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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 558 में से

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पृष्ठ 223
  • २१५ § २६३ ] द्वितीयोऽध्यायः १११

क्षयात्तेषामेव सदुपशमाद्देशघातिस्पर्द्धकानामुदये क्षायोपशमिको भावो भवति । तत्र ज्ञानादीनां
वृत्तिः स्वावरणान्तरायक्षयोपशमाद् व्याख्यातव्या । 'सम्यक्त्व'ग्रहणेन वेदकसम्यक्त्वं गृह्यते ।
अनन्तानुबन्धिकषायचतुष्टयस्य मिथ्यात्वसम्यङ्मिथ्यात्वयोश्चोदयक्षयात्सदुपशमाच्च सम्यक्त्वस्य
देशघातिस्पर्द्धकस्योदये तत्त्वार्थश्रद्धानं क्षायोपशमिकं सम्यक्त्वम् । अनन्तानुबन्धप्रत्याख्यानप्रत्या-
ख्यानद्वादशकषायोदयक्षयात्सदुपशमाच्च संज्वलनकषायचतुष्टयान्यतमदेशघातिस्पर्द्धकोदये नोकषाय- ५
नवकस्य यथासंभवोदये च निवृत्तिपरिणाम आत्मनः क्षायोपशमिकं चारित्रम् । अनन्तानुबन्धप्रत्या-
ख्यानकषायाष्टकोदयक्षयात्सदुपशमाच्च प्रत्याख्यानकषायोदये संज्वलनकषायस्य देशघातिस्पर्द्धकोदये
नोकषायनवकस्य यथासंभवोदये च विरताविरतपरिणामः क्षायोपशमिकः संयमासंयम इत्याख्यायते ।
अपेक्षा उन्हींका सदवस्था रूप उपशम होनेसे देशघाती स्पर्द्धकोंका उदय रहते हुए क्षायोपशमिक
भाव होता है । इन उपर्युक्त भावोंमें-से ज्ञान आदि भाव अपने-अपने आवरण और अन्तराय कर्मके १०
क्षयोपशमसे होते हैं ऐसा व्याख्यान यहां कर लेना चाहिए । सूत्रमें आये हुए सम्यक्त्वपदसे वेदक
सम्यक्त्व लेना चाहिए । तात्पर्य यह है कि चार अनन्तानुबन्धी कषाय, मिथ्यात्व और सम्यग्मि-
थ्यात्व इन छह प्रकृतियोंके उदयाभावी क्षय और सदवस्थारूप उपशमसे देशघाती स्पर्धकवाली
सम्यक्त्व प्रकृतिके उदयमें जो तत्त्वार्थश्रद्धान होता है वह क्षायोपशमिक सम्यक्त्व है । अनन्ता-
नुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण इन बारह कषायोंके उदयाभावी क्षय होनेसे १५
और इन्हींके सदवस्थारूप उपशम होनेसे तथा चार संज्वलनोंमें-से किसी एक देशघाती प्रकृतिके
उदय होनेपर और नौ नोकषायोंका यथासम्भव उदय होनेपर जो त्यागरूप परिणाम होता है वह
क्षायोपशमिक चारित्र है । अनन्तानुबन्धी और अप्रत्याख्यानावरण इन आठ कषायोंके उदयाभावी
क्षय होनेसे और सदवस्थारूप उपशम होनेसे तथा प्रत्याख्यानावरण कषायके और संज्वलन
कषायके देशघाती स्पर्द्धकोंके उदय होनेपर तथा नौ नोकषायोंका यथासम्भव उदय होनेपर जो २०
विरताविरतरूप परिणाम होता है वह संयमासंयम कहलाता है ।
**विशेषार्थ—**वर्तमान समयमें सर्वघाति स्पर्धकोंका उदयाभावी क्षय, आगामी कालकी अपेक्षा
उन्हींका सदवस्था रूप उपशम और देशघाति स्पर्धकोंका उदय यह क्षयोपशमका लक्षण है । यह
तो सुनिश्चित है कि अधिकतर देशघाति कर्म ऐसे होते हैं जिनमें देशघाति और सर्वघाति दोनों
प्रकारके स्पर्धक पाये जाते हैं । केवल नौ नोकषाय और सम्यक् प्रकृति ये दस प्रकृतियां इसके २५
अपवाद हैं । इनमें मात्र देशघाति स्पर्धक पाये जाते हैं, अतः नौ नोकषायोंके सिवा शेष सब
देशघाति कर्मोंका क्षयोपशम सम्भव है, क्योंकि पूर्वोक्त लक्षणके अनुसार क्षयोपशममें दोनों प्रकारके
कर्म लगते हैं । उसमें भी संयमासंयम भावकी प्राप्तिमें प्रत्याख्यानावरण कर्म अपेक्षा भेदसे देशघाति
मान लिया जाता है और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व व सम्यग्मिथ्यात्वसे मिलकर क्षायोपशमिक
भावको जन्म देती है, इसलिए क्षायोपशमिक भावके कुल अठारह भेद ही घटित होते हैं । ३०
उदाहरणार्थ-ज्ञानावरणकी देशघाति प्रकृतियाँ चार हैं, अतः इनके क्षंयोपशमसे चार ज्ञान प्रकट
होते हैं, पर मिथ्यादृष्टिके तीन अज्ञान और सम्यग्दृष्टिके चार ज्ञान इस प्रकार क्षायोपशमिक ज्ञानके
कुल भेद सात होते हैं । इसीसे अठारह क्षायोपशमिक भावोंमें इन सात ज्ञानोंकी परिगणना की
जाती है । प्रकृतमें दर्शन तीन और लब्धि पाँच क्षायोपशमिक भाव हैं यह स्पष्ट ही है । शेष रहे
तीन भाव सो ये वेदक सम्यक्त्व, संयमासंयम और संयम लिये गये हैं । इन सब भावोंमें देशघाति ३५
स्पर्धकोंका उदय होता है इसलिए इन्हें वेदक भाव भी कहते हैं । जितने भी क्षायोपशमिक भाव
होते हैं वे देशघाति स्पर्धकोंके उदयसे वेदक भी होते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इसमें सर्व-
घाति स्पर्धकों या सर्वघाति प्रकृतियोंका वर्तमान समयमें अनुदय रहता है, इसलिए इनका उदय
कालके एक समय पहले उदयरूप स्पर्धकों या प्रकृतिमं स्तिवुक संक्रमण हो जाता है । प्रकृतमें इसे