संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ गुसाईँ तुलसीदासजी
(२)
राम राम राम जीह१, जौ लौं तू न जपिहै ।
तौ लौं तू कहूँ जाय तिहूँ ताप तपिहै ॥ १ ॥
सुरसरि२ तीर बिनु नीर दुख पाइहै ।
सुरतरु३ तर तोहिँ दुख दारिद सताइहै ॥ २ ॥
जागत बागत४ सुख सपने न सोइहै ।
जनम जनम जुग जुग जग रोइहै ॥ ३ ॥
छूटिबे के जतन बिसेष बाँध्यो जायगो ।
ह्वैहै बिष भोजन जो सुधा५ सानि खायगो ॥ ४ ॥
तुलसी बिलोक तिहूँ काल तो सैं दीन को ।
राम नाम ही की गति जैसे जल मीन को ॥ ५ ॥
(३)
स्त्री रघुबीर की यह बानि६ ।
नीच हूँ सौँ करत नेह सो, प्रीति मन अनुमानि ॥१॥
परम अधम निषाद पामर, कौन ता की कानि ।
लियो सो उर लाय सुत ज्योँ, प्रेम को पहिचानि ॥२॥
गोध कौन दयालु जो, बिधि रच्यो हिंसा सानि ।
जनक ज्योँ रघुनाथ ता को, दियो जल निज पानि७ ॥३॥
प्रकृति मलिन कुजाति सबरी, सकल अवगुन खानि ।
खात ता के दिये फल, अति रुचि बखानि बखानि ॥४॥
रजनिचर अरु रिपु बिभीषन, सरन आयो जानि ।
भरत ज्योँ उठि ताहि भेंटत, देह दसा भुलानि ॥५॥
कौन सौम्य८ सुसील बानर६, जिनहिँ सुमिरत हानि ।
किये ते सब सखा पूजे, भवन अपने आनि ॥६॥
(१) जीभ । (२) गंगा । (३) कल्प वृक्ष । (४) चलते । (५) अमृत । (६) सुभाव ।
(७) जैसे कोई पिता को अपने हाथ से तिलांजुली देता है। (८) रुचिर, दिल-
पसंद । (६) बन्दर ।