संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 100, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ६१
जिन यहु भार उठाइया, निरवाहै सोई ।
दादू छिन न बिसारिये, ता थैं जीवन होई ॥ ४ ॥
॥ नाम और सुमिरन ॥
(१)
नाँउ रे नाँउ रे, सकल सिरोमणि नाँउ रे,
मैं बलिहारी जाऊँ रे ॥ टेक ॥
दूतर तारै पारि उतारै, नरक निवारै नाँउ रे ॥ १ ॥
तारणहारा भौजल पारा, निर्मल सारा नाँउ रे ॥ २ ॥
नूर दिखावै तेज मिलावै, जोति जगावै नाँउ रे ॥ ३ ॥
सब सुख दाता अमृत राता, दादू माता नाँउ रे ॥ ४ ॥
(२)
मनाँ भजि राम नाम लीजे ।
साध संगति सुमिरि सुमिरि, रसना रस पीजे ॥ टेक ॥
साधू जन सुमिरण करि, केते जपि जागे ।
अगम निगम अमर किये, काल कोइ न लागे ॥ १ ॥
नीच ऊँच चिंतन करि, सरणागति लीये ।
भगति मुकति अपणी गति, ऐसैं जन कीये ॥ २ ॥
केते तिरि तीर लागे, बंधन भव छूटे ।
कलिमल विष जुग जुग के, राम नाम खूटे¹ ॥ ३ ॥
भरम करम सब निवारि, जीवन जपि सोई ।
दादू दुख दूर-करण, दूजा नहिं कोई ॥ ४ ॥
॥ चितावनी ॥
(१)
मन रे राम बिना तन छीजै ।
जब यहु जाइ मिलै माटी मैं, तब कहु कैसैं कीजै ॥टेक॥
पारस परसि कंचन करिलीजै, सहज सुरति सुखदाई ।
माया बेलि बिषै फल लागे, ता परि भूलिन भाई ॥१॥
(१) दूर किये, खतम किये ।