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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

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कबीर साहिब ५
(४)
बीती बहुत रहि थोरी सी ॥ टेक ॥
खाट पड़े नर झीँखन लागे, निकसि प्रान गयो चोरी सी॥१
भाई बंद कुटुँब सब आये, फूँक दियो मानो होरी सी ॥२
कहै कबीर सुनो भइ साधो, सिर पर देत हैं भौँरी सी ॥३॥
(५)
तौरी गठरी मैं लागे चोर, बटोहिया का रे सोवै ॥टेक॥
पाँच पचीस तीन हैं चुरवा, यह सब कीन्हा सोर-
बटोहिया का रे सोवै ॥१॥
जागु सबेरा बाट अनेड़ा, फिर नहिँ लागे जोर-
बटोहिया का रे सोवै ॥२॥
भवसागर इक नदी बहुतु है, बिन उतरे जाव बोर¹-
बटोहिया का रे सोवै ॥३॥
कहै कबीर सुनो भइ साधो, जागत कीजे भोर-
बटोहिया का रे सोवै ॥४॥
(६)
करम गति टारे नाहिँ टरी ॥ टेक ॥
मुनि बसिस्ट से पंडित ज्ञानी, सोधि के लगन धरी ।
सीता हरन मरन दसरथ को, बन मैं बिपति परी²॥१॥
कहँ वह फंद कहाँ वह पारधि,³ कहँ वह मिरग चरी²।
सीता को हरि लेगयो रावन, सोने की लंक जरी² ॥२॥
(१) बूड़, डूब । (२) रामचन्द्र जी का बनवास, उनके पिता दसरथ का उनके
वियोग में प्रान तजना, मारीच को म्रिगा बना कर रावन का सीताजी को चुरा
ले जाना, और फिर रामचन्द्र का रावन को मारना और लंका को जलाना यह
कथा प्रायः सब लोग जानते हैं । (३) शिकारी ।