संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ८५
(१०)
अस कछु समुझि परै रघुराया ।
बिन तव कृपा दयाल दास हित, मोह न छूटै माया ॥१॥
वाक्य ज्ञान अत्यन्त निपुन, भव पार न पावै कोई ।
निसि गृह मध्य दीप की बातन, तम निवृत्त नहिँ होई ॥२
जैसे कोउ इक दीन दुखित अति, असन-हीन१ दुख पावै ।
चित्र कल्पतरु कामधेनु गृह, लिखे न बिपति नसावै ॥३॥
षट रस बहु प्रकार भोजन कोउ, दिन अरु रैन बखानै ।
बिन बोले सन्तोष-जनित सुख२, खाइ सोई पै जानै ॥४॥
जबलगि नहिँ निज हृदे प्रकास, अरु बिषय आस मनमाहीं।
तुलसिदास तब लगि जग जोनि, भ्रमत सपनेहुँसुखनाहीँ ॥५
(११)
वेद न पुरान गान जानेाँ न बिज्ञान ज्ञान,
ध्यान धारना समाधि साधन प्रबीनता ॥ १ ॥
नाहिँन बिराग जोग जाग भाग तुलसी के,
दया दान दूबरो हौँ, पाप ही की पीनता३ ॥२॥
लोभ मोह काम कोह४, दोष कोष मो साँ कौन,
कलि५ हूँ जो सीखि लई मेरी ये मलीनता ॥ ३ ॥
एक ही भरोसो राम रावरेा कहावत हौँ,
रावरे दयाल दीन-बंधु मेरी हीनता ॥ ४ ॥
(१२)
स्वारथ को साज न समाज परमारथ को,
मो साँ दगाबाज दूसरो न जग जाल है ॥ १ ॥
(१) अहार बिना। (२) जो सुख संतोष से उत्पन्न हुआ अर्थात रसोला
भोजन करने का आनंद । (३) मुटाई । (४) क्रोध । (५) कलियुगं ।