संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
शब्द संग्रह ८१
जद्यपि नाथ उचित न होत अस, प्रभु सौँ करौँ ढिठाई ।
तुलसिदास सीदत¹ निसि दिन, देखत तुम्हारि निठुराई ॥५
(३)
माधव अब न द्रवहु² केहिँ लेखे ।
प्रनतपाल³ पन तोर, मोर पन जियउँ कमल पद देखे ॥१॥
जब लगि मैं न दीन दयाल तैं, मैं न दास तैं स्वामी ।
तब लगि जो दुख सहेउँ कहेउँ नहिँ, जद्यपि अन्तर्जामी ॥२
तैं उदार मैं कृपन पतित मैं, तैं पुनीत श्रुति गावै ।
बहुत नात रघुनाथ तोहिँ मोहिँ, अब न तजे बनि आवै ॥३
जनक जननि गुरु बन्धु सुहृद पति, सब प्रकार हितकारी ।
द्वैत रूप तम कूप परौँ नहिँ, अस कछु जतन बिचारी⁴॥४
सुनु अदभ्र करुना बारिज-लोचन, मोचन भय भारी ।
तुलसिदास प्रभु तब प्रकास बिनु, संसय टरत न टारी⁵॥५
(४)
तू दयाल दीन हैँ, तू दानि हैँ भिखारी ।
हैँ प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज हारी ॥ १ ॥
नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मो सौं ।
मो समान आरत नहिँ, आरत-हर तो सौँ ॥ २ ॥
(१) दुख पाता है। (२) पसीजते, दया करते। (३) जो एक बार भी प्रनाम
करै तिस का पालन करनेहारा । (४) पिता, माता, गुरू, भाई, मित्र, स्वामी, सब
प्रकार तुम्हीँ मेरे हितकारी हो सो ऐसा कुछ जतन करो कि द्वैत रूप अर्थात हौं
मैं के अंध-कूप मेंँ न गिर जाऊँ । (५) सुनो हे अधिक [अदभ्र] करुना-निधान
कमल-नैन, भयहरन प्रभु तुम्हारे प्रकाश बिना मेरा भ्रम अपने पुरुषार्थ से टाले
नहीं टलता ।
शब्द ४ का अर्थ—इस शब्द मे गुसाईँ जी ग्यारह नाते गिना कर अपने
इष्ट से विनय करते हैं कि जो नाता आप को भावै उसी एक को मान कर
मुझे चरन सरन मेंँ लीजिये ।
११
८२ गुसाईं तुलसीदासजी
ब्रह्म तू हौं जीव हौं, तू ठाकुर हौं चेरो ।
तात मात गुरु सखा तू, सब बिधि हित मेरो ॥ ३ ॥
तोहि मोहिं नातो अनेक, मानिये जो भावै ।
ज्यौँ त्यौँ तुलसी, कृपालु चरन सरन पावै ॥ ४ ॥
(५)
हरि जू मेरो मन हठ न तजै ।
निसि दिन नाथ देउँ सिख बहु बिधि, करत सुभाव निजै ॥१
ज्यौँ जुवती अनुभवत प्रसव¹ अति, दारुन दुख उपजै ।
ह्वै अनुकूल बिसारि सूल सठ, पुनि खल पतिहिँ भजै ॥२॥
लोलुप भ्रमत श्रमित निसि बासर, सिर पदत्रान बजै ।
तदपि अधम बिचरत तेहिँ मारग, कबहूँ न मूढ़ लजै ॥३॥²
हौं हार्यो करि जतन विविधि बिधि, अतिसय प्रबल अजै³ ।
तुलसिदास बस होत तबै, जन प्रेरक प्रभु बरजै ॥ ४ ॥
(६)
दीन को दयालु दानि दूसरो न कोई ।
जाहि दीनता कहौँ हौं दीन देखौँ सोई⁴ ॥ १ ॥
मुनि सुर नर नाग असुर साहिब तै घनेरे ।
पै तै। लौं जौ लौं रावरे न नेकु नैन फेरे⁵ ॥ २ ॥
त्रिभुवन तिहुँ काल बिदित बदत⁶ बेद चारी ।
आदि अंत मध्य राम साहिबी तिहारी ॥ ३ ॥
(१) जनने का दुख सहती है। (२) जैसे लालची रात दिन रुपया कमाने के फेर
में थक जाता है और जूतियाँ खाता है फिर भी वही चाल चलता है और लाज
नहीं लाता । (३) अजीत । (४) ईश्वर को छोड़ दूसरा दीनता छुड़ाने का समर्थ
नहीं है, जिस किसी से अपनी दीनता का दुख रोता हूँ उसी को आप दीन
दुखी अर्थात असमर्थ पाता हूँ । (५) सुर नर मुनि आदि की जभी तक प्रभुता
है जब तक तेरो भौं उनकी ओर टेढ़ी नहीं होती । (६) कहता है ।
तोहि माँगे माँगने न माँगना कहायो१ ।
सुनि सुभाव सील सुजस जाचक जन आयो ॥ ४ ॥
पाहन पसु विटप विहँग अपने करि लीन्हे ।
महाराज दसरथ के रंक राव कीन्हे ॥ ५ ॥२
तू गरीब को निवाज हौं गरीब तेरो ।
वारक३ कहिये कृपालु तुलसिदास मेरो ॥ ६ ॥
(७)
मैं हरि पतित-पावन सुने ।
मैं पतित तुम पतित-पावन, दोऊ बानिक४ बने ॥ १ ॥
ब्याध गनिका गज अजामिल, साखि निगमन भने ।
और अधम अनेक तारे, जात का पै गने ॥ २ ॥
जानि नाम अजानि लीन्हें, नरक जमपुर भने ।
दास तुलसी सरन आयो, राखिये आपने ॥ ३ ॥
(८)
तुम सम दीन बन्धु, न दीन कोउ मो सम,
सुनहु नृपति रघुराई ।
मो सम कुटिल मैलिमनि५ नहिं जग,
तुम सम हरि न हरन कुटिलाई ॥ १ ॥
हौं मन बचन कर्म पातक-रत,
तुम कृपालु पतितन गति दाई ।
हौं अनाथ प्रभु तुम अनाथ-हित,
चित यह सुरति कबहुँ नहिं जाई ॥ २ ॥
(१) जिस ने आप से माँगा वह फिर मंगता न रहा अर्थात परिपूर्ण हो गया ।
(२) दशरथ के पुत्र श्रीरामचंद्र ने जिस जिस को अपनाया वह दरिद्री से राजा
होगया यहाँ तक कि पत्थर जैसे अहिल्या, जानेवर [बंदर भालू], पेड़
[ यमलार्जुन ], चिड़िया [ जटायु ] की योनियों तक से दीन दुखियों का उद्धार
कर दिया । (३) एक बेर । (४) सुभाव, वज़ा । (५) दुष्टों का शिरोमनि, कुटीचर ।
८४ गुसाईँ तुलसीदासजी
हौँ आरत¹ आरत-नासन तुम्ह,
कीरति निगम पुरानन गाई ।
हौँ सभीत² तुम हरन सकल भय,
कारन कवन कृपा बिसराई ॥ ३ ॥
तुम सुखधाम राम श्रमभंजन³,
हौँ अति दुखित त्रिबिध श्रम⁴ पाई ।
यह जिय जानि दास तुलसी कहँ,
राखहु सरन समुझि प्रभुताई ॥ ४ ॥
(६)
जो पै दूसरो कोउ होइ ।
तो हौँ बारहिँ बार प्रभु, कत दुख सुनावौँ रोइ ॥ १ ॥
काहि ममता दीन पर, को पतित-पावन नाम ।
पाप-मूल अजामिल हिँ, केहि दियो अपनो धाम ॥ २ ॥
रहे सम्भु बिरंचि सुरपति, लोक-पाल अनेक ।
सोक सरि बूड़त करीसहिँ, दई काहु न टेक⁵ ॥ ३ ॥
बिलखि भूपति सदसि महँ, नरनारि कह प्रभु पाहि ।
सकल समरथ सरन काहु न, बसन दीन्हौँ ताहि⁶ ॥ ४ ॥
एक मुख क्यौँ कहौँ, करुना-सिन्धु के गुन गाथ⁷ ।
भक्तहित धरि देह' काह न, कियो कोसल-नाथ ॥ ५ ॥
आप से कहिँ सौंपिये मोहिँ, जो पै अतिहिँ घिनात ।
दासतुलसी और बिधि क्यौँ, चरन परिहरि⁸ जात ॥६॥
(१) दीन दुखी । (२) भयमान । (३) क्लेश-नाशक । (४) त्रय ताप ग्रसित ।
(५) शोक की नदी में डूबते हुए गजेन्द्र को किसी ने सहारा नहीं दिया ।
(६) नरनारी अर्थात द्रोपदी की जब राज सभा में सारी खींची गई और वह
बिलख कर त्राहि २ पुकारी और तुम्हारी शरन ली तो तुम्हारे सिवाय किस ने
उस को वस्त्र दिया । (७) गाय कर । (८) अयोध्या के राजा श्रीरामचंद्र ।
(६) छोड़ कर ।
शब्द संग्रह ८५
(१०)
अस कछु समुझि परै रघुराया ।
बिन तव कृपा दयाल दास हित, मोह न छूटै माया ॥१॥
वाक्य ज्ञान अत्यन्त निपुन, भव पार न पावै कोई ।
निसि गृह मध्य दीप की बातन, तम निवृत्त नहिँ होई ॥२
जैसे कोउ इक दीन दुखित अति, असन-हीन१ दुख पावै ।
चित्र कल्पतरु कामधेनु गृह, लिखे न बिपति नसावै ॥३॥
षट रस बहु प्रकार भोजन कोउ, दिन अरु रैन बखानै ।
बिन बोले सन्तोष-जनित सुख२, खाइ सोई पै जानै ॥४॥
जबलगि नहिँ निज हृदे प्रकास, अरु बिषय आस मनमाहीं।
तुलसिदास तब लगि जग जोनि, भ्रमत सपनेहुँसुखनाहीँ ॥५
(११)
वेद न पुरान गान जानेाँ न बिज्ञान ज्ञान,
ध्यान धारना समाधि साधन प्रबीनता ॥ १ ॥
नाहिँन बिराग जोग जाग भाग तुलसी के,
दया दान दूबरो हौँ, पाप ही की पीनता३ ॥२॥
लोभ मोह काम कोह४, दोष कोष मो साँ कौन,
कलि५ हूँ जो सीखि लई मेरी ये मलीनता ॥ ३ ॥
एक ही भरोसो राम रावरेा कहावत हौँ,
रावरे दयाल दीन-बंधु मेरी हीनता ॥ ४ ॥
(१२)
स्वारथ को साज न समाज परमारथ को,
मो साँ दगाबाज दूसरो न जग जाल है ॥ १ ॥
(१) अहार बिना। (२) जो सुख संतोष से उत्पन्न हुआ अर्थात रसोला
भोजन करने का आनंद । (३) मुटाई । (४) क्रोध । (५) कलियुगं ।
८६ गुसाईं तुलसीदासजी
कौन आयो करौ न करौंगो करतूति भलि,
लिखो न विरंचिहूँ१ भलाई मोरे भाल२ है ॥२॥
रावरी सपथ३ राम नाम ही की गति मेरे,
इहाँ झूठो झूठो सो तिलोक तिहूँ काल है ॥३॥
तुलसी को भलो पै तुम्हारे ही किये कृपाल,
कीजै न बिलंब बलि पानी भरी खाल है ॥४॥
(१३)
केहि कहौं बिपति अति भारी, खोरघुबीर धीरहितकारी॥१
मम हृदय भवन प्रभु तोरा, तहँ बसे आइ बहु चोरा ॥ २ ॥
अतिकठिन करहिं बरजोरा, मानहिं नहिं बिनय निहोरा३
तम मोह लोभ अहंकारा, मद क्रोध बोध४ रिपु मारा ॥४॥
अति करहिं उपद्रव नाथा, मर्दहिं मोहिं जानि अनाथा ५
मैं एक अमित५ बटपारा, कोउ सुनै न मोर पुकारा ॥६॥
भागेहुँ नहिं नाथ उबारा, रघुनायक करहु सँभारा ॥ ७ ॥
कह तुलसिदास सुनु रामा, लूटहिं तस्कर तव धामा६ ॥८॥
चिंता यहि मोहिं अपारा, अपजस नहिं होहि तुम्हारा ॥९
(१४)
ऐसी मूढ़ता या मन की ॥ टेक ॥
परिहरि राम भक्ति सुरसरिता७,आस करत ओसकन८ की॥१
धूम समूह निरखि चातक ज्यौं, तृषित जानि मति घन९की २
नहिं तहँ सीतलता न बारि पुनि, हानि होत लोचन की ॥३
(१) ब्रह्मा। (२) माथा। (३) क़सम। (४) बुद्धि, समझ। (५) अनेक। (६) मेरा
हृदय जो हे प्रभु तुम्हारा मन्दिर है यह ठग लूट रहे हैं। (७) गंगा। (८) ओस की
बूँद। (६) बादल।
शब्द संग्रह ८७
ज्यौँ गच काँच विलोकि सेन जड़, छाँह आपने तन की ॥४
टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की ॥५१
कहँ लग कहौं कुचाल कृपा-निधि, जानत हौ गति जन की ६
तुलसिदास प्रभु हरौ दुसह दुख, लाज करो निज पन की ॥७
(१५)
कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो ।
श्रीरघुनाथ कृपालु कृपा तैं, सन्त सुभाव गहौंगो ॥ १ ॥
जथा लाभ सन्तोष सदा, काहू सौं कछु न चहौंगो ।
परहित परत निरन्तर मन, क्रम बचन नेम निबहौंगो ॥२॥
परुष२ बचन अति दुसह३ श्रवन सुनि, तेहि पावक न दहौंगो।
विगत४ मान सम सीतल मन, परगुन नहिँ दोष कहौंगो ३
परिहरि देह-जनित५ चिन्ता दुख, सुख सम बुद्धि सहौंगो ।
तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि के, अविचल भक्ति लहौंगो ॥४
॥ उपदेश ॥
(१)
जा के प्रिय न राम बैदेही ।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ॥१॥
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरथ महतारी ।
बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज बनिता, भये जग मंगलकारी ॥२॥
नाते नेह राम के मनियत, सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं ।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं ॥३॥
तुलसी सो सब भाँति परम हित, पूज्य प्रान तैं प्यारो ।
जा सौं होय सनेह राम पद, एतो मतो हमारो ॥४॥
(१) जैसे शीशा की गच में अज्ञान बाज़ चिड़िया (श्येन) अपने शरीर की
छाया देख कर दूसरी चिड़िया का भ्रम कर के अपने मुँह (आनन) में घाव
(छति) लगने का डर छोड़ कर भूख बस टूट पड़ता है। (२) कट्टु, कड़ा ।
(३) असह, सहने योग्य नहीं । (४) मृत, बीता हुआ । (५) देह से उत्पन्न हुई ।
८८ गुसाईँ तुलसीदासजी
(२)
राम राम राम जीह१, जौ लौं तू न जपिहै ।
तौ लौं तू कहूँ जाय तिहूँ ताप तपिहै ॥ १ ॥
सुरसरि२ तीर बिनु नीर दुख पाइहै ।
सुरतरु३ तर तोहिँ दुख दारिद सताइहै ॥ २ ॥
जागत बागत४ सुख सपने न सोइहै ।
जनम जनम जुग जुग जग रोइहै ॥ ३ ॥
छूटिबे के जतन बिसेष बाँध्यो जायगो ।
ह्वैहै बिष भोजन जो सुधा५ सानि खायगो ॥ ४ ॥
तुलसी बिलोक तिहूँ काल तो सैं दीन को ।
राम नाम ही की गति जैसे जल मीन को ॥ ५ ॥
(३)
स्त्री रघुबीर की यह बानि६ ।
नीच हूँ सौँ करत नेह सो, प्रीति मन अनुमानि ॥१॥
परम अधम निषाद पामर, कौन ता की कानि ।
लियो सो उर लाय सुत ज्योँ, प्रेम को पहिचानि ॥२॥
गोध कौन दयालु जो, बिधि रच्यो हिंसा सानि ।
जनक ज्योँ रघुनाथ ता को, दियो जल निज पानि७ ॥३॥
प्रकृति मलिन कुजाति सबरी, सकल अवगुन खानि ।
खात ता के दिये फल, अति रुचि बखानि बखानि ॥४॥
रजनिचर अरु रिपु बिभीषन, सरन आयो जानि ।
भरत ज्योँ उठि ताहि भेंटत, देह दसा भुलानि ॥५॥
कौन सौम्य८ सुसील बानर६, जिनहिँ सुमिरत हानि ।
किये ते सब सखा पूजे, भवन अपने आनि ॥६॥
(१) जीभ । (२) गंगा । (३) कल्प वृक्ष । (४) चलते । (५) अमृत । (६) सुभाव ।
(७) जैसे कोई पिता को अपने हाथ से तिलांजुली देता है। (८) रुचिर, दिल-
पसंद । (६) बन्दर ।
शब्द संग्रह ८६
राम सहज कृपाल कोमल, दीन-हित दिन-दानि ।
भजहि ऐसे प्रभुहिं तुलसी, कुटिल कपट न ठानि ॥७॥
(४)
जागु जागु जीव जड़ जोहे जग जामिनी ।
देह गेह नेह जानि जैसे घन दामिनी ॥१॥१
सोवत सपने सहै संसृति सन्ताप रे ।
बूभयो मृग-वारि खायो जेवरि को साँप रे२ ॥ २॥
कहे बेद बुध३ तू तो बूझ मन माहिँ रे ।
दोष दुख सपने के जागे ही पै जाहिँ रे ॥ ३ ॥
तुलसी जागेँ तैं जाय ताप तिहुँ ताय रे ।
राम नाम सुचि४ रुचि५ सहज सुभाय रे ॥४॥
(५)
सवैया
अपराध अगाध भये जन तैं, अपने उर आनत नाहिँन जू ॥
गनिका गज गोध अजामिल के, गनि पातक पुंज सराहिन जू
लिये बारक६ नाम सुधाम दियो, जेहि धाम महा मुनि जाहिँ न जू॥
तुलसी भजु दीनदयालहिँ रे, रघुनाथ अनाथ हिँ दाहिन७जू
(६)
सवैया
सो जननी सो पिता सोइ भ्रात, सो भामिनि सो सुत सो हित मेरो ॥
सोई सगा सो सखा सोइ सेवक, सो गुरु सो सुर साहिब चेरो ॥
सो तुलसी प्रिय प्रान समान, कहाँ लौं बनाय कहौँ बहुतेरो ॥
जो तजि देह को गेह को नेह, सनेह सौँ राम को होय सबेरो ॥
(१) हे जीव जो घोर निद्रा में सोय रहा है जाग कर रात्रि रूप जग को देख
जहाँ देह और घर की प्रीत बादल में बिजली के समान छिन-भंगी है। (२) नींद
की दशा में तू संसार सम्बन्धी कष्ट भोगता है जो मृग-जल और रस्सी के साँप
की नाईँ केवल भ्रम रूप है। (३) पंडित । (४) पवित्र । (५) प्रिय लगे । (६) एक
बार । (७) दाहिने = सहायक ।
१७
६० दादू दयाल
॥ मिश्रित ॥
ममता तू न गई मेरे मन तैं ॥ टेक ॥
पाके केस जन्म के साथी, लाज गई लोकन तैं ।
तन थोके कर करूपन लागे, जोति गई नैनन तैं ॥ १ ॥
सरवन वचन न सुनत काहु के, बल गये सब इंद्रिन तैं ।
टूटे दसन बचन नहिं आवत, सोभा गई मुखन तैं ॥२॥
कफ पित बात कंठ पर बैठे, सुत हिँ बुलावत कर तैँ ।
भाइ बन्धु सब परम पियारे, नारि निकारत घर तैं ॥३॥
जैसे ससि मंडल बिच स्याही, छुटे न कोटि जतन तैं ।
तुलसिदास बलि जाउँ चरन के, लोभ पराये धन तैं ॥४॥
दादू दयाल
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो पृष्ठ ७६ संतवानी संग्रह भाग १ ]
॥ सर्व समरथ ॥
जिनि सत छाड़ै बावरे, पूरिक है पूरा ।
सिरजे की सब चिंत है,१ देवे कौँ सूरा ॥ टेक ॥
गर्भ बास जिन राखिया, पावक थैं न्यारा ।
जुगति जतन करि सीँचिया, दे प्राण अधारा ॥ १ ॥
कुंज कहाँ घरि संचरै,२ तहँ को रखवारा ।
हेम हरत जिन राखिया,३ सो खसम हमारा ॥ २ ॥
जल थल जीव जिते रहैं, सो सब कौँ पूरै ।
संपट सिला मैं देत है, काहे नर झूरै४ ॥ ३ ॥
(१) उसे सारी रचना की चिंता है। (२) अंडे को सेवै—कहते हैं कि कुंज
चिड़िया दूर रह कर सुरत से अंडे को सेती है। (३) श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को हिमालय
पर्वत पर बर्फ़ में गलने से बचा लिया था। (४) मालिक दो पत्थरों की संधि
मे बंद जीव जंतु की ख़बर लेता है तो हे नर तू क्यों सोच करता है।
शब्द संग्रह ६१
जिन यहु भार उठाइया, निरवाहै सोई ।
दादू छिन न बिसारिये, ता थैं जीवन होई ॥ ४ ॥
॥ नाम और सुमिरन ॥
(१)
नाँउ रे नाँउ रे, सकल सिरोमणि नाँउ रे,
मैं बलिहारी जाऊँ रे ॥ टेक ॥
दूतर तारै पारि उतारै, नरक निवारै नाँउ रे ॥ १ ॥
तारणहारा भौजल पारा, निर्मल सारा नाँउ रे ॥ २ ॥
नूर दिखावै तेज मिलावै, जोति जगावै नाँउ रे ॥ ३ ॥
सब सुख दाता अमृत राता, दादू माता नाँउ रे ॥ ४ ॥
(२)
मनाँ भजि राम नाम लीजे ।
साध संगति सुमिरि सुमिरि, रसना रस पीजे ॥ टेक ॥
साधू जन सुमिरण करि, केते जपि जागे ।
अगम निगम अमर किये, काल कोइ न लागे ॥ १ ॥
नीच ऊँच चिंतन करि, सरणागति लीये ।
भगति मुकति अपणी गति, ऐसैं जन कीये ॥ २ ॥
केते तिरि तीर लागे, बंधन भव छूटे ।
कलिमल विष जुग जुग के, राम नाम खूटे¹ ॥ ३ ॥
भरम करम सब निवारि, जीवन जपि सोई ।
दादू दुख दूर-करण, दूजा नहिं कोई ॥ ४ ॥
॥ चितावनी ॥
(१)
मन रे राम बिना तन छीजै ।
जब यहु जाइ मिलै माटी मैं, तब कहु कैसैं कीजै ॥टेक॥
पारस परसि कंचन करिलीजै, सहज सुरति सुखदाई ।
माया बेलि बिषै फल लागे, ता परि भूलिन भाई ॥१॥
(१) दूर किये, खतम किये ।
६२ दादू दयाल
जब लग प्राण प्यंड है नीका, तब लग ताहि जिनि भूलै ।
यहु संसार सैंबल१ कै सुख ज्यूँ, ता पर तूँ जिनि फूलै ॥२॥
औसर येह जानि जग जीवन, समझि देखि सचु पावै ।
अंग अनेक आन मति भूलै, दादू जिनि दहकावै२ ॥३॥
(२)
सजनी रजनी घटती जाइ ।
पल पल छीजै अवधि दिन आवै, अपनौँ लाल मनाइ ॥टेक
अति गति नींद कहा सुख सोवै, यहु औसर चलि जाइ ।
यहु तन बिछुरैं बहुरि कहँ पावै, पीछैं ही पछिताइ ॥१॥
प्राणपति जागै सुंदरि क्यौं सोवै, उठि आतुर गहि पाँइ ।
कोमल बचन करुणा करि आगैँ, नख सिख रहु लपटाइ ॥२॥
सखी सुहाग सेज सुख पावै, प्रीतम प्रेम बढ़ाइ ।
दादू भाग बड़े पिव पावै, सकल सिरोमणि राइ ॥ ३ ॥
(३)
कागा रे करंक परि बोलै ।
खाइ माँस अरु लगहीं३ डोलै ॥ टेक ॥
जा तन कौँ रचि अधिक सँवारा ।
सो तन ले माटी मैं डारा ॥ १ ॥
जा तन देखि अधिक नर फूले ।
सो तन छाड़ि चल्या रे भूले ॥ २ ॥
जा तन देखि मन मैं गरबाना ।
मिलि गया माटी तजि अभिमाना ॥ ३ ॥
(१) सेमर एक वृक्ष होता है जिस के बड़े सुंदर लाल फूल देख कर सुवा
मगन होता है पर फल पर चोंच मारने से केवल रुई उसके भीतर से निकलती है।
(२) ठगावै । (३) निकट ।
शब्द संग्रह ६३
दादू तन की कहा बड़ाई ।
निमख माहिँ माटी मिलि जाई ॥ ४ ॥
॥ विरह ॥
(१)
कौण विधि पाइये रे, मीत हमारा सोइ ॥ टेक ॥
पास पीव परदेस है रे, जब लग प्रगटै नाहिं ।
बिन देखे दुख पाइये, यहु सालै मन माहिँ ॥ १ ॥
जब लग नैन न देखिये, परगट मिलै न आइ ।
एक सेज संगहि रहै, यहु दुख सह्या न जाइ ॥ २ ॥
तब लग नेड़े दूरि है, जब लग मिलै न मोहिँ ।
नैन निकट नहिँ देखिये, संगि रहे क्या होइ ॥ ३ ॥
कहा करौँ कैसे मिलै रे, तलफै मेरा जीव ।
दादू आतुर विरहनी, कारण अपने पीव ॥ ४ ॥
(२)
अजहुँ न निकसै प्राण कठोर ॥ टेक ॥
दरसन बिना बहुत दिन बीते, सुंदर प्रीतम मोर ॥ १ ॥
चारि पहर चारौँ जुग बीते, रैनि गँवाई भोर ॥ २ ॥
अवधि गई अजहूँ नहिँ आये, कतहूँ रहे चित चोर ॥३॥
कबहूँ नैन निरखि नहिँ देखे, मारग चितवत तोर ॥४॥
दादू ऐसे आतुर विरहणि, जैसे चंद चकोर ॥ ५ ॥
(३)
कतहूँ रहे हो बिदेस, हरि नहिँ आये हो ।
जनम सिरानी जाइ, पिव नहिँ पाये हो ॥ टेक ॥
बिपति हमारी जाइ, हरि सौँ को कहै हो ।
तुम्ह बिन नाथ अनाथ, बिरहनि क्यूँ रहै हो ॥ १ ॥
६४ दादू दयाल
पिव के बिरह बियोग, तन की सुधि नहिँ हो ।
तलफि तलफि जिव जाइ, मिरतक ह्वै रही हो ॥ २ ॥
दुखित ' भई हम नारि, कब हरि आवैँ हो ।
तुम्ह बिन प्राण-अधार, जिव दुख पावै हो ॥ ३ ॥
प्रगटहु दीनदयाल, बिलम न कीजै हो ।
दादू दुखी बेहाल, दरसन दीजै हो ॥ ४ ॥
(४)
आवौ राम दया करि मेरे, बार बार बलिहारी तेरे ॥टेक॥
बिरहनि आतुर पंथ निहारै, राम राम कहि पीव पुकारै ॥१
पंथी बूझै मारग जोवै, नैन नीर जल भरि भरि रोवै ॥२॥
निस दिन तलफै रहै उदास, आतम राम तुम्हारे पास ॥३॥
बप१ बिसरै तन की सुधि नाहीं, दादू बिरहनि मिरतक माहीं२॥४
॥ प्रेम ॥
(१)
बाला सेज हमारी रे, तूँ आव हौँ वारी रे,
हौँ दासी तुम्हारी रे ॥ टेक ॥
तेरा पंथ निहारूँ रे, सुन्दर सेज सँवारूँ रे,
जियरा तुम पर वारूँ रे ॥ १ ॥
तेरा अँगना पेखौँ रे, तेरा मुखड़ा देखौँ रे,
तब जीवन लेखौँ रे ॥ २ ॥
मिलि सुखड़ा दीजै रे, यह लाहड़ा३ लीजै रे,
तुम देखैँ जीजै रे ॥ ३ ॥
तेरे प्रेम की माती रे, तेरे रगड़े राती रे,
दादू वारणै जाती रे ॥ ४ ॥
(१) शरीर । (२) मन की तरंगें मर गई हैं । (३) लाभ ।
शब्द संग्रह ४५
(२)
अरे मेरा अमर उपावणहार रे, खालिक आसिक तेरा॥टेक
तुम सौँ राता तुम सौँ माता, तुम सौँ लागा रंग रे खालिक॥१
तुम सौँ खेला तुम सौँ मेला, तुम सौँ प्रेस सनेह रे खालिक॥२
तुम सौँ लेणा तुम सौँ देणा, तुम्हीं सौँ रत होइ रे खालिक ३
खालिक मेरा आसिक तेरा, दादू अनत न जाइ रे खालिक॥४
(३)
हरि रस माते मगन भये।
सुमिरि सुमिरि भये मतवाले, जामण मरण सब भूलि गये॥टेक
निर्मल भगति प्रेम रस पीवैँ, आन न दूजा भाव धरैँ।
सहजैँ सदा राम रंगि राते, मुकति बैकुंठै कहा करैँ ॥१॥
गाड गाइ रस लीन भये हैं, कछू न माँगैँ संत जनाँ।
और अनेक देहु दत आगैँ, आन न भावै राम बिनाँ ॥२॥
इकटग ध्यान रहैँ ल्यौ लागे, छाकि परे हरि रस पीवैँ।
दादू मगन रहैँ रसिमाते, ऐसैँ हरि के जन जीवैँ ॥ ३ ॥
(४)
तेरे नाँउ की बलि जाऊँ, जहाँ रहैँ जिस ठाऊँ ॥ टेक ॥
तेरे बैनौं की बलिहारी, तेरे नैनहुँ ऊपरि वारी।
तेरी मूरति की बलि कीती, वारि वारि हौं दीती ॥१॥
सोभित नूर तुम्हारा, सुंदर जोति उजारा।
मीठा प्राण-पियारा, तूँ है पीव हमारा ॥ २ ॥
तेज तुम्हारा कहिये, निर्मल काहे न लहिये।
दादू बलि बलि तेरे, आव पिया तूँ मेरे ॥ ३ ॥
६६ दादू दयाल
॥ विनय ॥
(१)
पार नहिँ पाइये रे राम बिना को निरबाहणहार ॥टेक॥
तुम बिन तारण को नहीं, दूभर¹ यहु संसार ।
पैरत थाके केसवा, सूझै वार न पार ॥ १ ॥
बिखम भयानक भौजला, तुम बिन भारी होइ ।
तूँ हरि तारण केसवा, दूजा नाहीं कोइ ॥ २ ॥
तुम बिन खेवट को नहीं, अतिर² तिखो नहिँ जाइ ।
औघट भेरा³ डूबिहै, नाहीं आन उपाइ ॥ ३ ॥
यहु घट औघट बिखम है, डूबत माहिँ सरीर ।
दादू काइर राम बिन, मन नहिँ बाँधै धीर ॥ ४ ॥
(२)
हमारे तुम्हौँ हौ रखपाल ।
तुम बिन और नहीं कोइ मेरे, भौ दुख मेटणहार ॥टेक॥
बैरी पंच निमष नहिँ न्यारे, रोकि रहे जम काल ।
हा जगदीस दास दुख पावै, स्वामी करो सँभाल ॥ १ ॥
तुम बिन राम दहैँ ये दुंदर, दसौँ दिसा सब साल ।
देखत दीन दुखी क्यौँ कीजे, तुम हौ दीनदयाल ॥ २ ॥
निर्भय नाँव हेत हरि दीजे, दरसन परसन लाल ।
दादू दीन लीन करि लीजे, मेटहु सबै जँजाल ॥ ३ ॥
(३)
क्यौँ बिसरै मेरा पीव पियारा ।
जीव की जीवन प्राण हमारा ॥ टेक ॥
क्यौँकर जीवै मीन जल बिछुरैँ, तुम बिन प्राण सनेही ।
च्यंतामणि जब कर थैँ छूटै, तब दुख पावै देही ॥ १ ॥
(१) कठिन । (२) तैरने के योग्य नहीं । (३) बेड़ा ।
शब्द संग्रह ९७
बाला बालक दूध न देवै, सो कैसैं करि पीवै ।
निर्धन का धन अनत भुलाना, सो कैस करि जीवै ॥२॥
बरखहु राम सदा सुख अमृत, नीझर निर्मल धारा ।
प्रेम पियाला भरि भरि दीजै, दादू दास तुम्हारा ॥३॥
(२)
तौ निबहै जन सेवक तेरा, ऐसैं दया करि साहिब मेरा॥टेक
ज्यूँ हम तोरैं त्यूँ तूँ जोरे, हम तोरैं पै तूँ नहिं तोरै ॥१॥
हम बिसरैं त्यूँ तूँ न बिसारै, हम बिगरैं पै तूँ न बिगारै ॥२॥
हम भूलैं तूँ आनि मिलावै, हम बिछुरैं तूँ अंगि लगावै ॥३॥
तुम साधै सो हम पै नाहीं, दादू दरसन देहु गुसाईं ॥४॥
॥ साध ॥
सोई साध सिरोमणी, गोबिंद गुण गावै ।
राम भजै बिखिया तजै, आपा न जनावै ॥ टेक ॥
मिथ्या मुखि बोलै नहीं, पर-निंदा नाहीं ।
औगुण छाड़ै गुण गहै, मन हरि पद आहीं ॥ १ ॥
निर्वैरी सब आतमा, पर आतम जानै ।
सुखदाई समिता गहै, आपा नहिं आनै ॥ २ ॥
आपा पर अंतर नहीं, निर्मल निज सारा ।
सतवादी साचा कहै, लैलीन बिचारा ॥ ३ ॥
निर्ले भजि न्यारा रहै, काहू लिपत न होई ।
दादू सब संसार में, ऐसा जन कोई ॥ ४ ॥
॥ घट मठ ॥
(१)
भाई रे घर ही मैं घर पाया ।
सहजि समाइ रह्यौ ता माहीं, सतगुर खोज बताया ॥टेक
ता घर काज सबै फिरि आया, आपै आप लखाया ।
खोलि कपाट महल के दीन्हे, थिर असथान दिखाया ॥१॥
१३
६८ दादू दयाल
भय औ भेद भरम सब भागा, साच सोई मन लाया ।
प्यंड परे जहाँ जिव जावै, ता मैं सहज समाया ॥ २ ॥
निहचल सदा चलै नहिं कबहूँ, देख्या सब में सोई ।
ताही सूँ मेरा मन लागा, और न दूजा कोई ॥ ३ ॥
आदि अन्त सोई घर पाया, इब मन अनत न जाई ।
दादू एक रंगै रंग लागा, ता मैं रह्या समाई ॥ ४ ॥
(२)
आप आपण मैं खोजी रे भाई ।
बस्तु अगोचर गुरू लखाई ॥ टेक ॥
ज्यूँ मही बिलोयैँ माखण आवै ।
त्यूँ मन मथियाँ तैं तत पावै ॥ १ ॥
काठ हुतासन१ रह्या समाइ ।
त्यूँ मन माहिं निरंजन राइ ॥ २ ॥
ज्यूँ अवनी२ में नीर समाना ।
त्यूँ मन माहिँ साच सयाना ॥ ३ ॥
ज्यूँ दर्पन के नहिं लागै काई ।
त्यूँ मूरति माहिँ निरखि लखाई ॥ ४ ॥
सहजैं मन मथियाँ ते तत पाया ।
दादू उन तै आप लखाया ॥ ५ ॥
॥ सेवक ॥
तूँ साहिब मैं सेवग तेरा, भावै सिर दे सूली मेरा ॥ टेक ॥
भावै करवत सिर पर सारि, भावै लेकर गरदन मारि ॥ १ ॥
भावै चहुँ दिसि अगिन लगाइ, भावै काल दसौ दिसि खाइ २
भावै गिरवर गगन गिराइ, भावै दरिया माहिँ बहाइ ॥ ३ ॥
भावै कनक कसौटी देहु, दादू सेवग कसि कसि लेहु ॥ ४ ॥
(१) आग । (२) पृथ्वी ।
राग सारंग ६६
॥ उपदेश ॥
(१)
जिंदरा मेरे सुमिर सार, काम क्रोध मद तजि बिकार ॥टेक॥
तूँ जिनि भूले मन गँवार, सिर भार न लीजै मानि हार ॥१॥
सुणि समझायौ बारवार, अजहूँ न चेतै हो हुसियार ॥२॥
करि तैसैं भव तिरिये पार, दादू इव थैं यहि बिचार ॥३॥
(२)
डरिये रे डरिये, परमेसुर थैं डरिये रे ।
लेखा लेवै भरि भरि देवै, ता थैं बुरा न करिये रे ॥टेक॥
साचा लीजी साचा दीजी, साचा सौदा कीजो रे ।
साचा राखी झूठा नाखी, विष ना पीजो रे ॥ १ ॥
निर्मल गहिये निर्मल रहिये, निर्मल कहिये रे ।
निर्मल लीजी निर्मल दीजी, अनत न बहिये रे ॥ २ ॥
साह पठाया वनिज न आया, जिनि डहकावै रे ।
झूठ न भावै फेरि पठावै, कीया पावै रे ॥ ३ ॥
पंथ दुहेला जाइ अकेला, भार न लीजी रे ।
दादू मेला होइ सुहेला, सो कुछ कीजो रे ॥ ४ ॥
॥ मन ॥
(१)
मन चंचल मेरो कह्यौ न मानै, दसौँ दिसा दौरावै रे ।
आवत जात बार नहिं लागै, बहुत भाँति बौरावै रे ॥टेक॥
बेर बेर वरजत या मन कौँ, किंचित सीख न मानै रे ।
ऐसैं निकसि जात या तन थैं, जैसैं जीव न जानै रे ॥१॥
कोटिक जतन करत या मन कौँ, निहचल निमिष न होई रे ।
चंचल चपल चहूँ दिसि भरमै, कहा करै जन कोई रे ॥२॥
सदा सोच रहत घट भीतरि, मन थिर कैसैं कीजै रे ।
सहजैँ सहज साध की संगति, दादू हरि भजि लीजै रे ॥३॥
१०० दादू दयाल
(२)
मेरे तुम्हौं राखणहार, दूजा को नहीं ।
ये चंचल चहुँ दिसि जाइ, काल तहाँ तहाँ ॥ टेक ॥
मैं केते किये उपाइ, निहचल ना रहै ।
जहाँ बरजौं तहँ जाइ, मदमाता बहै ॥ १ ॥
जहाँ जाणै तहँ जाइ, तुम थैं ना डरै ।
ता स्यूँ कहा बसाइ, भावै त्यूँ करै ॥ २ ॥
सकल पुकारैं साध, मैं केता कह्या ।
गुर अंकुस मानै नाहिं, निरभै ह्वै रह्या ॥ ३ ॥
तुम बिन और न कोइ, इस मन को गहै ।
तूं राखै राखणहार, दादू तौ रहै ॥ ४ ॥
॥ जगत-मिथ्या ॥
मन रे तूँ देखै सो नाहीं, है सो अगम अगोचर माहीं ॥टेक
निस अँधियारी कछू न सूझै, संसै सरप दिखावा ।
ऐसैं अंध जगत नहिं जानै, जीव जेवड़ी¹ खावा ॥ १ ॥
मृग-जल देखि तहाँ मन धावै, दिन दिन झूठी आसा ।
जहँ जहँ जाइ तहाँ जल नाहीं, निहचै मरै पियासा ॥२॥
भरम बिलास बहुत बिधि कीन्हा, ज्यौं सुपिनैं सुख पावै ।
जागत झूठ तहाँ कुछ नाहीं, फिरि पीछैं पछितावै ॥३॥
जब लग सूता तब लग देखै, जागत भरम बिलाना ।
दादू अंति इहाँ कुछ नाहीं, है सो सोधि सयाना ॥ ४ ॥
॥ करम धरम ॥
मूल सींचि बघै² ज्यूँ बेला । सो तत तरवर रहै अकेला ॥टेक॥
देवी देखत फिरैं ज्यूँ भूले । खाइ हलाहल बिख कौँ फूले ।
सुख कौँ चाहै पड़ै गल पासी³। देखत हीरा हाथ थैं जासी ॥१॥
(१) रस्सी । (२) बढ़ै । (३) फाँसी ।