संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ गुसाईँ तुलसीदासजी
हौँ आरत¹ आरत-नासन तुम्ह,
कीरति निगम पुरानन गाई ।
हौँ सभीत² तुम हरन सकल भय,
कारन कवन कृपा बिसराई ॥ ३ ॥
तुम सुखधाम राम श्रमभंजन³,
हौँ अति दुखित त्रिबिध श्रम⁴ पाई ।
यह जिय जानि दास तुलसी कहँ,
राखहु सरन समुझि प्रभुताई ॥ ४ ॥
(६)
जो पै दूसरो कोउ होइ ।
तो हौँ बारहिँ बार प्रभु, कत दुख सुनावौँ रोइ ॥ १ ॥
काहि ममता दीन पर, को पतित-पावन नाम ।
पाप-मूल अजामिल हिँ, केहि दियो अपनो धाम ॥ २ ॥
रहे सम्भु बिरंचि सुरपति, लोक-पाल अनेक ।
सोक सरि बूड़त करीसहिँ, दई काहु न टेक⁵ ॥ ३ ॥
बिलखि भूपति सदसि महँ, नरनारि कह प्रभु पाहि ।
सकल समरथ सरन काहु न, बसन दीन्हौँ ताहि⁶ ॥ ४ ॥
एक मुख क्यौँ कहौँ, करुना-सिन्धु के गुन गाथ⁷ ।
भक्तहित धरि देह' काह न, कियो कोसल-नाथ ॥ ५ ॥
आप से कहिँ सौंपिये मोहिँ, जो पै अतिहिँ घिनात ।
दासतुलसी और बिधि क्यौँ, चरन परिहरि⁸ जात ॥६॥
(१) दीन दुखी । (२) भयमान । (३) क्लेश-नाशक । (४) त्रय ताप ग्रसित ।
(५) शोक की नदी में डूबते हुए गजेन्द्र को किसी ने सहारा नहीं दिया ।
(६) नरनारी अर्थात द्रोपदी की जब राज सभा में सारी खींची गई और वह
बिलख कर त्राहि २ पुकारी और तुम्हारी शरन ली तो तुम्हारे सिवाय किस ने
उस को वस्त्र दिया । (७) गाय कर । (८) अयोध्या के राजा श्रीरामचंद्र ।
(६) छोड़ कर ।