संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ दादू दयाल
पिव के बिरह बियोग, तन की सुधि नहिँ हो ।
तलफि तलफि जिव जाइ, मिरतक ह्वै रही हो ॥ २ ॥
दुखित ' भई हम नारि, कब हरि आवैँ हो ।
तुम्ह बिन प्राण-अधार, जिव दुख पावै हो ॥ ३ ॥
प्रगटहु दीनदयाल, बिलम न कीजै हो ।
दादू दुखी बेहाल, दरसन दीजै हो ॥ ४ ॥
(४)
आवौ राम दया करि मेरे, बार बार बलिहारी तेरे ॥टेक॥
बिरहनि आतुर पंथ निहारै, राम राम कहि पीव पुकारै ॥१
पंथी बूझै मारग जोवै, नैन नीर जल भरि भरि रोवै ॥२॥
निस दिन तलफै रहै उदास, आतम राम तुम्हारे पास ॥३॥
बप१ बिसरै तन की सुधि नाहीं, दादू बिरहनि मिरतक माहीं२॥४
॥ प्रेम ॥
(१)
बाला सेज हमारी रे, तूँ आव हौँ वारी रे,
हौँ दासी तुम्हारी रे ॥ टेक ॥
तेरा पंथ निहारूँ रे, सुन्दर सेज सँवारूँ रे,
जियरा तुम पर वारूँ रे ॥ १ ॥
तेरा अँगना पेखौँ रे, तेरा मुखड़ा देखौँ रे,
तब जीवन लेखौँ रे ॥ २ ॥
मिलि सुखड़ा दीजै रे, यह लाहड़ा३ लीजै रे,
तुम देखैँ जीजै रे ॥ ३ ॥
तेरे प्रेम की माती रे, तेरे रगड़े राती रे,
दादू वारणै जाती रे ॥ ४ ॥
(१) शरीर । (२) मन की तरंगें मर गई हैं । (३) लाभ ।