सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- २।७ § २६८ ] द्वितीयोऽध्यायः ११३
§ २६६. ननु च उपशान्तकषाये क्षीणकषाये सयोगकेवलिनि च शुक्ललेश्याऽस्तीत्यागमः ।
तत्र कषायानुरञ्जनाभावादौदयिकत्वं नोपपद्यते । नैष दोषः; पूर्वभावप्रज्ञापननयोपेक्षया यासौ
योगप्रवृत्तिः कषायानुरञ्जिता सैवेत्युपचारादौदयिकीत्युच्यते । तदभावादयोगकेवल्यलेश्य इति
निश्चीयते ।
§ २६७. यः पारिणामिको भावस्त्रिभेद उक्तस्तद्भेदस्वरूपप्रतिपादनार्थमाह—
जीवभव्याभव्यत्वानि च ॥७॥
· § २६८. जीवत्वं भव्यत्वमभव्यत्वमिति त्रयो भावाः पारिणामिका अन्यद्रव्यासधारणा
आत्मनो वेदितव्याः । कुतः पुनरेषां पारिणामिकत्वम् । कर्मोदयोपशमक्षयक्षयोपशमानपेक्षित्वान् ।
जीवत्वं चैतन्यमिहार्थः । सम्यग्दर्शनादिभावेन भविष्यतीति भव्यः । तद्विपरीतोऽभव्यः । त एते
त्रयो भावा जीवस्य पारिणामिकाः ।
§ २६६. शंका—उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगकेवली गुणस्थानमें शुक्ललेश्या
है ऐसा आगम है परन्तु वहाँपर कषायका उदय नहीं है इसलिए औदयिकपना नहीं बन सकता ?
समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जो योगप्रवृत्तिके उदयसे अनुरंजित है वही यह है इस
प्रकार पूर्वभावप्रज्ञापन नयकी अपेक्षा उपशान्तकषाय आदि गुणस्थानोंमें भी लेश्याको औदयिक कहा
गया है। किन्तु अयोगकेवलीके योगप्रवृत्ति नहीं होतो इसलिए वे लेश्यारहित हैं ऐसा निश्चय
होता है।
विशेषार्थ—कर्मोंकी जातियां और उनके अवान्तर भेद अनेक हैं, इसलिए उनके उदयसे
होनेवाले भाव भी अनेक हैं, पर यहाँ मुख्य-मुख्य औदयिक भाव ही गिनाये गये हैं। ऐसे भाव
इक्कीस होते हैं। प्रथम चार भेद चार गति हैं। ये गंति-नामकर्मके उदयसे होते हैं। नामकर्म
अघातिकर्म है। गति-नामकर्म उसीका एक भेद है। जो प्रकृतमें अन्य जीवविपाकी अघाति कर्मोंका
उपलक्षण है। पुद्गलविपाकी कर्मोंके जीवभाव नहीं होते, इसलिए उनको यहाँ परिगणना नहीं
की गयी है। घाति कर्मोंमें क्रोधादि चारों कषायोंके उदयसे क्रोधादि चार भाव होते हैं। तीन
वेदोंके उदयसे तीन लिंग होते हैं। तीन वेद उपलक्षण हैं। इनसे हास्य आदि छह भावोंका भी
ग्रहण होता है। दर्शनमोहनीयके उदयसे मिथ्यादर्शन होता है। दर्शनावरणके उदयसे होनेवाले
अदर्शनभावोंका इसीमें ग्रहण होता है। ज्ञानावरणके उदयसे अज्ञानभाव होता है, असंयत भाव
चारित्रमोहनीयके उदयका कार्य है और असिद्ध भाव सब कर्मोंके उदयका कार्य है। रहीं लेश्याएँ
सो ये कषाय और योग इनके मिलनेसे उत्पन्न हुई परिणति विशेष हैं। फिर भी इनमें कर्मोदयकी
मुख्यता होनेसे इनकी औदयिक भावोंमें परिगणना की गयी है। इन भावोंमें कर्मोंका उदय निमित्त
है, इसलिए इन्हें औदयिक कहते हैं ।
§ २६७. अब जो तीन प्रकारका पारिणामिक भाव कहा है उसके भेदोंके स्वरूपका कथन
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पारिणामिक भावके तीन भेद हैं—जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व ॥७॥
§ २६८. जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व ये तीन पारिणामिक भाव अन्य द्रव्योंमें नहीं होते
इसलिए ये आत्माके जानने चाहिए। शंका—ये पारिणामिक क्यों हैं ? समाधान—ये तीनों भाव
कर्मके उदय, उपशम, क्षय और क्षयोपशमके बिना होते हैं, इसलिए पारिणामिक हैं। जीवत्वका
अर्थ चैतन्य है। जिसके सम्यग्दर्शन आदि भाव प्रकट होनेकी योग्यता है वह भव्य कहलाता है।
अभव्य इसका उलटा है। ये तीनों जीवके पारिणामिक भाव हैं।
१. -पनापेक्ष-आ०, दि० १, दि० २ ।
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