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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 558 में से

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पृष्ठ 227
  • २।९ ६ २७३ ] द्वितीयोऽध्यायः १९५
    "बंधं पडि एयत्तं लक्खणदो हवइ तस्स णाणत्तं ।
    तम्हा अमुत्तिभावो णेयंतो होइ जीवस्स ॥" इति ।
    § २७०. यद्येवं तदेव लक्षणमुच्यतां येन नानात्वमवसीयते इत्यत आह—
    उपयोगो लक्षणम् ॥ ८ ॥
    § २७१. उभयनिमित्तवशादुत्पद्यमानश्चैतन्यानुविधायी परिणाम उपयोगः । तेन बन्धं ५
    प्रत्येकत्वे सत्यप्यात्मा लक्ष्यते सुवर्णरजतयोर्बन्धं प्रत्येकत्वे सत्यपि वर्णादिभेदवत् ।
    § २७२. तद्भेदप्रदर्शनार्थमाह—
    स द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥ ६ ॥
    § २७३. स उपयोगो द्विविधः — ज्ञानोपयोगो दर्शनोपयोगश्चेति । ज्ञानोपयोगोऽष्टभेदः-
    मतिज्ञानं श्रुतज्ञानमवधिज्ञानं मनःपर्ययज्ञानं केवलज्ञानं मत्यज्ञानं श्रुताज्ञानं विभङ्गज्ञानं चेति । १०
    दर्शनोपयोगश्चतुर्विधः - चक्षुर्दर्शनमचक्षुर्दर्शनमवधिदर्शनं केवलदर्शनं चेति । तयोः कथं भेदः ।
    साकारानाकारभेदात् । साकारं ज्ञानमनाकारं दर्शनमिति । तच्छद्मस्थेषु क्रमेण वर्तते । निरा-
    पारिणामिक भाव पाये जाते हैं पर वे जीवके असाधारण धर्म न होनेसे उनकी यहाँ परिगणना
    नहीं की गयी है।
    इन भावोंके सम्बन्धमें मुख्य प्रश्न यह है कि जब कि जीव अमूर्त है ऐसी दशामें उसका १५
    कर्मके साथ बन्ध नहीं हो सकता और कर्मबन्धके अभावमें औपशमिक आदि भावोंकी उत्पत्ति नहीं
    बन सकती, क्योंकि पारिणामिक भावोंके सिवा शेष सब भाव कर्मनिमित्तक माने गये हैं ? उत्तर यह
    कि कर्मका आत्मासे अनादि सम्बन्ध है, इसलिए कोई दोष नहीं आता । आशय यह है कि संसार
    अवस्थामें जीवका कर्मके साथ अनादिकालीन बन्ध होनेके कारण वह व्यवहारसे मूर्त हो रहा
    है । और यह बात असिद्ध भी नहीं है, क्योंकि मदिरा आदिका सेवन करनेपर ज्ञानमें मूर्च्छा २०
    देखी जाती है । पर इतने मात्रसे आत्माको मूर्तस्वभाव नहीं माना जा सकता, क्योंकि रूप, रस,
    गन्ध और स्पर्श ये पुद्गलके धर्म हैं । आत्मा मूर्तरूप इन धर्मोंसे भिन्न स्वभाववाला है ।
    § २७०. यदि ऐसा है तो वही लक्षण कहिए जिससे कर्मसे आत्माका भेद जाना जाता है,
    इसी बातको ध्यानमें रखकर आगेका सूत्र कहते हैं—
    उपयोग जीवका लक्षण है ॥ ८ ॥ २५
    § २७१. जो अन्तरंग और बहिरंग दोनों प्रकारके निमित्तोंसे होता है और चैतन्यका
    अन्वयी है अर्थात् चैतन्यको छोड़कर अन्यत्र नहीं रहता वह परिणाम उपयोग कहलाता है। यद्यपि
    आत्मा बन्धकी अपेक्षा एक है तो भी इससे वह स्वतन्त्र जाना जाता है । जिस प्रकार स्वर्ण और
    चांदी बन्धकी अपेक्षा एक हैं तो भी वर्णादिके भेदसे उनमें पार्थक्य रहता है उसी प्रकार प्रकृतमें
    समझना चाहिए । ३०
    § २७२. अब उपयोगके भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    वह उपयोग दो प्रकारका है- ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग । ज्ञानोपयोग आठ प्रकारका
    है और दर्शनोपयोग चार प्रकारका है ॥ ९ ॥
    § २७३. वह उपयोग दो प्रकारका है, ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग । ज्ञानोपयोग आठ
    प्रकारका है— मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान, केवलज्ञान, मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान, और ३५
    विभंगज्ञान । दर्शनोपयोग चार प्रकारका है— चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन ।
    शंका—इन दोनों उपयोगोंमें किस कारणसे भेद है ? समाधान—साकार और अनाकारके
    भेदसे इन दोनों उपयोगोंमें भेद है । साकार ज्ञानोपयोग है और अनाकार दर्शनोपयोग । ये दोनों.