाङ्ग-
नामकर्मनिर्वर्तितानां सर्वेषामपि क्रियासाधनत्वमस्तीति न पञ्चैव कर्मेन्द्रियाणि ।
§ २९१. तेषामन्तर्भेदप्रदर्शनार्थमाह-
द्विविधानि३ ॥ १६ ॥
§ २९२. 'विध'शब्दः प्रकारवाची । द्वौ विधौ येषां तानि द्विविधानि, द्विप्रकाराणीत्यर्थः ।
कौ पुनस्तौ द्वौ प्रकारौ । द्रव्येन्द्रियं भावेन्द्रियमिति ।
§ २९३. तत्र द्रव्येन्द्रियस्वरूपप्रतिपत्त्यर्थमाह -
निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् ॥ १७ ॥
होते, शेष सात प्राण होते हैं। चतुरिन्द्रियके अपर्याप्त अवस्था में तीन ये और श्रोत्रेन्द्रिय ये
चार प्राण नहीं होते, शेष छह प्राण होते हैं। त्रीन्द्रियके अपर्याप्त अवस्था में चार ये और
चक्षुरिन्द्रिय ये पाँच प्राण नहीं होते, शेष पाँच प्राण होते हैं और द्वीन्द्रियके अपर्याप्त अवस्था में
पाँच ये और घ्राणेन्द्रिय ये छह प्राण नहीं होते, शेष चार प्राण होते हैं।
§ २८९. पूर्व सूत्रमें जो आदि शब्द दिया है उससे संख्या नहीं ज्ञात होती अतः उसके
परिमाणका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
इन्द्रियाँ पाँच हैं ॥ १५ ॥
§ २९०. इन्द्रिय शब्दका व्याख्यान कर आये । सूत्रमें जो 'पंच' पदका ग्रहण किया है वह
मर्यादाके निश्चित करनेके लिए किया है कि इन्द्रियाँ पाँच ही होती हैं । इन्द्रियोंकी इससे और
अधिक संख्या नहीं पायी जाती । शंका--इस सूत्रमें वचनादिक कर्मेन्द्रियोंका ग्रहण करना
चाहिए ? समाधान--नहीं करना चाहिए, क्योंकि उपयोगका प्रकरण है। इस सूत्रमें उपयोगकी
साधनभूत इन्द्रियोंका ग्रहण किया है, क्रियाकी साधनभूत इन्द्रियोंका नहीं। दूसरे क्रियाकी साधन-
भूत इन्द्रियोंकी मर्यादा नहीं है। अंगोपांग नामकर्मके उदयसे जितने भी अंगोपांगोंकी रचना
होती है वे सब क्रियाके साधन हैं इसलिए कर्मेन्द्रियाँ पाँच ही हैं ऐसा कोई नियम नहीं किया जा
सकता है।
§ २९१. अब उन पाँचों इन्द्रियोंके अन्तर्भेदोंको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
वे प्रत्येक दो-दो प्रकार की हैं ॥१६॥
§ २९२. विध शब्द प्रकारवाची है । 'द्विविधानि' पदमें 'द्वौ विधौ येषां तानि द्विविधानि'
इस प्रकार बहुव्रीहि समास है । जिसका यह आशय है कि ये पाँचों इन्द्रियाँ प्रत्येक दो प्रकारकी हैं ।
शंका-वे दो प्रकार कौन हैं ? समाधान-द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय ।
§ २९३. अब द्रव्येन्द्रियके स्वरूपका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
निर्वृत्ति और उपकरणरूप द्रव्येन्द्रिय है ॥१७॥
१. 'वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाण्याहुः । - सां० कौ० श्लो० २६ । २. ग्रहणं कृतं न क्रिया-मु०,
ता०, ना० । ३. 'कतिविहाणं भंते इंदिया पण्णत्ता । गोयमा, दुविहा पण्णत्ता । तं जहा-दव्विंदिया य भाविं-
दिया य - पण्णवणा पद १५ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
- २।१८ § २९६ ] द्वितीयोऽध्यायः १२५
§ २९४. निर्वर्त्यते ¹इति निर्वृत्तिः । केन निर्वर्त्यते । कर्मणा । सा द्विविधा; बाह्याभ्यन्तर-
भेदात् । उत्सेधाङ्गुलासंख्येयभागप्रमितानां शुद्धानामात्मप्रदेशानां प्रतिनियतचक्षुरादीन्द्रियसंस्थाने-
नावस्थितानां वृत्तिराभ्यन्तरा निर्वृत्तिः । तेष्वात्मप्रदेशेष्विन्द्रियव्यपदेशभाक्षु यः प्रतिनियतसंस्थानो
नामकर्मोदयापादितावस्थाविशेषः पुद्गलप्रचयः सा बाह्या निर्वृत्तिः । येन निर्वृत्तेरुपकारः क्रियते
तदुपकरणम् । पूर्ववत्तदपि द्विविधम् । तत्राभ्यन्तरं कृष्णशुक्लमण्डलं बाह्यमक्षिपत्रपक्ष्मद्वयादि । ५
एवं ²शेषेष्वपीन्द्रियेषु ज्ञेयम् ।
§ २९५. भावेन्द्रियमुच्यते--
लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम् ॥ १८ ॥
§ २९६. लम्भनं लब्धिः । का पुनरसौ । ज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमविशेषः । यत्संनिधा-
नादात्मा द्रव्येन्द्रियनिर्वृत्ति प्रति व्याप्रियते तन्निमित्त आत्मनः परिणाम उपयोगः । तदुभये भावे- १०
न्द्रियम् । इन्द्रियफलमुपयोगः, तस्य कथमिन्द्रियत्वम् । कारणधर्मस्य कार्ये दर्शनात् । यथा घटा-
कारपरिणतं विज्ञानं घट इति । स्वार्थस्य तत्र मुख्यत्वाच्च । इन्द्रस्य लिङ्गमिन्द्रियमिति यः स्वार्थः
स उपयोगे³ मुख्यः, उपयोगलक्षणो जीव इति वचनात् । अत उपयोगस्येन्द्रियत्वं न्याय्यम् ।
§ २९४. रचनाका नाम निर्वृत्ति है। शंका—यह रचना कौन करता है ? समाधान—
कर्म । निर्वृत्ति दो प्रकार की है—बाह्यनिर्वृत्ति और आभ्यन्तर निर्वृत्ति । उत्सेधांगुलके असंख्यातवें १५
भागप्रमाण और प्रतिनियत चक्षु आदि इन्द्रियोंके आकाररूपसे अवस्थित शुद्ध आत्मप्रदेशोंकी रचना-
को आभ्यन्तर निर्वृत्ति कहते हैं। तथा इन्द्रिय नामवाले उन्हीं आत्मप्रदेशोंमें प्रतिनियत आकाररूप
और नामकर्मके उदयसे विशेष अवस्थाको प्राप्त जो पुद्गलप्रचय होता है उसे बाह्यनिर्वृत्ति कहते
हैं। जो निर्वृत्तिका उपकार करता है उसे उपकरण कहते हैं। निर्वृत्तिके समान यह भी दो प्रकार-
का है—आभ्यन्तर और बाह्य । नेत्र इन्द्रियमें कृष्ण शुक्लमण्डल आभ्यन्तर उपकरण है तथा २०
पलक और दोनों बरोनी आदि बाह्य उपकरण हैं। इसी प्रकार शेष इन्द्रियोंमें भी जानना चाहिए ।
विशेषार्थ—आगममें संसारी जीवके प्रदेश चलाचल बतलाये हैं। मध्यके आठ प्रदेश अचल
होते हैं और शेष प्रदेश चल । ऐसी अवस्थामें नियत आत्म प्रदेश ही सदा विवक्षित इन्द्रियरूप बने
रहते हैं यह नहीं कहा जा सकता, किन्तु प्रदेश परिस्पन्दके अनुसार प्रति समय अन्य-अन्य प्रदेश
आभ्यन्तर निर्वृत्तिरूप होते रहते हैं ऐसा यहाँ समझना चाहिए। जिसके जितनी इन्द्रियां होती हैं उसके २५
उतने इन्द्रियावरण कर्मोंका क्षयोपशम सर्वांग होता है, इसलिए आभ्यन्तर निर्वृत्तिकी उक्त प्रकारसे
व्यवस्था माननेमें कोई बाधा नहीं आती। यह उक्त कथनका तात्पर्य है। शेष कथन सुगम है।
§ २९५. अब भावेन्द्रियका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
लब्धि और उपयोगरूप भावेन्द्रिय है ॥१८॥
§ २९६. लब्धि शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—लम्भनं लब्धिः—प्राप्त होना । शंका— ३०
लब्धि किसे कहते हैं ? समाधान—ज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशम विशेषको लब्धि कहते हैं। जिसके
संसर्गसे आत्मा द्रव्येन्द्रियकी रचना करनेके लिए उद्यत होता है तन्निमित्तक आत्माके परिणामको
उपयोग कहते हैं। लब्धि और उपयोग ये दोनों भावेन्द्रियाँ हैं। शंका—उपयोग इन्द्रियका फल है,
वह इन्द्रिय कैसे हो सकता है ? समाधान—कारणका धर्म कार्यमें देखा जाता है। जैसे घटाकार
परिणत हुआ ज्ञान भी घट कहलाता है, अतः इन्द्रियके फलको इन्द्रिय माननेमें कोई आपत्ति नहीं ३५
है । दूसरे इन्द्रियका जो अर्थ है वह मुख्यतासे उपयोगमें पाया जाता है। तात्पर्य यह है कि 'इन्द्रके
लिंगको इन्द्रिय कहते हैं' यह जो इन्द्रिय शब्दका अर्थ है वह उपयोगमें मुख्य है, क्योंकि जीवका लक्षण
१. निर्वर्त्यत इति मु० । २. शेषेष्विन्द्रि-मु० । ३. -योगो मुख्यः दि० १, दि० २, मु० ।
१२६ सर्वार्थसिद्धौ [ २।१९ § २९७ –
§ २९७. उक्तानामिन्द्रियाणां संज्ञानुपूर्वीप्रतिपादनार्थमाह—
'स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्राणि ॥१९॥
§ २९८. लोके इन्द्रियाणां पारतन्त्र्यविवक्षा दृश्यते । अनेनाक्ष्णा सुष्ठु पश्यामि, अनेन
कर्णेन सुष्ठु शृणोमीति । ततः पारतन्त्र्यात्स्पर्शनादीनां करणत्वम् । वीर्यान्तरायमतिज्ञानावरण-
५ उपयोग है ऐसा वचन है अतः उपयोगको इन्द्रिय मानना उचित है ।
विशेषार्थ—ज्ञानकी अमुक पर्यायको प्रकट न होने देना विवक्षित ज्ञानावरणके सर्वघाती
स्पर्धकोंके उदयका काम है । किन्तु जिस जीवके विवक्षित ज्ञानावरणका क्षयोपशम होता है उसके
उस ज्ञानावरणके सर्वघाती स्पर्धकोंका उदय न होनेसे विवक्षित ज्ञानके प्रकाशमें आनेकी योग्यता
होती है और इसी योग्यताका नाम लब्धि है । ऐसी योग्यता एक साथ सभी क्षायोपशमिक
१० ज्ञानोंकी हो सकती है किन्तु उपयोगमें एक कालमें एक ही ज्ञान आता है । इसका अभिप्राय यह है
कि क्षायोपशमिक ज्ञानकी पर्यायका नाम लब्धि न होकर क्षयोपशमविशेषका नाम लब्धि है और
उपयोग ज्ञानकी पर्यायका नाम है । यही कारण है कि लब्धि एक साथ अनेक ज्ञानोंकी हो सकती
है पर उपयोग एक कालमें एक ही ज्ञानका होता है । पहले प्रथम अध्याय सूत्र १४ में यह कह
आये हैं कि मतिज्ञान इन्द्रिय और मनके निमित्तसे होता है इससे ज्ञात होता है कि उपयोग स्वरूप
१५ ज्ञानकी इन्द्रिय संज्ञा न होकर जो उपयोगरूप मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके होनेमें साधकतम करण है
उसीकी इन्द्रिय संज्ञा है इसलिए वहाँ निर्वृत्ति, उपकरण और लब्धिको इन्द्रिय कहना तो ठीक है,
क्योंकि ये उपयोगरूप मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके होनेमें साधकतम करण हैं पर स्वयं उपयोगको
इन्द्रिय कहना ठीक नहीं है, क्योंकि वह इन्द्रिय व्यापारका फल है । यह एक शंका है जिसका
समाधान पूज्यपाद स्वामीने दो प्रकारसे किया है । प्रथम तो यह बतलाया है कि कारणके धर्म
२० इन्द्रियत्वका कार्यमें उपचार करके उपयोगको भी इन्द्रिय कहा है । अर्थात् उपयोग स्वयं इन्द्रिय
नहीं है किन्तु इन्द्रियके निमित्तसे वह होता है इसलिए यहाँ उपचारसे उसे इन्द्रिय कहा है । यह
प्रथम समाधान है । दूसरा समाधान करते हुए उन्होंने जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि
जिससे इन्द्र अर्थात् आत्माकी पहचान हो वह इन्द्रिय कहलाती है और ऐसी पहचान करानेवाली
वस्तु निज अर्थ होनी चाहिए । यदि इस दृष्टिसे देखा जाता है तो इन्द्रिय शब्दका मुख्य वाच्य
२५ उपयोग ही ठहरता है, क्योंकि वह आत्माका निज अर्थ है । यही कारण है कि यहाँ उपयोगको
भी इन्द्रिय कहा है । तात्पर्य यह है कि निमित्तकी अपेक्षा विचार करनेपर निर्वृत्ति, उपकरण और
लब्धिको इन्द्रिय संज्ञा प्राप्त होती है और स्वार्थकी अपेक्षा विचार करनेपर उपयोगको इन्द्रिय संज्ञा
प्राप्त होतो है । पहले प्रथम अध्यायमें केवल निमित्तकी अपेक्षा इन्द्रिय शब्दका व्यवहार किया
गया था और यहाँ निमित्त और मुख्यार्थ दोनोंको ध्यानमें रखकर इन्द्रियके भेद दिखलाये गये हैं
३० इसलिए कोई विरोध नहीं है ।
§ २९७. अब उक्त इन्द्रियोंके क्रमसे संज्ञा दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
स्पर्शन, रसन, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र ये इन्द्रियाँ हैं ॥१९॥
§ २९८. लोकमें इन्द्रियोंकी पारतन्त्र्य विवक्षा देखी जाती है । जैसे इस आँखसे मैं अच्छा
देखता हूँ, इस कानसे मैं अच्छा सुनता हूँ । अतः पारतन्त्र्य विवक्षामें स्पर्शन आदि इन्द्रियोंका
३५ १. 'बुद्धीन्द्रियाणि चक्षुःश्रोत्रघ्राणरसनत्वगाख्यानि ।' सां० कौ०, श्लो० ६ । घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणीन्द्रि-
याणि भूतेभ्यः ।' –न्या० सू० १, १, १२ ।
- २।२० § ३०० ] द्वितीयोऽध्यायः १२७
क्षयोपशमाङ्गोपाङ्गनामलाभावष्टम्भादात्मना ^१स्पृश्यतेऽनेनेति स्पर्शनम् । रस्यतेऽनेनेति रसनम् ।
घ्रायतेऽनेनेति घ्राणम् । चक्षेरनेकार्थत्वाद्दर्शनार्थविवक्षायां चष्टे अर्थान्पश्यत्यनेनेति चक्षुः । श्रूयते-
ऽनेनेति श्रोत्रम् । स्वातन्त्र्यविवक्षा च दृश्यते । इदं ^२ मे अक्षि सुष्ठु पश्यति । अयं मे कर्णः सुष्ठु
शृणोति । ततः स्पर्शनादीनां कर्तरि निष्पत्तिः । स्पृशतीति स्पर्शनम् । रसतीति रसनम् । जिघ्र-
तीति घ्राणम् । चष्टे इति चक्षुः । शृणोतीति श्रोत्रम् । एषां निर्देशक्रमः एकैकवृद्धिक्रमप्रज्ञापनार्थः । ५
§ २९९. तेषामिन्द्रियाणां विषयप्रदर्शनार्थमाह—
^३ स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तदर्थाः ॥२०॥
§ ३००. द्रव्यपर्याययोः प्राधान्यविवक्षायां कर्मभावसाधनत्वं स्पर्शादिशब्दानां वेदितव्यम् ।
द्रव्यप्राधान्यविवक्षायां कर्मनिर्देशः । स्पृश्यत इति स्पर्शः । रस्यत इति रसः । गन्ध्यत इति गन्धः । १०
वर्ण्यत इति वर्णः । शब्दयत इति शब्दः । पर्यायप्राधान्यविवक्षायां भावनिर्देशः । स्पर्शनं स्पर्शः ।
रसनं रसः । गन्धनं गन्धः । वर्णनं वर्णः । शब्दनं शब्द ^४ इति । एषां क्रम इन्द्रियक्रमेणैव व्याख्यातः ।
करणपना बन जाता है । वीर्यान्तराय और मतिज्ञानावरणकर्मके क्षयोपशमसे तथा अंगोपांग नाम-
कर्मके आलम्बनसे आत्मा जिसके द्वारा स्पर्श करता है वह स्पर्शन इन्द्रिय है, जिसके द्वारा स्वाद
लेता है वह रसन इन्द्रिय है, जिसके द्वारा सूंघता है वह घ्राण इन्द्रिय है । चक्षि धातुके अनेक १५
अर्थ हैं । उनमें-से यहाँ दर्शनरूप अर्थ लिया गया है इसलिए जिसके द्वारा पदार्थोंको देखता है
वह चक्षु इन्द्रिय है तथा जिसके द्वारा सुनता है वह श्रोत्र इन्द्रिय है । इसीप्रकार इन इन्द्रियोंकी
स्वातन्त्र्य विवक्षा भी देखी जाती है । जैसे यह मेरी आँख अच्छी तरह देखती है, यह मेरा कान
अच्छी तरह सुनता है । और इसलिए इन स्पर्शन आदि इन्द्रियोंकी कर्ताकारकमें सिद्धि होती है ।
यथा—जो स्पर्श करती है वह स्पर्शन इन्द्रिय है, जो स्वाद लेती है वह रसन इन्द्रिय है, जो सूंघती
है वह घ्राण इन्द्रिय है, जो देखती है वह चक्षु इन्द्रिय है और जो सुनती है वह कर्ण इन्द्रिय है । २०
सूत्रमें इन इन्द्रियोंका जो स्पर्शनके बाद रसना और उसके बाद घ्राण इत्यादि क्रमसे निर्देश किया
है वह एक-एक इन्द्रियकी इस क्रमसे वृद्धि होती है यह दिखलानेके लिए किया है ।
§ २९९. अब उन इन्द्रियोंका विषय दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
स्पर्शन, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द ये क्रमसे उन इन्द्रियोंके विषय हैं ॥२०॥ २५
§ ३००. द्रव्य और पर्यायकी प्राधान्य विवक्षामें स्पर्शादि शब्दोंकी क्रमसे कर्मसाधन अरौ
भावसाधनमें सिद्धि जानना चाहिए । जब द्रव्यकी अपेक्षा प्रधान रहती है तब कर्मनिर्देश होता
है । जैसे—जो स्पर्श किया जाता है वह स्पर्श है, जो स्वादको प्राप्त होता है वह रस है, जो सूंघा
जाता है वह गन्ध है, जो देखा जाता है वह वर्ण है और जो शब्दरूप होता है वह शब्द है । इस
व्युत्पत्तिके अनुसार ये सब स्पर्शादिक द्रव्य ठहरते हैं । तथा जब पर्यायकी विवक्षा प्रधान रहती ३०
है तब भावनिर्देश होता है । जैसे—स्पर्शन स्पर्श है, रसन रस है, गन्धन गन्ध है, वर्णन वर्ण है
और शब्दन शब्द है । इस व्युत्पत्तिके अनुसार ये सब स्पर्शादिक धर्म निश्चित होते हैं । इन
१. जिघ्रत्यनेन घ्राणं गन्धं गृह्णातीति । रसयत्यनेनेति रसनं रसं गृह्णातीति । चष्टेऽनेनेति चक्षू रूपं
पश्यतीति × × शृणोत्यनेनेति श्रोत्रं शब्दं गृह्णातीति । —वा० भा० १, १, १२ । २. इमानीन्द्रियाणि
कदाचित्स्वातन्त्र्येण विवक्षितानि भवन्ति । तद्यथा—इदं मे अक्षि सुष्ठु पश्यति, अयं मे कर्णः सुष्ठु शृणोतीति । ३५
कदाचित्पारतन्त्र्येण विवक्षितानि भवन्ति—अनेनाक्ष्णा सुष्ठु पश्यामि । अनेन कर्णेन सुष्ठु शृणोमि इति ।
—पा० म० भा० १।२।२।५९ । ३. गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः । —वा० भा० १,
१, ४१ । ४. -शब्दः । एषां मु० ता० । -शब्दः । तेषां मु० ।
१२८ सर्वार्थसिद्धौ [ २।२१ § ३०१ -
§ ३०१. अत्राह, यत्तावन्मनोऽनवस्थानादिन्द्रियं न भवतीति प्रत्याख्यातं तत्किमुपयोग-
स्योपकारि उत नेति । तदप्युपकार्य्येव । तेन विनेन्द्रियाणां विषयेषु स्वप्रयोजनवृत्त्यभावात् । किम-
स्यैषां सहकारित्वमात्रमेव प्रयोजनमुतान्यदपीत्यत आह--
श्रुतमनिन्द्रियस्य ॥ २१ ॥
§ ३०२. श्रुतज्ञानविषयोऽर्थः श्रुतम् । स विषयोऽनिन्द्रियस्य; परिप्राप्तश्रुतज्ञानावरणक्षयो-
पशमस्यात्मनः १श्रुतार्थेऽनिन्द्रियालम्बनज्ञानप्रवृत्तेः । अथवा श्रुतज्ञानं श्रुतम्, तदनिन्द्रियस्यार्थः
प्रयोजनमिति यावत् । स्वातन्त्र्यसाध्यमिदं प्रयोजनमनिन्द्रियस्य ।
§ ३०३. उक्तानामिन्द्रियाणां प्रतिनियतविषयाणां स्वामित्वनिर्देशे कर्तव्ये यत्प्रथमं गृहीतं
स्पर्शनं तस्य तावत्स्वामित्वावधारणार्थमाह--
वनस्पत्यन्तानामेकम् ॥२२॥
§ ३०४. एकं प्रथममित्यर्थः । किं तत् । स्पर्शनम् । तत्केषाम् । पृथिव्यादीनां वनस्पत्यन्तानां
वेदितव्यम् । तस्योत्पत्तिकारणमुच्यते--वीर्यान्तरायस्पर्शनैन्द्रियावरणक्षयोपशमे सति शेषेन्द्रिय-
स्पर्शादिकका क्रम इन्द्रियोंके क्रमसे ही व्याख्यात है । अर्थात् इन्द्रियोंके क्रमको ध्यानमें रखकर
इनका कथन किया है ।
§ ३०१. आगे कहते हैं कि मन अनवस्थित है इसलिए वह इन्द्रिय नहीं । इस प्रकार जो
मनके इन्द्रियपनेका निषेध किया है, सो यह मन उपयोगका उपकारी है या नहीं ? मन भी उप-
कारी है, क्योंकि मनके बिना स्पर्शादि विषयोंमें इन्द्रियाँ अपने-अपने प्रयोजनकी सिद्धि करनेमें
समर्थ नहीं होतीं । तो क्या इन्द्रियोंकी सहायता करना ही मनका प्रयोजन है या और भी इसका
प्रयोजन है ? इसी बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
श्रुत मनका विषय है ॥२१॥
§ ३०२. श्रुतज्ञानका विषयभूत अर्थ श्रुत है वह अनिन्द्रिय अर्थात् मनका विषय है, क्योंकि
श्रुतज्ञानावरणके क्षयोपशमको प्राप्त हुए जीवके श्रुतज्ञानके विषयमें मनके आलम्बनसे ज्ञान होता
है । अथवा श्रुत शब्दका अर्थ श्रुतज्ञान है। और वह मनका अर्थ अर्थात् प्रयोजन है। यह प्रयो-
जन मनके स्वतः आधीन है इसमें उसे दूसरेके साहाय्यकी आवश्यकता नहीं लेनी पड़ती ।
विशेषार्थ-यहाँ श्रुत शब्दका अर्थ श्रुतज्ञानका विषय या श्रुतज्ञान किया है और उसे
अनिन्द्रियका विषय बतलाया है । आशय यह है कि श्रुतज्ञानकी उपयोग दशा पाँच इन्द्रियोंके
निमित्तसे न होकर केवल अनिन्द्रियके निमित्तसे होती है। इसका यह अभिप्राय नहीं कि अनि-
न्द्रियके निमित्तसे केवल श्रुतज्ञान ही होता है, किन्तु इसका यह अभिप्राय है कि जिस प्रकार
मतिज्ञान इन्द्रिय और अनिन्द्रिय दोनोंके निमित्तसे होता है उस प्रकार श्रुतज्ञान इन दोनोंके
निमित्तसे न होकर केवल अनिन्द्रियके निमित्तसे होता है।
§ ३०३. किस इन्द्रियका क्या विषय है यह बतला आये । अब उनके स्वामियोंका कथन
करना है अतः सर्व प्रथम जो स्पर्शन इन्द्रिय कही है उसके स्वामीका निश्चय करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं-
वनस्पतिकायिक तकके जीवोंके एक अर्थात् प्रथम इन्द्रिय होती है ॥ २२ ॥
३०४. सूत्रमें आये हुए 'एक' शब्दका अर्थ प्रथम है। शंका-यह कौन है ? समाधान-
स्पर्शन । शंका-वह किन जीवोंके होतो है ? समाधान-पृथिवीकायिक जीवोंसे लेकर वनस्पति-
कायिक तकके जीवोंके जानना चाहिए । अब उसकी उत्पत्तिके कारणका कथन करते हैं-वीर्या-
१. श्रुतस्यार्थे मु०, ता०, ना० ।
– २४४ § ३०८ ] द्वितीयोऽध्यायः १२९
सर्वघातिस्पर्धकोदये च शरीरनामलाभावष्टम्भे एकेन्द्रियजातिनामोदयवशवर्तितायां च सत्यां
स्पर्शनमेकमिन्द्रियमाविर्भवति ।
§ ३०५. इतरेषामिन्द्रियाणां स्वामित्वप्रदर्शनार्थमाह—
कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि ॥ २३ ॥
§ ३०६. ‘एकैकम्’ इति वीप्सायां द्वित्वम् । एकैकेन वृद्धानि एकैकवृद्धानि । कृमिमादिं¹
कृत्वा, स्पर्शनाधिकारात् स्पर्शनमादिं कृत्वा एकैकवृद्धानीत्यभिसंबन्धः क्रियते । ‘आदि’शब्दः
प्रत्येकं परिसमाप्यते । कृम्यादीनां स्पर्शनं रसनाधिकम्, पिपीलिकादीनां स्पर्शनरसने घ्राणाधिके,
भ्रमरादीनां स्पर्शनरसनघ्राणानि चक्षुरधिकानि, मनुष्यादीनां तान्येव श्रोत्राधिकानीति यथा-
संख्येनाभिसंबन्धो व्याख्यातः । तेषां निष्पत्तिः स्पर्शनोत्पत्त्या व्याख्याता उत्तरोत्तरसर्वघाति-
स्पर्धकोदयेन ।
§ ३०७. एवमेतेषु संसारिषु द्विभेदेषु इन्द्रियभेदात्पञ्चविधेषु ये पञ्चेन्द्रियास्तद्भेदस्या-
नुक्तस्य प्रतिपादनार्थमाह—
संज्ञिनः समनस्काः ॥२४॥
§ ३०८. मनो व्याख्यातम् । सह तेन ये वर्तन्ते ते समनस्काः । संज्ञिन² इत्युच्यन्ते । पारि-
शेष्यादितरे संसारिणः प्राणिनोऽसंज्ञिन इति सिद्धम् । ननु च संज्ञिन इत्यनेनैव गतार्थत्वात्समनस्का
न्तराय तथा स्पर्शन इन्द्रियावरण कर्मके क्षयोपशमके होनेपर और शेष इन्द्रियोंके सर्वघाती
स्पर्धकोंके उदयके होनेपर तथा शरीर नामकर्मके आलम्बनके होनेपर और एकेन्द्रिय जाति नाम-
कर्मके उदयकी आधीनताके रहते हुए एक स्पर्शन इन्द्रिय प्रकट होती है
§ ३०५. अब इतर इन्द्रियोंके स्वामित्वका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
कृमि, पिपीलिका, भ्रमर और मनुष्य आदिके क्रमसे एक-एक इन्द्रिय अधिक होती है ॥२३॥
§ ३०६. ‘एकैकम्’ यह वीप्सामें द्वित्व है । इन्द्रियाँ एक-एकके क्रमसे बढ़ी हैं इसलिए वे
‘एकैकवृद्ध’ कही गयी हैं । ये इन्द्रियाँ कृमिसे लेकर बढ़ी हैं । यहाँ स्पर्शन इन्द्रिय का अधिकार
स्पर्शन इन्द्रियसे लेकर एक-एकके होनेसे क्रमसे बढ़ी हैं इस प्रकार यहाँ सम्बन्ध कर लेना चाहिए ।
आदि शब्दका प्रत्येकके साथ सम्बन्ध होता है । जिससे यह अर्थ हुआ कि कृमि आदि जीवोंके
स्पर्शन और रसना ये दो इन्द्रियाँ होती हैं । पिपीलिका आदि जोवोंके स्पर्शन, रसना और घ्राण
ये तीन इन्द्रियाँ होतो हैं । भ्रमर आदि जीवोंके स्पर्शन, रसना, घ्राण और चक्षु ये चार
इन्द्रियाँ होती हैं । मनुष्यादिकके श्रोत्र इन्द्रियके और मिला देनेपर पांच इन्द्रियाँ होती हैं ।
इस प्रकार उक्त जीव और इन्द्रिय इनका यथाक्रमसे सम्बन्धका व्याख्यान किया । पहले स्पर्शन
इन्द्रियकी उत्पत्तिका व्याख्यान कर आये हैं उसी प्रकार शेष इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका व्याख्यान
करना चाहिए । किन्तु उत्पत्तिके कारणका व्याख्यान करते समय जिस इन्द्रियकी उत्पत्तिके
कारणका व्याख्यान किया जाय, वहाँ उससे अगली इन्द्रिय सम्बन्धी सर्वघाती स्पर्धकोंके उदयके
साथ वह व्याख्यान करना चाहिए ।
§ ३०७. इस प्रकार इन दो प्रकारके और इन्द्रिय-भेदोंकी अपेक्षा पाँच प्रकारके संसारी
जीवमें जो पंचेन्द्रिय जीव हैं उनके भेद नहीं कहे अतः उनका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
मनवाले जीव संज्ञी होते हैं ॥२४॥
§ ३०८. मनका व्याख्यान कर आये । उसके साथ जो रहते हैं वे समनस्क कहलाते हैं ।
१. –किस्यादिं आ० । –कृम्यादि दि० १, दि० २ । २. –ज्ञिनः उच्च्य-दि० १, दि० २, आ० ।
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