संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 108, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंराग सारंग ६६
॥ उपदेश ॥
(१)
जिंदरा मेरे सुमिर सार, काम क्रोध मद तजि बिकार ॥टेक॥
तूँ जिनि भूले मन गँवार, सिर भार न लीजै मानि हार ॥१॥
सुणि समझायौ बारवार, अजहूँ न चेतै हो हुसियार ॥२॥
करि तैसैं भव तिरिये पार, दादू इव थैं यहि बिचार ॥३॥
(२)
डरिये रे डरिये, परमेसुर थैं डरिये रे ।
लेखा लेवै भरि भरि देवै, ता थैं बुरा न करिये रे ॥टेक॥
साचा लीजी साचा दीजी, साचा सौदा कीजो रे ।
साचा राखी झूठा नाखी, विष ना पीजो रे ॥ १ ॥
निर्मल गहिये निर्मल रहिये, निर्मल कहिये रे ।
निर्मल लीजी निर्मल दीजी, अनत न बहिये रे ॥ २ ॥
साह पठाया वनिज न आया, जिनि डहकावै रे ।
झूठ न भावै फेरि पठावै, कीया पावै रे ॥ ३ ॥
पंथ दुहेला जाइ अकेला, भार न लीजी रे ।
दादू मेला होइ सुहेला, सो कुछ कीजो रे ॥ ४ ॥
॥ मन ॥
(१)
मन चंचल मेरो कह्यौ न मानै, दसौँ दिसा दौरावै रे ।
आवत जात बार नहिं लागै, बहुत भाँति बौरावै रे ॥टेक॥
बेर बेर वरजत या मन कौँ, किंचित सीख न मानै रे ।
ऐसैं निकसि जात या तन थैं, जैसैं जीव न जानै रे ॥१॥
कोटिक जतन करत या मन कौँ, निहचल निमिष न होई रे ।
चंचल चपल चहूँ दिसि भरमै, कहा करै जन कोई रे ॥२॥
सदा सोच रहत घट भीतरि, मन थिर कैसैं कीजै रे ।
सहजैँ सहज साध की संगति, दादू हरि भजि लीजै रे ॥३॥