संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ४५
(२)
अरे मेरा अमर उपावणहार रे, खालिक आसिक तेरा॥टेक
तुम सौँ राता तुम सौँ माता, तुम सौँ लागा रंग रे खालिक॥१
तुम सौँ खेला तुम सौँ मेला, तुम सौँ प्रेस सनेह रे खालिक॥२
तुम सौँ लेणा तुम सौँ देणा, तुम्हीं सौँ रत होइ रे खालिक ३
खालिक मेरा आसिक तेरा, दादू अनत न जाइ रे खालिक॥४
(३)
हरि रस माते मगन भये।
सुमिरि सुमिरि भये मतवाले, जामण मरण सब भूलि गये॥टेक
निर्मल भगति प्रेम रस पीवैँ, आन न दूजा भाव धरैँ।
सहजैँ सदा राम रंगि राते, मुकति बैकुंठै कहा करैँ ॥१॥
गाड गाइ रस लीन भये हैं, कछू न माँगैँ संत जनाँ।
और अनेक देहु दत आगैँ, आन न भावै राम बिनाँ ॥२॥
इकटग ध्यान रहैँ ल्यौ लागे, छाकि परे हरि रस पीवैँ।
दादू मगन रहैँ रसिमाते, ऐसैँ हरि के जन जीवैँ ॥ ३ ॥
(४)
तेरे नाँउ की बलि जाऊँ, जहाँ रहैँ जिस ठाऊँ ॥ टेक ॥
तेरे बैनौं की बलिहारी, तेरे नैनहुँ ऊपरि वारी।
तेरी मूरति की बलि कीती, वारि वारि हौं दीती ॥१॥
सोभित नूर तुम्हारा, सुंदर जोति उजारा।
मीठा प्राण-पियारा, तूँ है पीव हमारा ॥ २ ॥
तेज तुम्हारा कहिये, निर्मल काहे न लहिये।
दादू बलि बलि तेरे, आव पिया तूँ मेरे ॥ ३ ॥