संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ गुसाईं तुलसीदासजी
कौन आयो करौ न करौंगो करतूति भलि,
लिखो न विरंचिहूँ१ भलाई मोरे भाल२ है ॥२॥
रावरी सपथ३ राम नाम ही की गति मेरे,
इहाँ झूठो झूठो सो तिलोक तिहूँ काल है ॥३॥
तुलसी को भलो पै तुम्हारे ही किये कृपाल,
कीजै न बिलंब बलि पानी भरी खाल है ॥४॥
(१३)
केहि कहौं बिपति अति भारी, खोरघुबीर धीरहितकारी॥१
मम हृदय भवन प्रभु तोरा, तहँ बसे आइ बहु चोरा ॥ २ ॥
अतिकठिन करहिं बरजोरा, मानहिं नहिं बिनय निहोरा३
तम मोह लोभ अहंकारा, मद क्रोध बोध४ रिपु मारा ॥४॥
अति करहिं उपद्रव नाथा, मर्दहिं मोहिं जानि अनाथा ५
मैं एक अमित५ बटपारा, कोउ सुनै न मोर पुकारा ॥६॥
भागेहुँ नहिं नाथ उबारा, रघुनायक करहु सँभारा ॥ ७ ॥
कह तुलसिदास सुनु रामा, लूटहिं तस्कर तव धामा६ ॥८॥
चिंता यहि मोहिं अपारा, अपजस नहिं होहि तुम्हारा ॥९
(१४)
ऐसी मूढ़ता या मन की ॥ टेक ॥
परिहरि राम भक्ति सुरसरिता७,आस करत ओसकन८ की॥१
धूम समूह निरखि चातक ज्यौं, तृषित जानि मति घन९की २
नहिं तहँ सीतलता न बारि पुनि, हानि होत लोचन की ॥३
(१) ब्रह्मा। (२) माथा। (३) क़सम। (४) बुद्धि, समझ। (५) अनेक। (६) मेरा
हृदय जो हे प्रभु तुम्हारा मन्दिर है यह ठग लूट रहे हैं। (७) गंगा। (८) ओस की
बूँद। (६) बादल।