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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 558 में से

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पृष्ठ 222

§ २६२. य उक्तः क्षायोपशमिको भावोऽष्टादशविकल्पस्तद्भेदनिरूपणार्थमाह—
ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्त्रित्रिपञ्चभेदाः सम्यक्त्वचारित्रसंयमासंयमाश्च ॥५॥
§ २६३. चत्वारश्च त्रयश्च त्रयश्च पञ्च च चतुस्त्रित्रिपञ्च¹ । ते भेदाः यासां ताश्चतु-
स्त्रित्रिपञ्चभेदाः । यथाक्रममित्यनुवर्तते । तेनाभिसंबन्धाच्चतुरादिभिर्ज्ञानादीन्यभिसंबध्यन्ते ।
चत्वारि ज्ञानानि, त्रीण्यज्ञानानि, त्रीणि दर्शनानि, पञ्च लब्धय इति । सर्वघातिस्पर्द्धकानामुदय-
आकर माताकी सेवा करती हैं, गर्भशोधन करती हैं, रक्षा करती हैं। तीर्थंकरके गर्भमें आनेपर
देव-देवियां उत्सव मनाते हैं। जन्म, तप, केवल और निर्वाणके समय भी ऐसा ही करते हैं।
केवलज्ञान होनेके बाद समवसरणकी रचना करते हैं, कुसुमवृष्टि करते हैं आदि। इसलिए मुख्यतः
ये अभयदानादि देवादिकोंकी भक्ति और धर्मानुरागके कार्य हैं, शरीर नामकर्म और तीर्थंकर
नामकर्मकी अपेक्षा रखनेवाले क्षायिक दान आदिके नहीं। फिर भी इन अभयदानादिको उपचारसे
इनका कार्य कहा है। ऐसा नहीं माननेपर ये तीन दोष आते हैं—१. निर्वाण कल्याणकके समय
शरीर नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म नहीं रहता, इसलिए वह नहीं बन सकेगा। २. गर्भमें
आनेके पहले जो रत्नवर्षा आदि कार्य होते हैं उन्हें अकारण मानना पड़ेगा। ३. गर्भ, जन्म और
तप कल्याणकके समय न तो क्षायिक दान आदि ही पाये जाते हैं और न तीर्थंकर प्रकृतिका उदय
ही रहता है, इसलिए इन कारणोंके अभावमें इन्हें भी अकारण मानना पड़ेगा। इन सब दोषोंसे
बचनेका एक ही उपाय है कि पांच कल्याणकोंको और समवसरण आदि बाह्य विभूतिको देवादिक-
की भक्ति और धर्मानुरागका कार्य मान लिया जाय। जिस प्रकार जिन-प्रतिमाका अभिषेक आदि
महोत्सव भी इसीके कार्य हैं इसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए। इसपर यह प्रश्न होता है कि
उक्त कार्य भले ही देवादिककी भक्ति और धर्मानुराग वश होते हों पर जन्मकल्याणकके समय जो
घण्टानाद आदि कार्य विशेष होते हैं उनका कारण तो धर्मानुराग और भक्ति नहीं है। यदि उनका
कारण पुण्यातिशय माना जाता है तो शेष कार्योंका कारण पुण्यातिशय माननेमें क्या आपत्ति है ?
समाधान यह है कि जिस प्रकार एक अवसर्पिणी या उत्सर्पिणीमें चौबीस तीर्थंकर, बारह चक्रवर्ती,
नौ नारायण, नौ प्रतिनारायण और नौ बलभद्र आदिके होनेका नियम है। यह कर्म विशेषका कार्य
नहीं। उस-उस कालके साथ ऐसा ही निमित्तनैमित्तिक सम्बन्ध है कि इस कालमें इतने तीर्थंकर, इतने
चक्रवर्ती आदि ही होंगे न्यूनाधिक नहीं, इसी प्रकार तीर्थंकरके जन्मकालके साथ ऐसा ही निमित्त-
नैमित्तिक सम्बन्ध है कि इस समय अमुक स्थानके अमुक प्रकारके बाजे बजेंगे, इसलिए इसे कर्म
विशेषका कार्य मानना उचित नहीं। कर्मकी अपनी मर्यादाएँ हैं। उन तक ही वह सीमित है।
फिर भी मूलमें जिस स्थितिके रहते हुए ये कार्य होते हैं उस स्थितिको ध्यानमें रखकर उपचारसे
उस स्थितिको इनका कारण कहा है। और हमने कार्यकारणभावका सीधा विचार करके यह
लिखा है। शेष कथन सुगम है।
§ २६२. जो अठारह प्रकारका क्षायोपशमिक भाव कहा है उसके भेदोंका कथन करनेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
क्षायोपशमिक भावके अठारह भेद हैं—चार ज्ञान, तीन अज्ञान, तीन दर्शन, पांच दानादि
लब्धियाँ, सम्यक्त्व, चारित्र और संयमासंयम ॥५॥
§ २६३. जिनके चार, तीन, तीन और पांच भेद हैं वे चार, तीन, तीन और पांच भेदवाले
कहलाते हैं। इस सूत्रमें 'यथाक्रमम्' पदकी अनुवृत्ति होती है, जिससे चार आदि पदोंके साथ ज्ञान
आदि पदोंका क्रमसे सम्बन्ध होता है। यथा—चार ज्ञान, तीन अज्ञान, तीन दर्शन और पाँच
लब्धियाँ। वर्तमान कालमें सर्वघाती स्पर्द्धकोंका उदयाभावी क्षय होनेसे और आगामी कालकी
१. पञ्च भेदा यासां मु० ।