संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० दादू दयाल
॥ मिश्रित ॥
ममता तू न गई मेरे मन तैं ॥ टेक ॥
पाके केस जन्म के साथी, लाज गई लोकन तैं ।
तन थोके कर करूपन लागे, जोति गई नैनन तैं ॥ १ ॥
सरवन वचन न सुनत काहु के, बल गये सब इंद्रिन तैं ।
टूटे दसन बचन नहिं आवत, सोभा गई मुखन तैं ॥२॥
कफ पित बात कंठ पर बैठे, सुत हिँ बुलावत कर तैँ ।
भाइ बन्धु सब परम पियारे, नारि निकारत घर तैं ॥३॥
जैसे ससि मंडल बिच स्याही, छुटे न कोटि जतन तैं ।
तुलसिदास बलि जाउँ चरन के, लोभ पराये धन तैं ॥४॥
दादू दयाल
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो पृष्ठ ७६ संतवानी संग्रह भाग १ ]
॥ सर्व समरथ ॥
जिनि सत छाड़ै बावरे, पूरिक है पूरा ।
सिरजे की सब चिंत है,१ देवे कौँ सूरा ॥ टेक ॥
गर्भ बास जिन राखिया, पावक थैं न्यारा ।
जुगति जतन करि सीँचिया, दे प्राण अधारा ॥ १ ॥
कुंज कहाँ घरि संचरै,२ तहँ को रखवारा ।
हेम हरत जिन राखिया,३ सो खसम हमारा ॥ २ ॥
जल थल जीव जिते रहैं, सो सब कौँ पूरै ।
संपट सिला मैं देत है, काहे नर झूरै४ ॥ ३ ॥
(१) उसे सारी रचना की चिंता है। (२) अंडे को सेवै—कहते हैं कि कुंज
चिड़िया दूर रह कर सुरत से अंडे को सेती है। (३) श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को हिमालय
पर्वत पर बर्फ़ में गलने से बचा लिया था। (४) मालिक दो पत्थरों की संधि
मे बंद जीव जंतु की ख़बर लेता है तो हे नर तू क्यों सोच करता है।