संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ दादू दयाल
॥ विनय ॥
(१)
पार नहिँ पाइये रे राम बिना को निरबाहणहार ॥टेक॥
तुम बिन तारण को नहीं, दूभर¹ यहु संसार ।
पैरत थाके केसवा, सूझै वार न पार ॥ १ ॥
बिखम भयानक भौजला, तुम बिन भारी होइ ।
तूँ हरि तारण केसवा, दूजा नाहीं कोइ ॥ २ ॥
तुम बिन खेवट को नहीं, अतिर² तिखो नहिँ जाइ ।
औघट भेरा³ डूबिहै, नाहीं आन उपाइ ॥ ३ ॥
यहु घट औघट बिखम है, डूबत माहिँ सरीर ।
दादू काइर राम बिन, मन नहिँ बाँधै धीर ॥ ४ ॥
(२)
हमारे तुम्हौँ हौ रखपाल ।
तुम बिन और नहीं कोइ मेरे, भौ दुख मेटणहार ॥टेक॥
बैरी पंच निमष नहिँ न्यारे, रोकि रहे जम काल ।
हा जगदीस दास दुख पावै, स्वामी करो सँभाल ॥ १ ॥
तुम बिन राम दहैँ ये दुंदर, दसौँ दिसा सब साल ।
देखत दीन दुखी क्यौँ कीजे, तुम हौ दीनदयाल ॥ २ ॥
निर्भय नाँव हेत हरि दीजे, दरसन परसन लाल ।
दादू दीन लीन करि लीजे, मेटहु सबै जँजाल ॥ ३ ॥
(३)
क्यौँ बिसरै मेरा पीव पियारा ।
जीव की जीवन प्राण हमारा ॥ टेक ॥
क्यौँकर जीवै मीन जल बिछुरैँ, तुम बिन प्राण सनेही ।
च्यंतामणि जब कर थैँ छूटै, तब दुख पावै देही ॥ १ ॥
(१) कठिन । (२) तैरने के योग्य नहीं । (३) बेड़ा ।