संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ६३
दादू तन की कहा बड़ाई ।
निमख माहिँ माटी मिलि जाई ॥ ४ ॥
॥ विरह ॥
(१)
कौण विधि पाइये रे, मीत हमारा सोइ ॥ टेक ॥
पास पीव परदेस है रे, जब लग प्रगटै नाहिं ।
बिन देखे दुख पाइये, यहु सालै मन माहिँ ॥ १ ॥
जब लग नैन न देखिये, परगट मिलै न आइ ।
एक सेज संगहि रहै, यहु दुख सह्या न जाइ ॥ २ ॥
तब लग नेड़े दूरि है, जब लग मिलै न मोहिँ ।
नैन निकट नहिँ देखिये, संगि रहे क्या होइ ॥ ३ ॥
कहा करौँ कैसे मिलै रे, तलफै मेरा जीव ।
दादू आतुर विरहनी, कारण अपने पीव ॥ ४ ॥
(२)
अजहुँ न निकसै प्राण कठोर ॥ टेक ॥
दरसन बिना बहुत दिन बीते, सुंदर प्रीतम मोर ॥ १ ॥
चारि पहर चारौँ जुग बीते, रैनि गँवाई भोर ॥ २ ॥
अवधि गई अजहूँ नहिँ आये, कतहूँ रहे चित चोर ॥३॥
कबहूँ नैन निरखि नहिँ देखे, मारग चितवत तोर ॥४॥
दादू ऐसे आतुर विरहणि, जैसे चंद चकोर ॥ ५ ॥
(३)
कतहूँ रहे हो बिदेस, हरि नहिँ आये हो ।
जनम सिरानी जाइ, पिव नहिँ पाये हो ॥ टेक ॥
बिपति हमारी जाइ, हरि सौँ को कहै हो ।
तुम्ह बिन नाथ अनाथ, बिरहनि क्यूँ रहै हो ॥ १ ॥