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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 267 में से

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पृष्ठ 109

१०० दादू दयाल
(२)
मेरे तुम्हौं राखणहार, दूजा को नहीं ।
ये चंचल चहुँ दिसि जाइ, काल तहाँ तहाँ ॥ टेक ॥
मैं केते किये उपाइ, निहचल ना रहै ।
जहाँ बरजौं तहँ जाइ, मदमाता बहै ॥ १ ॥
जहाँ जाणै तहँ जाइ, तुम थैं ना डरै ।
ता स्यूँ कहा बसाइ, भावै त्यूँ करै ॥ २ ॥
सकल पुकारैं साध, मैं केता कह्या ।
गुर अंकुस मानै नाहिं, निरभै ह्वै रह्या ॥ ३ ॥
तुम बिन और न कोइ, इस मन को गहै ।
तूं राखै राखणहार, दादू तौ रहै ॥ ४ ॥
॥ जगत-मिथ्या ॥
मन रे तूँ देखै सो नाहीं, है सो अगम अगोचर माहीं ॥टेक
निस अँधियारी कछू न सूझै, संसै सरप दिखावा ।
ऐसैं अंध जगत नहिं जानै, जीव जेवड़ी¹ खावा ॥ १ ॥
मृग-जल देखि तहाँ मन धावै, दिन दिन झूठी आसा ।
जहँ जहँ जाइ तहाँ जल नाहीं, निहचै मरै पियासा ॥२॥
भरम बिलास बहुत बिधि कीन्हा, ज्यौं सुपिनैं सुख पावै ।
जागत झूठ तहाँ कुछ नाहीं, फिरि पीछैं पछितावै ॥३॥
जब लग सूता तब लग देखै, जागत भरम बिलाना ।
दादू अंति इहाँ कुछ नाहीं, है सो सोधि सयाना ॥ ४ ॥
॥ करम धरम ॥
मूल सींचि बघै² ज्यूँ बेला । सो तत तरवर रहै अकेला ॥टेक॥
देवी देखत फिरैं ज्यूँ भूले । खाइ हलाहल बिख कौँ फूले ।
सुख कौँ चाहै पड़ै गल पासी³। देखत हीरा हाथ थैं जासी ॥१॥
(१) रस्सी । (२) बढ़ै । (३) फाँसी ।