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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 558 में से

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पृष्ठ 226

§ २६९. ननु चास्तित्वनित्यत्वप्रदेशवत्त्वादयोऽपि भावाः पारिणामिकाः सन्ति, तेषामिह
ग्रहणं कर्तव्यम् । न कर्तव्यम्; कृतमेव । कथम् । 'च'२शब्देन समुच्चितत्वात् । यद्येवं त्रय इति
संख्या विरुध्यते । न विरुध्यते, असाधारणा जीवस्य भावाः पारिणामिकास्त्रय एव । अस्तित्वादयः
पुनर्जीवाजीवविषयत्वात्साधारणा इति 'च'शब्देन पृथग्गृह्यन्ते । आह, औपशमिकादिभावानुप-
पत्तिरमूर्तत्वादात्मनः । कर्मबन्धापेक्षा हि ३ते भावाः । न चामूर्तेः कर्मणां बन्धो युज्यत इति । तन्न;
अनेकान्तात् । नायमेकान्तः अमूर्तिरेवात्मेति । कर्मबन्धपर्यायापेक्षया तदावेशात्स्यान्मूर्तः । शुद्ध-
स्वरूपापेक्षया स्यादमूर्तः । यद्येवं कर्मबन्धावेशादस्यैकत्वे सत्यविवेकः प्राप्नोति । नैष दोषः; बन्धं
४प्रत्येकत्वे सत्यपि लक्षणभेदादस्य नानात्वमवसीयते । उक्तं च—
§ २६९. शंका—अस्तित्व, नित्यत्व और प्रदेशवत्त्व आदिक भी पारिणामिक भाव हैं उनका
इस सूत्रमें ग्रहण करना चाहिए ? समाधान—अलगसे उनके ग्रहण करनेका कोई काम नहीं; क्योंकि
उनका ग्रहण किया ही है । शंका—कैसे ? समाधान—क्योंकि सूत्रमें आये हुए 'च'शब्दसे इनका
समुच्चय हो जाता है । शंका—यदि ऐसा है तो 'तीन' संख्या विरोधको प्राप्त होती है, क्योंकि इस
प्रकार तीनसे अधिक पारिणामिक भाव हो जाते हैं ? समाधान—तब भी 'तीन' यह संख्या विरोध-
को नहीं प्राप्त होती, क्योंकि जीवके असाधारण पारिणामिक भाव तीन ही हैं । अस्तित्वादिक तो
जीव और अजीव दोनोंके साधारण हैं इसलिए उनका 'च'शब्दके द्वारा अलगसे ग्रहण किया है ।
शंका—औपशामिक आदि भाव नहीं बन सकते; क्योंकि आत्मा अमूर्त है। ये औपशमिक आदि भाव
कर्मबन्धको अपेक्षा होते हैं परन्तु अमूर्त आत्माके कर्मोंका बन्ध नहीं बनता है ? समाधान—आत्माके
अमूर्तत्वके विषयमें अनेकान्त है । यह कोई एकान्त नहीं कि आत्मा अमूर्ति ही है । कर्मबन्धरूप
पर्यायकी अपेक्षा उससे युक्त होनेके कारण कथंचित् मूर्त है और शुद्ध स्वरूपकी अपेक्षा कथंचित्
अमूर्त है। शंका—यदि ऐसा है तो कर्मबन्धके आवेशसे आत्माका ऐक्य हो जानेपर आत्माका
उससे भेद नहीं रहता ? अमूर्ति । समाधान—यह कोई दोष नहीं, क्योंकि यद्यपि बन्धकी अपेक्षा
अभेद है तो भी लक्षणके भेदसे कर्मसे आत्माका भेद जाना जाता है। कहा भी है—
'आत्मा बन्धको अपेक्षा एक है तो भी लक्षणकी अपेक्षा वह भिन्न है। इसलिए जीवका
अमूर्तीकभाव अनेकान्तरूप है। वह एक अपेक्षासे है और एक अपेक्षासे नहीं है।
विशेषार्थ—पारिणामिक भाव तीन हैं—जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व । जीवत्वके दो
भेद हैं—एक जीवन-क्रियासापेक्ष और दूसरा चैतन्यगुणमापेक्ष । जीवनक्रिया प्राणसापेक्ष होती है,
इसलिए ऐसे जीवत्वकी मुख्यता नहीं है, यहाँ तो चैतन्यगुणसापेक्ष जीवत्वकी ही मुख्यता है। यह
सब जीवोंमें साधारणरूपसे पाया जाता है और कारणनिरपेक्ष होता है इसलिए इसे पारिणामिक
कहा है। यही बात भव्यत्व और अभव्यत्वके सम्बन्धमें भी जाननी चाहिए, क्योंकि ये दोनों भाव
भी कारणनिरपेक्ष होते हैं । साधारणतः जिनमें रत्नत्रय गुण प्रकट होनेकी योग्यता होती है वे भव्य
कहलाते हैं और जिनमें ऐसी योग्यता नहीं होती उन्हें अभव्य कहते हैं । जीवोंमें ये दोनों प्रकारकी
योग्यताएँ स्वभावसे होती हैं। इसीसे भव्यत्व और अभव्यत्व ये दोनों भाव भी पारिणामिक माने
गये हैं। अभिप्राय यह है कि किन्हीं जीवोंका स्वभावसे अनादि-अनन्त बन्ध होता है और किन्हींका
अनादिसान्त । जीवोंका इस तरहका बन्ध कारणनिरपेक्ष होता है । यह किसी कर्मविशेषका कार्य
नहीं है, किन्तु ऐसी योग्यता पारिणामिक मानी गयी है । इसीसे जीवत्वके साथ भव्यत्व और
अभव्यत्व ये दोनों भाव भी पारिणामिक कहे गये हैं। यद्यपि जीवमें अस्तित्व आदि और बहुत-से


१. प्रदेशात्वा-आ०, दि० १, दि० २, मु० । २. कथं चेच्चशब्देन मु० । कथं चेतनशब्देन आ०, । ३. ते ।
न चामूर्तः कर्मणा आ० दि० १, दि० २; ता०, ना० । ४. प्रत्येकत्वे ( ऽविवेके ) सत्य-मु० ।