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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 267 में से

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पृष्ठ 96

शब्द संग्रह ८७
ज्यौँ गच काँच विलोकि सेन जड़, छाँह आपने तन की ॥४
टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की ॥५१
कहँ लग कहौं कुचाल कृपा-निधि, जानत हौ गति जन की ६
तुलसिदास प्रभु हरौ दुसह दुख, लाज करो निज पन की ॥७
(१५)
कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो ।
श्रीरघुनाथ कृपालु कृपा तैं, सन्त सुभाव गहौंगो ॥ १ ॥
जथा लाभ सन्तोष सदा, काहू सौं कछु न चहौंगो ।
परहित परत निरन्तर मन, क्रम बचन नेम निबहौंगो ॥२॥
परुष२ बचन अति दुसह३ श्रवन सुनि, तेहि पावक न दहौंगो।
विगत४ मान सम सीतल मन, परगुन नहिँ दोष कहौंगो ३
परिहरि देह-जनित५ चिन्ता दुख, सुख सम बुद्धि सहौंगो ।
तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि के, अविचल भक्ति लहौंगो ॥४
॥ उपदेश ॥
(१)
जा के प्रिय न राम बैदेही ।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ॥१॥
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरथ महतारी ।
बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज बनिता, भये जग मंगलकारी ॥२॥
नाते नेह राम के मनियत, सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं ।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं ॥३॥
तुलसी सो सब भाँति परम हित, पूज्य प्रान तैं प्यारो ।
जा सौं होय सनेह राम पद, एतो मतो हमारो ॥४॥
(१) जैसे शीशा की गच में अज्ञान बाज़ चिड़िया (श्येन) अपने शरीर की
छाया देख कर दूसरी चिड़िया का भ्रम कर के अपने मुँह (आनन) में घाव
(छति) लगने का डर छोड़ कर भूख बस टूट पड़ता है। (२) कट्टु, कड़ा ।
(३) असह, सहने योग्य नहीं । (४) मृत, बीता हुआ । (५) देह से उत्पन्न हुई ।