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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 558 में से

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पृष्ठ 224

११२ सर्वार्थसिद्धौ [ २।६ § २६४ -

§ २६४. य एकविंशतिविकल्प औदयिको भाव उद्दिष्टस्तस्य १भेदसंज्ञासंकीर्तनार्थमिद-
मुच्यते—
गतिकषायलिङ्गमिथ्यादर्शनाज्ञानासंयतासिद्धलेश्याश्चतुश्चतुस्त्र्येकैकैकषड्भेदाः ॥६॥
§ २६५. यथाक्रममित्यनुवर्तते, तेनाभिसंबन्धाद् गतिश्चतुर्भेदा, नरकगतिस्तिर्यग्गतिर्मनुष्य-
गतिर्देवगतिरिति । तत्र नरकगतिनामकर्मोदयान्नारको भावो भवतीति नरकगतिरौदयिकी ।
एवमितरत्रापि । कषायश्चतुर्भेदः, क्रोधो मानो माया लोभ इति । तत्र क्रोधनिर्वर्तनस्य कर्मण
उदयात्क्रोधः औदयिकः । एवमितरत्रापि । लिङ्गं त्रिवेदं, स्त्रीवेदः पुंवेदो नपुंसकवेद इति । स्त्री-
वेदकर्मण उदयात्स्त्रीवेद औदयिकः । एवमितरत्रापि । मिथ्यादर्शनमेकभेदम् । मिथ्यादर्शनकर्मण
उदयात्तत्त्वार्थाश्रद्धानपरिणामो मिथ्यादर्शनमौदयिकम् । ज्ञानावरणकर्मण उदयात्पदार्थानवबोधो
भवति तदज्ञानमौदयिकम् । चारित्रमोहस्य सर्वघातिस्पर्द्धकस्योदयादसंयतं औदयिकः । कर्मोदय-
सामान्यापेक्षोऽसिद्ध औदयिकः । लेश्या द्विविधा, द्रव्यलेश्या भावलेश्या चेति । जीवभावाधिकाराद्
द्रव्यलेश्या नाधिकृता । भावलेश्या कषायोदयरञ्जिता योगप्रवृत्तिरिति कृत्वा औदयिकोत्युच्यते । सा
षड्विधा-कृष्णलेश्या नीललेश्या कापोतलेश्या तेजोलेश्या पद्मलेश्या शुक्ललेश्या चेति ।
हो उदयाभावी क्षय कहते हैं। यहां उदयका अभाव ही क्षय रूपसे विवक्षित है। और आगामी कालमें
उदयमें आने योग्य इन्हीं सर्वघाति स्पर्धकों व प्रकृतियोंका सदवस्था रूप उपशम रहता है। इसका
आशय यह है कि वे सत्तामें रहते हैं। उनकी उदीरणा नहीं होती। मात्र स्तिवुक संक्रमणके द्वारा
इनका उदय कालसे एक समय पहले सजातीय देशघाति प्रकृति या स्पर्धकरूपसे संक्रमण होता
रहता है। सर्वघाति अंशका उदय और उदीरणा न होनेसे जीवका निजभाव प्रकाशमें आता है
और देशघाति अंशका उदय रहनेसे उसमें सदोषता आती है यह इस भावका तात्पर्य है।
§ २६४. अब जो इक्कीस प्रकारका औदयिक भाव कहा है उसके भेदोंका कथन करनेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—

  • औदयिक भावके इक्कीस भेद हैं-चार गति, चार कषाय, तीन लिंग, एक मिथ्यादर्शन,
    एक अज्ञान, एक असंयम, एक असिद्ध भाव और छह लेश्याएँ ॥६॥
    § २६५. इस सूत्रमें 'यथाक्रमम्' पदकी अनुवृत्ति होती है, क्योंकि यहां उसका सम्बन्ध
    है। गति चार प्रकारकी है—नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति । इनमें-से नरकगति
    नामकर्मके उदयसे नारकभाव होता है इसलिए नरकगति औदयिक है। इसी प्रकार शेष तीन
    गतियोंका भी अर्थ करना चाहिए। कषाय चार प्रकारका है-क्रोध, मान, माया और लोभ ।
    इनमें-से क्रोधको पैदा करनेवाले कर्मके उदयसे क्रोध औदयिक होता है। इसी प्रकार शेष तीन
    कषायोंको औदयिक जानना चाहिए। लिंग तीन प्रकारका है स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद ।
    स्त्रीवेद कर्मके उदयसे स्त्रीवेद औदयिक होता है। इसो प्रकार शेष दो वेद औदयिक हैं। मिथ्या-
    दर्शन एक प्रकारका है। मिथ्यादर्शन कर्मके उदयसे जो तत्त्वोंका अश्रद्धानरूप परिणाम होता है वह
    मिथ्यादर्शन है इसलिए वह औदयिक है। पदार्थोंके नहीं जाननेको अज्ञान कहते हैं। चूंकि वह
    ज्ञानावरण कर्मके उदयसे होता है इसलिए औदयिक है। असंयतभाव चारित्रमोहनीय कर्मके सर्व-
    घातीस्पर्द्धकोंके उदयसे होता है इसलिए औदयिक है। असिद्धभाव कर्मोदय सामान्यकी अपेक्षा
    होता है इसलिए औदयिक है। लेश्या दो प्रकारकी है-द्रव्यलेश्या और भावलेश्या । यहाँ जीवके
    भावोंका अधिकार होनेसे द्रव्यलेश्या नहीं ली गयी है। चूंकि भावलेश्या कषायके उदयसे अनुरंजित
    योगकी प्रवृत्तिरूप है इसलिए वह औदयिक कही जाती है। वह छह प्रकारकी है-कृष्णलेश्या,
    नीललेश्या, कापोतलेश्या, पीतलेश्या, पद्मलेश्या और शुक्ललेश्या ।
    १. संज्ञाकीर्त-आ०, दि० १, दि० २।