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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

७० मीरा बाई
(२)
नीँदलड़ी नहिँ आवै सारी रात, किस बिध होइ परभात¹॥टेक
चमक² उठी सपने सुध भूली, चंद्र कला न सुहात ।
तलफ तलफ जिव जाय हमारो, कब रे मिलै दोना-नाथ ॥
भइ हूँ दिवानी तनसुध भूली, कोई न जानी म्हाँरी बात ।
मीरा कहै बीती सोइ जानै, मरन जीवन उन हाथ ॥२॥
(३)
नैना म्हारे बान पड़ी, साँई मोहिँ दरस दिखाई ॥ टेक ॥
चित्त चढ़ी मेरे माधुरि मूरत, उर विच आन अड़ी ॥१॥
कैसे प्रान पिया बिनु राखूँ, जीवन मूर जड़ी³ ॥ २ ॥
कब की ठाढ़ी पंथ निहारूँ, अपने भवन खड़ी ॥ ३ ॥
मीरा प्रभु के हाथ बिकानी, लोक कहै बिगड़ी ॥ ४ ॥
(४)
माई म्हाँरी हरि न बूझी बात ।
पिंड मैँ से प्राण पापी, निकस क्यूँ नहिँ जात ॥ १ ॥
रैन अँधेरी बिरह घेरी, तारा गिणत निस जात ।
ले कटारी कंठ चीरूँ, करूँगी अपघात ॥ २ ॥
पाट⁴ न खोल्या मुखाँ न बोल्या, साँझ लग परभात ।
अबोलना मैँ अवध बीती, काहे की कुसलात ॥ ३ ॥
सुपन मैँ हरि दरस दीन्हौँ, मैँ न जाग्यो हरि जात ।
नैन म्हाँरा उघड़⁵ आया, रही मन पछतात ॥ ४॥
आवन आवन होय रह्यो रे, नहिँ आवन की बात ।
मीरा ब्याकुल बिरहनी रे, बाल ज्यौँ बिल्लात ॥ ५ ॥
(५)
घड़ी एक नहिँ आवड़े⁶, तुम दरसन बिन मोय ।
तुम ही मेरे प्राण जी, का सूँ जीवन होय ॥ १ ॥
(१) सवेरा । (२) चौंक । (३) बूटी । (४) परदा । (५) खुल गया । (६) सुहावै ।

धान१ न भावै नींद न आवै, विरह सतावै मोय।
घायल सी घूमत फिरूँ रे, मेरा दरद न जाने कोय ॥२॥
दिवस तो खाय गमाइयो रे, रैन गमाई सोय।
प्राण गमायो झूरताँ२ रे, नैन गमाई रोय ॥ ३ ॥
जो मैं ऐसा जानती रे, प्रीत किये दुख होय।
नगर ढँढोरा फेरती रे, प्रीत करो मत कोय ॥ ४ ॥
पंथ निहारूँ डगर बुहारूँ, ऊबी३ मारग जोय।
मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम मिलियाँ सुख होय ॥५॥
(६)
मैं अपने सैयाँ सँग साची।
अब काहे की लाज सजनी, प्रगट ह्वै नाची ॥ १ ॥
दिवस भूख न चैन कबहिन, नींद निसु नासी।
बेध वार को पार होइगो, ज्ञान गुह४ गाँसी ॥ २ ॥
कुल कुटुँब सब आनि बैठे, जैसे मधु मासी५।
दास मीरा लाल गिरधर, मिटी जग हाँसी ॥ ३ ॥
(७)
नातो६ नाम को मो सूँ, तनक न तोड़्यो जाय ॥ टेक ॥
पानाँ ज्यूँ पीली पड़ी रे, लोग कहै पिंड रोग।
छाने७ लाँघन८ मैं किया रे, राम मिलन के जोग ॥ १ ॥
बाबल९ बैद बुलाइया रे, पकड़ दिखाई म्हाँरी बाँह१०।
मूरख बैद मरम नहिँ जाने, करक११ कलेजे माँह ॥ २॥
जाओ बैद घर आपने रे, म्हाँरो नाँव न लेय।
मैं तो दाधी१२ विरह की रे, काहे कूँ औषध१३ देय ॥ ३॥


शब्दार्थ / पाद-टिप्पणी:

(१) अन्न। (२) बिलक बिलक कर। (३) खड़ी। (४) गुप्त। (५) शहद की
मक्खी। (६) रिश्ता। (७) छिप कर। (८) फ़ाक़ा। (९) बाप। (१०) नाड़ी।
(११) दर्द। (१२) जली हुई। (१३) दवा।

७२ मीरा बाई
माँस-गलि गलि छीजिया रे, करक रह्या गल आहि १ ।
आँगुलियाँ की मूँदड़ी, म्हाँरे आवन लागी बाँहि ॥४॥
रहु रहु पापी पपीहा रे, पिव को नाम न लेय ।
जे कोइ बिरहन साम्हले २, तो पित्र कारन जिव देय ॥५॥
खिन मन्दिर खिन आँगने रे, खिन खिन ठाढ़ी होय ।
घायल ज्यूँ घूमूँ खड़ी, म्हाँरी विथा न बूझे कोय ॥६॥
काढ़ि कलेजो मैं धरूँ रे, कौवा तू ले जाय ।
ज्याँ देखाँ म्हाँरो पिव बसै रे, वे देखत तू खाय ॥७॥
म्हाँरे नातो नाम को रे, और न नातो कोय ।
मीरा ब्याकुल बिरहनी रे, पिय दरसन दीज्यो मोय ॥८॥
(८)
दरस बिन दूखन लागे नैन ॥ टेक ॥
जब से तुम बिछरे मेरे प्रभुजी, कबहुँ न पायौँ चैन ॥१॥
सबद सुनत मेरी छतिया कंपै, मीठे लगे तुम वैन ॥२॥
एक टकटकी पंथ निहारूँ, भई छमासी रैन ॥३॥
बिरह बिथा कासूँ कहूँ सजनी, बह गइ करवत ऐन ॥४॥
मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटन सुख देन ॥५॥
(९)
मतवारो बादल आयो रे,
हरि को सँदेसो कुछ नहिँ लायो रे ॥ टेक ॥
दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल सबद सुनायो रे ।
कारी अँधियारी बिजली चमके, बिरहन अति डरपायो रे ॥१
गाजे बाजे पवन मधुरिया, मेहा अति झड़ लायो रे ।
फूँके ३ काली नाग बिरह की जारी, मीरा-मन हरि भायो रे ॥२
(१) हाड़। (२) सुन पावै। (३) साँप फूपकार मारता है।

शब्द संग्रह ७३
(१०)
होली
रमैया बिन नींद न आवे ।
नींद न आवे बिरह सतावे, प्रेम की आँच दुलावे१ ॥टेक॥
बिन पिया जोत मंदिर अँधियारो, दीपक दाय२ न आवे।
पिया बिना मेरी सेज अलूनी३, जागत रैन बिहावे४,
पिया कब रे घर आवे ॥१॥
दादुर स़ोर पपीहा बोले, कोयल सबद सुनावे ।
घुमँड़ घटा ऊलर५ होइ आई, दामिनि दमक डरावे,
नैन झर लावे ॥२॥
कहा करूँ कित जाउँ मोरी सजनो, बेदन कून बुतावे६ ।
बिरह नागिन मोरी काया डसी है, लहर लहर जिव जावे,
जड़ी घस लावे ॥ ३ ॥
को है सखी सहेली सजनी, पिया कूँ आन मिलावे ।
मीरा कूँ प्रभु कब रे मिलोगे, मनमोहन मोहिँ भावे,
कबै हँस करि बतलावे७ ॥ ४ ॥
(११)
होली
होली पिया बिन मोहिँ न भावै, घर आँगन न सुहावै ॥टेक॥
दीपक जोय कहा करूँ हेली, पिय परदेस रहावे ।
सूनी सेज जहर ज्यूँ लागे, सुसक सुसक जिय जावे,
नींद नैन नहि आवे ॥ १ ॥
कब की ठाढ़ी मैं मग जोऊँ, निस दिन बिरह सतावे ।
कहा कहूँ कछु कहत न आवे, हिवड़ो अति अकुलावे,
पिया कब दरस दिखावे ॥ २ ॥
(१) सुलगाना । (२) पसंद । (३) फीकी । (४) बीते । (५) चढ़ना । (६)
बुझावे, शांत करे । (७) बोले ।
१०

७४ मीरा बाई
ऐसा है कोइ परम सनेही, तुरत सँदेसा लावै ।
वा विरियाँ कब होसी मो कूँ, हँस करि निकट बुलावै
मीरा मिलि होरी गावै ॥ ३ ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
आली साँवरे कि दृष्टि, मानो प्रेम की कटारी है ॥टेक।
लागत बेहाल भई, तन की सुधि बुद्धि गई ।
तन मन ब्यापो प्रेम मानो मतवारी है ॥ १ ॥
सखियाँ मिलि दोइ चारी, बावरी सी भई न्यारी ।
हौँ१ तो वा को नीके जानौँ, कुंज को बिहारी है ॥२॥
चंद को चकोर चाहै, दीपक पतंग दाहै ।
जल बिना मीन जैसे, तैसे प्रीत प्यारी है ॥३॥
बिनती करौँ हे स्याम, लागौँ मैं तुम्हारे पास२ ।
मीरा प्रभु ऐसे जानो, दासी तुम्हारी है ॥ ४ ॥
(२)
जावो हरि निरमोहड़ा३ रे, जानी थाँरी प्रीत ॥ टेक ॥
लगन लगी जब और प्रीत छी४, अब कुछ अँवलो५ रीत ॥१॥
अमृत पाय बिषै क्यूँ दीजे, कौन गाँव की रीत ॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर, आप गरज के मीत ॥३॥
(३)
जब से मोहिँ नंद नँदन दृष्टि पड़्यो माई ।
तब से परलोक लोक कछू ना सुहाई ॥ १ ॥
मोरन की चंद्र कला सीस मुकुट सोहै ।
केसर को तिलक भाल तीन लोक मोहै ॥ २ ॥
।(१) मैं । (२) पाँव । (३) निरमोही । (४) थी । (५) उलटा ।

शब्द संग्रह ७५
कुंडल की अलक झलक कपोलन पर छाई ।
मनो१ मीन सरवर तजि सकर२ मिलन आई ॥ ३ ॥
कुटिल भृकुटि३ तिलक भाल चितवन मैँ टोना ।
खंजन४ अरु मधुप५ मीन भूले मृग छौना६ ॥ ४ ॥
सुंदर अति नासिका सुग्रीव७ तीन रेखा ।
नटवर८ प्रभु भेष धरे रूप अति विसेषा ॥ ५ ॥
अधर बिंब अरुन नैन मधुर मंद हाँसी ।
दसन६ दमक दाड़िम१० दुति११ चमके चपला१२ सी ॥ ६ ॥
छुद्र घंट किंकिनी१३ अनूप धुनि सुहाई ।
गिरधर के अंग अंग मीरा बलि जाई ॥ ७ ॥
(४)
या मोहन के मैं रूप लुभानी ॥ टेक ॥
हाट बाट मोहिँ रोकत टोकत,
या रसिया की मैं सार न जानी ॥ १ ॥
सुंदर बदन कमल-दल लोचन,
बाँकी चितवन मंद मुसकानी ॥ २ ॥
जमुना के नीरे तीरे धेनु चरावत,
बंसी मैं गावत मीठी बानी ॥ ३ ॥
तन मन धन गिरधर पर वारूँ,
चरन कमल मीरा लपटानी ॥ ४ ॥


(१) मानो, गोया कि । (२) मगर । (३) भौँ । (४) खेड़रिच चिड़िया । (५)
भौंरा । (६) बच्चा । (७) सुंदर गला । (८) नट के समान काछनी काछे ।
(६) दाँत । (१०) अनार । (११) प्रकाश । (१२) बिजली । (१३) छोटी छोटी घंटियाँ
जो करधनी में पोह देते हैं ।

७६ मीरा बाई
(५)
निपट बंकट¹ छबि, अटके मेरे नैना ॥ टेक ॥
देखत रूप मदन मोहन को, पियत पीयूष² न मटके³ ॥१॥
बारिजें⁴ भँवाँ अलक⁵ टेढ़ी मनो, अति सुगंधि रस अटके ॥
टेढ़ी कटि⁶ टेढ़ी कर मुरली, टेढ़ी पाग लर⁷ लटके ॥३॥
मीरा प्रभु के रूप लुभानी, गिरधर नागर नट के ॥४॥
(६)
बरखे बदरिया सावन की, सावन की मन भावन की ॥टेक॥
सावन मैं उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की ॥१॥
उमड़ घुमड़ चहुँ दिस से आयो,दामिन दमके झरलावन की ॥२॥
नन्ही नन्ही बूँदन मेहा बरसे, सीतल पवन सुहावन की ॥३॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, आनँद मंगल गावन की ॥४॥
॥ बिनय ॥
(१)
पियां मोहिं आरत तेरी हो ।
आरत तेरे नाम की मोहिं साँझ सबेरी हो ॥ १ ॥
या तन को दियना करैँ मनसा करैँ बाती हो ।
तेल भरावैँ प्रेम का बारौँ दिन राती हो ॥ २ ॥
पटियाँ पारौँ गुर ज्ञान की सुमति माँग सवारौँ हो ।
पिया तेरे कारने धन जोबन वारौँ हो ॥ ३ ॥
सेजड़िया बहु-रंगिया चंगा फूल बिछाया हो ।
रैन गई तारा गिणत प्रभु अजहुँ न आया हो ॥ ४ ॥
सावन भादौँ ऊमड़ो बरखा रितु छाई हो ।
भौंह घटा घन घेरि के नैनन भरि लाई हो ॥ ५ ॥
(१) बाँकी । (२) अमृत । (३) मुड़े । (४) कँवल । (५) बाल की लट । (६)
कमर । (७) पेंच ।

शब्द संग्रह ७७
मात पिता तुम को दियो तुम हीं भल जानो हो१ ।
तुम तजि और भतार को मन मैं नहिँ आनेौँ हो ॥ ६॥
तुम हो पूरे साइयाँ पूरन पद दीजै हो ।
मीरा ब्याकुल बिरहनी अपनी करि लीजै हो ॥ ७ ॥
(२)
तुम पलक उघाड़े दीनानाथ, हूँ हाजिर नाजिर कब की खड़ी ॥टेक
साऊ२ थे दुसमन होइ लागे, सब ने लगूँ कड़ी३ ।
तुम बिन साऊ कोऊ नहीं है, डिगी४ नाव मेरी समँद अड़ी १
दिन नहिँ चैन रात नहिँ निदरा, सूखूँ खड़ी खड़ी ।
बान बिरह के लगे हिये मैं, भूलूँ न एक घड़ी ॥२।
पत्थर की तो अहिल्या तारी, बन के बीच पड़ी ।
कहा बोझ मीरा मैं कहिये, सौ ऊपर एक धड़ी५ ॥३॥
गुरु रैदास मिले मोहिँ पूरे, धुर से कलम भिड़ी ।
सतगुरु सैन दई जब आ के, जोत मैं जोत रली ॥४॥
॥ उपदेश ॥
राम नाम रस पीजे मनुवाँ, राम नाम रस पीजे ॥टेक॥
तज कुसंग सतसंग बैठ नित, हरि चरचा सुण लीजे ॥१॥
काम क्रोध मद लोभ मोह कूँ, चित से बहाय दीजे ॥२॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, ताहि के रँग मैं भींजै ॥३॥
(१) देखो जीवन-चरित्र मीरा बाई का उनकी शब्दावली के ग्रंथ में।
(२) रक्षक। (३) कड़वी। (४) झकोला खाती है। (५) पसेरी।

नरसी मेहता जी
जीवन समय—सत्रहवाँ शतक । रचना काल—१६३० । जन्म स्थान—
जूनागढ़ [गुजरात]। जाति और आश्रम—गुजराती ब्राह्मण, गृहस्थ ।
इन के मा बाप बचपन ही में मर गये थे इसलिये भाई भावज के साथ
रहने लगे। फिर भावज के कुटिल वचन के कारण उसका घर भी छोड़ दिया और
एक शिवाले में सात दिन तक भूखे प्यासे पड़े रहे; शिवजी की कृपा से बृंदावन
आकर साक्षात दर्शन श्रीकृष्ण का पाया। बृंदावन से जूनागढ़ लौट आये और वहाँ
एक घर अलग बनाकर अपना ब्याह कर लिया जिस से एक बेटा और दो बेटी
उत्पन्न हुए। इन की ईश्वर-भक्ति जगत-विख्यात है और इन की हुंडी की
कथा जो साधुओं की एक जमात के आग्रह वस इन्हों ने साँवल साह पर
द्वारका को लिख दी और जिस का दाम श्रीकृष्ण ने आप साहूकार का रूप धारण
करके चुकाया भक्तमाल में दी है।
(१)
म्हाॅँने पार उतारो जी, थाँने निज भक्तन की आन ।
हमरे अवगुन नेक न चितवो, अपनो ही करि जान ॥१॥
काम क्रोध मद लोभ मोह बस, भूल्यो पद निर्वान ।
अब तो सरन गही चरनन की, मत दीजो मोहिं जान ॥२॥
लख चौरासी भरमत भरमत, नेक न परी पिछान ।
भवसागर मैं बह्यो जात हौँ, रखिये स्याम सुजान ॥३॥
हौँ तो कुटिल अधम अपराधी, नहिँ सुमिरयो तेरो नाम ।
नरसी के प्रभु अधम-उधारन, गावत बेद पुरान ॥४॥
(२)
कहाँ लगाई एती देर, अरे अरे साँवरे ॥ टेक ॥
हौँ गुजराती सिव को उपासी, पूजौँ साँझ सबेर ॥१॥
भक्ति मर्म को सार न जानौँ, हाँसी कराई मेरी ढेर ॥२॥
ऊँचे चढ़ि के टेर सुनाऊँ, अब सुनिये म्हारी टेर ॥३॥
क्या काहूँ काज सँवारे भक्तन के, क्या निद्रा ने लिये घेर ॥४॥
नरसी के प्रभु अधम-उधारन, राखिये अब की बेर ॥५॥

गुसाईं तुलसीदासजी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ ७१ ]
॥ प्रेम ॥
ये दोउ झूलत रंग हिंडोरैं ।
दसरथ-सुत अरु जनक-नंदनी, चितवन मैं चित चोरैं ॥१॥
नान्ही नान्ही बूँद पवन पुरवैया, बरसत थोरैं थोरैं ।
हरि हरि भूमि घटा झुकि आईं, सरजू लेत हिलोरैं ॥२॥
हय दल पैदल गज दल रथ दल, कोटि बने चहुँ ओरैं ।
उपवन माहिं मधुर सुर बोलैं, कोकिल मोर चकोरैं ॥३॥
रत्न जड़ित को बन्यो हिंडोरा, रेसम लागी डोरैं ।
अरस परस दोउ झूल झुलावैं, इक साँवर इक गोरैं ॥४॥
वा मैं बिमल सखी उरझानी, अपनी अपनी ओरैं ।
तुलसिदास अनुकूल जानि के, सियाजी हँसीं मुख मोरैं ॥५॥
॥ विनय ॥
(१)
काहे तैं हरि मोहिं बिसारो ।
जानत निज महिमा मेरे अघ, तदपि न नाथ सम्हारो ॥१॥
पतित-पुनीत दीनहित, असरण-सरण कहत श्रुति चारो ।
हौं नहिं अधम सभीत दीन, किधौं वेदन मृषा पुकारो ॥२॥
खग गणिका गज ब्याध पाँति जहँ, तहँ हौं हूँ बैठारो ।
अब केहि लाज कृपानिधान, परसत पनवारा फारो ॥३॥

  • शब्द १ विनय के अर्थ—हे हरि मुझ को क्यों भूले जाते हो, तुम तो अपनी बड़ाई
    और मेरे दोष दोनों को जानते हो फिर मुझे क्यों नहीं सम्हालते। चारो वेद आप
    के पतितपावन, दुखिया के हितकारी, असरन की सरन होने की महिमा गाते हैं
    फिर जो आप मुझ सरीखे अधम, संसारी भय मानने वाले और अव्वल दुखिया के

८० गुसाईँ तुलसीदासजी
मसक बिरंचि बिरंचि मसक सम, करहु प्रभाव तुम्हारो ।
यह सामर्थ्य अछत मोहिँ त्यागहु, नाथ तहाँ कछु चारो ॥४॥
जनहि न नरक परत मोकहँ डर, यद्यपि हौँ अति हारो ।
यह बड़ि त्रास दास तुलसी, प्रभु नामहुँ पाप न जारो ॥५॥
(२)
केसव कारन कवन गुसाईँ ।
जेहि अपराध असाधु जानि मोहिँ, तज्यो अज्ञ १की नाईँ ॥१॥
परम पुनीत सन्त कोमल चित, तिन्हहिँ तुमहिँ बनि आई ।
तौ बिप्र ब्याध गनिकहिँ कस तार्यो, का कछु रही सगाई २॥२॥
काल कर्म गति अगति जीव की, सब हरि हाथ तुम्हारे ।
सोइ कछु करहु हरहु ममता मम, फिरहु ३न तुमहिँ बिसारे ॥३॥
जौँ तुम तजहु भजौँ न आन प्रभु, यह प्रमान पन मोरे ।
मन बच कर्म नरक सुरपुर जहँ, तहँ रघुबीर निहोरे ॥४॥
तारने में देर लगाते हौ तो सिवाय इस के क्या कहा जाय कि या तो मेरे समस्त
औगुनों में निपुन होने में कसर है या आप की महिमा वेदों ने मिथ्या भाखी है।
आप के प्रन के सहारे मैं खग [जटायु], गणिका [वेश्या], गज, और व्याधा जिस
ने श्रीकृष्ण के चरन में तीर मारा था ऐसे अधमों की पाँति में बैठाया गया तो
फिर पंगत में बैठाल्ने के पीछे कौन लाज आप को लगती है कि परोसने के समय
मेरी पत्तल को फाड़ते हौ। आप का सुभाव है कि छिन में मच्छड़ को ब्रह्मा
और ब्रह्मा को मच्छड़ बना देते हौ। फिर ऐसे समरथ होकर जो मुझे त्यागते हौ
तो मेरा क्या बस है। सो यद्यपि मैं जनम भर पाप करते २ अति थक गया हूँ
फिर भी मुझे नर्क में पड़ने का डर नहीं है पर यह चिन्ता अवश्य है कि द्रोही
हँसेंगे कि नाम भी पापों को नहीं काट सका।
(१) अनजान बन कर । (२) जो तुम केवल पवित्र सज्जनों को ही ग्रहन करते
होते तो अजामिल बिप्र, ब्याध, गनिका इत्यादि दुर्जन क्या तुम्हारे कोई नाते-
दार थे जो उनको तारा। (३) फिर भी। (४) जो तुम मुझे त्याग दोगे तौ भी यह
मेरा प्रन है कि दूसरे स्वामी को न भजूँगा, चाहे मुझे नर्क में डाल देव चाहे देव
लोक में पहुँचाओ मैं मनसा वाचा कर्मना तुम्हाराही जस गाऊँगा।

शब्द संग्रह ८१
जद्यपि नाथ उचित न होत अस, प्रभु सौँ करौँ ढिठाई ।
तुलसिदास सीदत¹ निसि दिन, देखत तुम्हारि निठुराई ॥५
(३)
माधव अब न द्रवहु² केहिँ लेखे ।
प्रनतपाल³ पन तोर, मोर पन जियउँ कमल पद देखे ॥१॥
जब लगि मैं न दीन दयाल तैं, मैं न दास तैं स्वामी ।
तब लगि जो दुख सहेउँ कहेउँ नहिँ, जद्यपि अन्तर्जामी ॥२
तैं उदार मैं कृपन पतित मैं, तैं पुनीत श्रुति गावै ।
बहुत नात रघुनाथ तोहिँ मोहिँ, अब न तजे बनि आवै ॥३
जनक जननि गुरु बन्धु सुहृद पति, सब प्रकार हितकारी ।
द्वैत रूप तम कूप परौँ नहिँ, अस कछु जतन बिचारी⁴॥४
सुनु अदभ्र करुना बारिज-लोचन, मोचन भय भारी ।
तुलसिदास प्रभु तब प्रकास बिनु, संसय टरत न टारी⁵॥५
(४)
तू दयाल दीन हैँ, तू दानि हैँ भिखारी ।
हैँ प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज हारी ॥ १ ॥
नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मो सौं ।
मो समान आरत नहिँ, आरत-हर तो सौँ ॥ २ ॥
(१) दुख पाता है। (२) पसीजते, दया करते। (३) जो एक बार भी प्रनाम
करै तिस का पालन करनेहारा । (४) पिता, माता, गुरू, भाई, मित्र, स्वामी, सब
प्रकार तुम्हीँ मेरे हितकारी हो सो ऐसा कुछ जतन करो कि द्वैत रूप अर्थात हौं
मैं के अंध-कूप मेंँ न गिर जाऊँ । (५) सुनो हे अधिक [अदभ्र] करुना-निधान
कमल-नैन, भयहरन प्रभु तुम्हारे प्रकाश बिना मेरा भ्रम अपने पुरुषार्थ से टाले
नहीं टलता ।
शब्द ४ का अर्थ—इस शब्द मे गुसाईँ जी ग्यारह नाते गिना कर अपने
इष्ट से विनय करते हैं कि जो नाता आप को भावै उसी एक को मान कर
मुझे चरन सरन मेंँ लीजिये ।
११

८२ गुसाईं तुलसीदासजी
ब्रह्म तू हौं जीव हौं, तू ठाकुर हौं चेरो ।
तात मात गुरु सखा तू, सब बिधि हित मेरो ॥ ३ ॥
तोहि मोहिं नातो अनेक, मानिये जो भावै ।
ज्यौँ त्यौँ तुलसी, कृपालु चरन सरन पावै ॥ ४ ॥
(५)
हरि जू मेरो मन हठ न तजै ।
निसि दिन नाथ देउँ सिख बहु बिधि, करत सुभाव निजै ॥१
ज्यौँ जुवती अनुभवत प्रसव¹ अति, दारुन दुख उपजै ।
ह्वै अनुकूल बिसारि सूल सठ, पुनि खल पतिहिँ भजै ॥२॥
लोलुप भ्रमत श्रमित निसि बासर, सिर पदत्रान बजै ।
तदपि अधम बिचरत तेहिँ मारग, कबहूँ न मूढ़ लजै ॥३॥²
हौं हार्यो करि जतन विविधि बिधि, अतिसय प्रबल अजै³ ।
तुलसिदास बस होत तबै, जन प्रेरक प्रभु बरजै ॥ ४ ॥
(६)
दीन को दयालु दानि दूसरो न कोई ।
जाहि दीनता कहौँ हौं दीन देखौँ सोई⁴ ॥ १ ॥
मुनि सुर नर नाग असुर साहिब तै घनेरे ।
पै तै। लौं जौ लौं रावरे न नेकु नैन फेरे⁵ ॥ २ ॥
त्रिभुवन तिहुँ काल बिदित बदत⁶ बेद चारी ।
आदि अंत मध्य राम साहिबी तिहारी ॥ ३ ॥
(१) जनने का दुख सहती है। (२) जैसे लालची रात दिन रुपया कमाने के फेर
में थक जाता है और जूतियाँ खाता है फिर भी वही चाल चलता है और लाज
नहीं लाता । (३) अजीत । (४) ईश्वर को छोड़ दूसरा दीनता छुड़ाने का समर्थ
नहीं है, जिस किसी से अपनी दीनता का दुख रोता हूँ उसी को आप दीन
दुखी अर्थात असमर्थ पाता हूँ । (५) सुर नर मुनि आदि की जभी तक प्रभुता
है जब तक तेरो भौं उनकी ओर टेढ़ी नहीं होती । (६) कहता है ।

तोहि माँगे माँगने न माँगना कहायो१ ।
सुनि सुभाव सील सुजस जाचक जन आयो ॥ ४ ॥
पाहन पसु विटप विहँग अपने करि लीन्हे ।
महाराज दसरथ के रंक राव कीन्हे ॥ ५ ॥२
तू गरीब को निवाज हौं गरीब तेरो ।
वारक३ कहिये कृपालु तुलसिदास मेरो ॥ ६ ॥
(७)
मैं हरि पतित-पावन सुने ।
मैं पतित तुम पतित-पावन, दोऊ बानिक४ बने ॥ १ ॥
ब्याध गनिका गज अजामिल, साखि निगमन भने ।
और अधम अनेक तारे, जात का पै गने ॥ २ ॥
जानि नाम अजानि लीन्हें, नरक जमपुर भने ।
दास तुलसी सरन आयो, राखिये आपने ॥ ३ ॥
(८)
तुम सम दीन बन्धु, न दीन कोउ मो सम,
सुनहु नृपति रघुराई ।
मो सम कुटिल मैलिमनि५ नहिं जग,
तुम सम हरि न हरन कुटिलाई ॥ १ ॥
हौं मन बचन कर्म पातक-रत,
तुम कृपालु पतितन गति दाई ।
हौं अनाथ प्रभु तुम अनाथ-हित,
चित यह सुरति कबहुँ नहिं जाई ॥ २ ॥


(१) जिस ने आप से माँगा वह फिर मंगता न रहा अर्थात परिपूर्ण हो गया ।
(२) दशरथ के पुत्र श्रीरामचंद्र ने जिस जिस को अपनाया वह दरिद्री से राजा
होगया यहाँ तक कि पत्थर जैसे अहिल्या, जानेवर [बंदर भालू], पेड़
[ यमलार्जुन ], चिड़िया [ जटायु ] की योनियों तक से दीन दुखियों का उद्धार
कर दिया । (३) एक बेर । (४) सुभाव, वज़ा । (५) दुष्टों का शिरोमनि, कुटीचर ।

८४ गुसाईँ तुलसीदासजी
हौँ आरत¹ आरत-नासन तुम्ह,
कीरति निगम पुरानन गाई ।
हौँ सभीत² तुम हरन सकल भय,
कारन कवन कृपा बिसराई ॥ ३ ॥
तुम सुखधाम राम श्रमभंजन³,
हौँ अति दुखित त्रिबिध श्रम⁴ पाई ।
यह जिय जानि दास तुलसी कहँ,
राखहु सरन समुझि प्रभुताई ॥ ४ ॥
(६)
जो पै दूसरो कोउ होइ ।
तो हौँ बारहिँ बार प्रभु, कत दुख सुनावौँ रोइ ॥ १ ॥
काहि ममता दीन पर, को पतित-पावन नाम ।
पाप-मूल अजामिल हिँ, केहि दियो अपनो धाम ॥ २ ॥
रहे सम्भु बिरंचि सुरपति, लोक-पाल अनेक ।
सोक सरि बूड़त करीसहिँ, दई काहु न टेक⁵ ॥ ३ ॥
बिलखि भूपति सदसि महँ, नरनारि कह प्रभु पाहि ।
सकल समरथ सरन काहु न, बसन दीन्हौँ ताहि⁶ ॥ ४ ॥
एक मुख क्यौँ कहौँ, करुना-सिन्धु के गुन गाथ⁷ ।
भक्तहित धरि देह' काह न, कियो कोसल-नाथ ॥ ५ ॥
आप से कहिँ सौंपिये मोहिँ, जो पै अतिहिँ घिनात ।
दासतुलसी और बिधि क्यौँ, चरन परिहरि⁸ जात ॥६॥
(१) दीन दुखी । (२) भयमान । (३) क्लेश-नाशक । (४) त्रय ताप ग्रसित ।
(५) शोक की नदी में डूबते हुए गजेन्द्र को किसी ने सहारा नहीं दिया ।
(६) नरनारी अर्थात द्रोपदी की जब राज सभा में सारी खींची गई और वह
बिलख कर त्राहि २ पुकारी और तुम्हारी शरन ली तो तुम्हारे सिवाय किस ने
उस को वस्त्र दिया । (७) गाय कर । (८) अयोध्या के राजा श्रीरामचंद्र ।
(६) छोड़ कर ।

शब्द संग्रह ८५
(१०)
अस कछु समुझि परै रघुराया ।
बिन तव कृपा दयाल दास हित, मोह न छूटै माया ॥१॥
वाक्य ज्ञान अत्यन्त निपुन, भव पार न पावै कोई ।
निसि गृह मध्य दीप की बातन, तम निवृत्त नहिँ होई ॥२
जैसे कोउ इक दीन दुखित अति, असन-हीन१ दुख पावै ।
चित्र कल्पतरु कामधेनु गृह, लिखे न बिपति नसावै ॥३॥
षट रस बहु प्रकार भोजन कोउ, दिन अरु रैन बखानै ।
बिन बोले सन्तोष-जनित सुख२, खाइ सोई पै जानै ॥४॥
जबलगि नहिँ निज हृदे प्रकास, अरु बिषय आस मनमाहीं।
तुलसिदास तब लगि जग जोनि, भ्रमत सपनेहुँसुखनाहीँ ॥५
(११)
वेद न पुरान गान जानेाँ न बिज्ञान ज्ञान,
ध्यान धारना समाधि साधन प्रबीनता ॥ १ ॥
नाहिँन बिराग जोग जाग भाग तुलसी के,
दया दान दूबरो हौँ, पाप ही की पीनता३ ॥२॥
लोभ मोह काम कोह४, दोष कोष मो साँ कौन,
कलि५ हूँ जो सीखि लई मेरी ये मलीनता ॥ ३ ॥
एक ही भरोसो राम रावरेा कहावत हौँ,
रावरे दयाल दीन-बंधु मेरी हीनता ॥ ४ ॥
(१२)
स्वारथ को साज न समाज परमारथ को,
मो साँ दगाबाज दूसरो न जग जाल है ॥ १ ॥
(१) अहार बिना। (२) जो सुख संतोष से उत्पन्न हुआ अर्थात रसोला
भोजन करने का आनंद । (३) मुटाई । (४) क्रोध । (५) कलियुगं ।

८६ गुसाईं तुलसीदासजी
कौन आयो करौ न करौंगो करतूति भलि,
लिखो न विरंचिहूँ१ भलाई मोरे भाल२ है ॥२॥
रावरी सपथ३ राम नाम ही की गति मेरे,
इहाँ झूठो झूठो सो तिलोक तिहूँ काल है ॥३॥
तुलसी को भलो पै तुम्हारे ही किये कृपाल,
कीजै न बिलंब बलि पानी भरी खाल है ॥४॥
(१३)
केहि कहौं बिपति अति भारी, खोरघुबीर धीरहितकारी॥१
मम हृदय भवन प्रभु तोरा, तहँ बसे आइ बहु चोरा ॥ २ ॥
अतिकठिन करहिं बरजोरा, मानहिं नहिं बिनय निहोरा३
तम मोह लोभ अहंकारा, मद क्रोध बोध४ रिपु मारा ॥४॥
अति करहिं उपद्रव नाथा, मर्दहिं मोहिं जानि अनाथा ५
मैं एक अमित५ बटपारा, कोउ सुनै न मोर पुकारा ॥६॥
भागेहुँ नहिं नाथ उबारा, रघुनायक करहु सँभारा ॥ ७ ॥
कह तुलसिदास सुनु रामा, लूटहिं तस्कर तव धामा६ ॥८॥
चिंता यहि मोहिं अपारा, अपजस नहिं होहि तुम्हारा ॥९
(१४)
ऐसी मूढ़ता या मन की ॥ टेक ॥
परिहरि राम भक्ति सुरसरिता७,आस करत ओसकन८ की॥१
धूम समूह निरखि चातक ज्यौं, तृषित जानि मति घन९की २
नहिं तहँ सीतलता न बारि पुनि, हानि होत लोचन की ॥३
(१) ब्रह्मा। (२) माथा। (३) क़सम। (४) बुद्धि, समझ। (५) अनेक। (६) मेरा
हृदय जो हे प्रभु तुम्हारा मन्दिर है यह ठग लूट रहे हैं। (७) गंगा। (८) ओस की
बूँद। (६) बादल।

शब्द संग्रह ८७
ज्यौँ गच काँच विलोकि सेन जड़, छाँह आपने तन की ॥४
टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की ॥५१
कहँ लग कहौं कुचाल कृपा-निधि, जानत हौ गति जन की ६
तुलसिदास प्रभु हरौ दुसह दुख, लाज करो निज पन की ॥७
(१५)
कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो ।
श्रीरघुनाथ कृपालु कृपा तैं, सन्त सुभाव गहौंगो ॥ १ ॥
जथा लाभ सन्तोष सदा, काहू सौं कछु न चहौंगो ।
परहित परत निरन्तर मन, क्रम बचन नेम निबहौंगो ॥२॥
परुष२ बचन अति दुसह३ श्रवन सुनि, तेहि पावक न दहौंगो।
विगत४ मान सम सीतल मन, परगुन नहिँ दोष कहौंगो ३
परिहरि देह-जनित५ चिन्ता दुख, सुख सम बुद्धि सहौंगो ।
तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि के, अविचल भक्ति लहौंगो ॥४
॥ उपदेश ॥
(१)
जा के प्रिय न राम बैदेही ।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ॥१॥
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरथ महतारी ।
बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज बनिता, भये जग मंगलकारी ॥२॥
नाते नेह राम के मनियत, सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं ।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं ॥३॥
तुलसी सो सब भाँति परम हित, पूज्य प्रान तैं प्यारो ।
जा सौं होय सनेह राम पद, एतो मतो हमारो ॥४॥
(१) जैसे शीशा की गच में अज्ञान बाज़ चिड़िया (श्येन) अपने शरीर की
छाया देख कर दूसरी चिड़िया का भ्रम कर के अपने मुँह (आनन) में घाव
(छति) लगने का डर छोड़ कर भूख बस टूट पड़ता है। (२) कट्टु, कड़ा ।
(३) असह, सहने योग्य नहीं । (४) मृत, बीता हुआ । (५) देह से उत्पन्न हुई ।

८८ गुसाईँ तुलसीदासजी
(२)
राम राम राम जीह१, जौ लौं तू न जपिहै ।
तौ लौं तू कहूँ जाय तिहूँ ताप तपिहै ॥ १ ॥
सुरसरि२ तीर बिनु नीर दुख पाइहै ।
सुरतरु३ तर तोहिँ दुख दारिद सताइहै ॥ २ ॥
जागत बागत४ सुख सपने न सोइहै ।
जनम जनम जुग जुग जग रोइहै ॥ ३ ॥
छूटिबे के जतन बिसेष बाँध्यो जायगो ।
ह्वैहै बिष भोजन जो सुधा५ सानि खायगो ॥ ४ ॥
तुलसी बिलोक तिहूँ काल तो सैं दीन को ।
राम नाम ही की गति जैसे जल मीन को ॥ ५ ॥
(३)
स्त्री रघुबीर की यह बानि६ ।
नीच हूँ सौँ करत नेह सो, प्रीति मन अनुमानि ॥१॥
परम अधम निषाद पामर, कौन ता की कानि ।
लियो सो उर लाय सुत ज्योँ, प्रेम को पहिचानि ॥२॥
गोध कौन दयालु जो, बिधि रच्यो हिंसा सानि ।
जनक ज्योँ रघुनाथ ता को, दियो जल निज पानि७ ॥३॥
प्रकृति मलिन कुजाति सबरी, सकल अवगुन खानि ।
खात ता के दिये फल, अति रुचि बखानि बखानि ॥४॥
रजनिचर अरु रिपु बिभीषन, सरन आयो जानि ।
भरत ज्योँ उठि ताहि भेंटत, देह दसा भुलानि ॥५॥
कौन सौम्य८ सुसील बानर६, जिनहिँ सुमिरत हानि ।
किये ते सब सखा पूजे, भवन अपने आनि ॥६॥
(१) जीभ । (२) गंगा । (३) कल्प वृक्ष । (४) चलते । (५) अमृत । (६) सुभाव ।
(७) जैसे कोई पिता को अपने हाथ से तिलांजुली देता है। (८) रुचिर, दिल-
पसंद । (६) बन्दर ।

शब्द संग्रह ८६
राम सहज कृपाल कोमल, दीन-हित दिन-दानि ।
भजहि ऐसे प्रभुहिं तुलसी, कुटिल कपट न ठानि ॥७॥
(४)
जागु जागु जीव जड़ जोहे जग जामिनी ।
देह गेह नेह जानि जैसे घन दामिनी ॥१॥१
सोवत सपने सहै संसृति सन्ताप रे ।
बूभयो मृग-वारि खायो जेवरि को साँप रे२ ॥ २॥
कहे बेद बुध३ तू तो बूझ मन माहिँ रे ।
दोष दुख सपने के जागे ही पै जाहिँ रे ॥ ३ ॥
तुलसी जागेँ तैं जाय ताप तिहुँ ताय रे ।
राम नाम सुचि४ रुचि५ सहज सुभाय रे ॥४॥
(५)
सवैया
अपराध अगाध भये जन तैं, अपने उर आनत नाहिँन जू ॥
गनिका गज गोध अजामिल के, गनि पातक पुंज सराहिन जू
लिये बारक६ नाम सुधाम दियो, जेहि धाम महा मुनि जाहिँ न जू॥
तुलसी भजु दीनदयालहिँ रे, रघुनाथ अनाथ हिँ दाहिन७जू
(६)
सवैया
सो जननी सो पिता सोइ भ्रात, सो भामिनि सो सुत सो हित मेरो ॥
सोई सगा सो सखा सोइ सेवक, सो गुरु सो सुर साहिब चेरो ॥
सो तुलसी प्रिय प्रान समान, कहाँ लौं बनाय कहौँ बहुतेरो ॥
जो तजि देह को गेह को नेह, सनेह सौँ राम को होय सबेरो ॥
(१) हे जीव जो घोर निद्रा में सोय रहा है जाग कर रात्रि रूप जग को देख
जहाँ देह और घर की प्रीत बादल में बिजली के समान छिन-भंगी है। (२) नींद
की दशा में तू संसार सम्बन्धी कष्ट भोगता है जो मृग-जल और रस्सी के साँप
की नाईँ केवल भ्रम रूप है। (३) पंडित । (४) पवित्र । (५) प्रिय लगे । (६) एक
बार । (७) दाहिने = सहायक ।
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