संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ दादू दयाल
जब लग प्राण प्यंड है नीका, तब लग ताहि जिनि भूलै ।
यहु संसार सैंबल१ कै सुख ज्यूँ, ता पर तूँ जिनि फूलै ॥२॥
औसर येह जानि जग जीवन, समझि देखि सचु पावै ।
अंग अनेक आन मति भूलै, दादू जिनि दहकावै२ ॥३॥
(२)
सजनी रजनी घटती जाइ ।
पल पल छीजै अवधि दिन आवै, अपनौँ लाल मनाइ ॥टेक
अति गति नींद कहा सुख सोवै, यहु औसर चलि जाइ ।
यहु तन बिछुरैं बहुरि कहँ पावै, पीछैं ही पछिताइ ॥१॥
प्राणपति जागै सुंदरि क्यौं सोवै, उठि आतुर गहि पाँइ ।
कोमल बचन करुणा करि आगैँ, नख सिख रहु लपटाइ ॥२॥
सखी सुहाग सेज सुख पावै, प्रीतम प्रेम बढ़ाइ ।
दादू भाग बड़े पिव पावै, सकल सिरोमणि राइ ॥ ३ ॥
(३)
कागा रे करंक परि बोलै ।
खाइ माँस अरु लगहीं३ डोलै ॥ टेक ॥
जा तन कौँ रचि अधिक सँवारा ।
सो तन ले माटी मैं डारा ॥ १ ॥
जा तन देखि अधिक नर फूले ।
सो तन छाड़ि चल्या रे भूले ॥ २ ॥
जा तन देखि मन मैं गरबाना ।
मिलि गया माटी तजि अभिमाना ॥ ३ ॥
(१) सेमर एक वृक्ष होता है जिस के बड़े सुंदर लाल फूल देख कर सुवा
मगन होता है पर फल पर चोंच मारने से केवल रुई उसके भीतर से निकलती है।
(२) ठगावै । (३) निकट ।