संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ शब्द संग्रह
(२)
तोहिँ मोरी लगन लगाये रे फकिरवा ॥ टेक ॥
सोवत ही मैं अपने मंदिर मैं, सबदन मारि जगाये रे (फ०) १
बूड़त ही भव के सागर मैं, वहियाँ पकरि समुझाये रे (फ०) २
एकै बचन बचन नहिं दूजा, तुम मो से बंद छुड़ाये रे (फ०) ३
कहै कबीर सुनो भइ साधो, सत्तनाम गुन गाये रे (फ०) ४
(३)
सतगुरु हैं रँगरेज, चुनर मेरी रँगि डारी ॥ टेक ॥
स्याही रंग छुड़ाइ के रे, दियो मजीठा रंग ।
धोये से छूटै नहीं रे, दिन दिन होत सुरंग ॥ १ ॥
भाव के कुंड नेह के जल मैं, प्रेम रंग दइ बोर ।
चसकी चास लगाइ के रे, खूब रँगी झकझोर ॥ २ ॥
सतगुरु ने चुनरी रँगी रे, सतगुरु चतुर सुजान ।
सब कछु उन पर वार दूँ रे, तन मन धन औ प्रान ॥ ३ ॥
कह कबीर रँगरेज गुरु रे, मुझ पर हुए दयाल ।
सीतल चुनरी ओढ़ि के रे, भइहैं मगन निहाल ॥ ४ ॥
॥ नाम ॥
(१)
अजर अमर इक नाम है, सुमिरन जो आवै ॥ टेक ॥
बिनहीं मुख के जप करो, नहिं जीभ डुलावो ।
उलटि सुरत ऊपर करो, नैनन दरसावो ॥ १ ॥
जाहु हंस पच्छिम दिसा, खिरकी खुलवावो ।
तिरबेनी के घाट पर, हंसा नहवावो ॥ २ ॥