संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ दादू दयाल
भय औ भेद भरम सब भागा, साच सोई मन लाया ।
प्यंड परे जहाँ जिव जावै, ता मैं सहज समाया ॥ २ ॥
निहचल सदा चलै नहिं कबहूँ, देख्या सब में सोई ।
ताही सूँ मेरा मन लागा, और न दूजा कोई ॥ ३ ॥
आदि अन्त सोई घर पाया, इब मन अनत न जाई ।
दादू एक रंगै रंग लागा, ता मैं रह्या समाई ॥ ४ ॥
(२)
आप आपण मैं खोजी रे भाई ।
बस्तु अगोचर गुरू लखाई ॥ टेक ॥
ज्यूँ मही बिलोयैँ माखण आवै ।
त्यूँ मन मथियाँ तैं तत पावै ॥ १ ॥
काठ हुतासन१ रह्या समाइ ।
त्यूँ मन माहिं निरंजन राइ ॥ २ ॥
ज्यूँ अवनी२ में नीर समाना ।
त्यूँ मन माहिँ साच सयाना ॥ ३ ॥
ज्यूँ दर्पन के नहिं लागै काई ।
त्यूँ मूरति माहिँ निरखि लखाई ॥ ४ ॥
सहजैं मन मथियाँ ते तत पाया ।
दादू उन तै आप लखाया ॥ ५ ॥
॥ सेवक ॥
तूँ साहिब मैं सेवग तेरा, भावै सिर दे सूली मेरा ॥ टेक ॥
भावै करवत सिर पर सारि, भावै लेकर गरदन मारि ॥ १ ॥
भावै चहुँ दिसि अगिन लगाइ, भावै काल दसौ दिसि खाइ २
भावै गिरवर गगन गिराइ, भावै दरिया माहिँ बहाइ ॥ ३ ॥
भावै कनक कसौटी देहु, दादू सेवग कसि कसि लेहु ॥ ४ ॥
(१) आग । (२) पृथ्वी ।