संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ९७
बाला बालक दूध न देवै, सो कैसैं करि पीवै ।
निर्धन का धन अनत भुलाना, सो कैस करि जीवै ॥२॥
बरखहु राम सदा सुख अमृत, नीझर निर्मल धारा ।
प्रेम पियाला भरि भरि दीजै, दादू दास तुम्हारा ॥३॥
(२)
तौ निबहै जन सेवक तेरा, ऐसैं दया करि साहिब मेरा॥टेक
ज्यूँ हम तोरैं त्यूँ तूँ जोरे, हम तोरैं पै तूँ नहिं तोरै ॥१॥
हम बिसरैं त्यूँ तूँ न बिसारै, हम बिगरैं पै तूँ न बिगारै ॥२॥
हम भूलैं तूँ आनि मिलावै, हम बिछुरैं तूँ अंगि लगावै ॥३॥
तुम साधै सो हम पै नाहीं, दादू दरसन देहु गुसाईं ॥४॥
॥ साध ॥
सोई साध सिरोमणी, गोबिंद गुण गावै ।
राम भजै बिखिया तजै, आपा न जनावै ॥ टेक ॥
मिथ्या मुखि बोलै नहीं, पर-निंदा नाहीं ।
औगुण छाड़ै गुण गहै, मन हरि पद आहीं ॥ १ ॥
निर्वैरी सब आतमा, पर आतम जानै ।
सुखदाई समिता गहै, आपा नहिं आनै ॥ २ ॥
आपा पर अंतर नहीं, निर्मल निज सारा ।
सतवादी साचा कहै, लैलीन बिचारा ॥ ३ ॥
निर्ले भजि न्यारा रहै, काहू लिपत न होई ।
दादू सब संसार में, ऐसा जन कोई ॥ ४ ॥
॥ घट मठ ॥
(१)
भाई रे घर ही मैं घर पाया ।
सहजि समाइ रह्यौ ता माहीं, सतगुर खोज बताया ॥टेक
ता घर काज सबै फिरि आया, आपै आप लखाया ।
खोलि कपाट महल के दीन्हे, थिर असथान दिखाया ॥१॥
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