संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पलटू साहिब २३३
(४)
रेख़्ता
सुंदरी पिया की पिया को खोजती,
भई बेहोस तू पिया के कै।
बहुत सी पद्मिनी खोजती मरि गईं,
रटत ही पिया पिया एक एकै॥
सती सब होत हैं जरत बिनु आगि से,
कठिन कठोर वह नाहिं झाँकै।
दास पलटू कहै सीस उतारि के,
सीस पर नाचु जो पिया ताकै¹॥
(५)
भूलना
केतिक जुग गये बीति माला के फेरते।
छाला परि गये जीभ राम के टेरते॥
माला दीजे डारि मनै को फेरना।
अरे हाँ पलटू मुँह के कहे न मिलै दिलै बिच हेरना॥
(६)
अरिल
जीवन है दिन चारि भजन करि लीजिये।
तन मन धन सब वारि संत पर दीजिये॥
संतहि से सब होइ जो चाहै सो करैँ।
अरे हाँ पलटू संग लगे भगवान संत से वे डेरैँ॥
॥ दीनता ॥
(१)
कुंडलिया
दूसर पलटू इक रहा भक्ति दई तेहि जान॥
भक्ति दई तेहि जान नाम पर पख्यो मोकहँ।
गिरा परा धन पाय छिपायौँ मैं ले ओकहँ॥
(१) देखै।
३०
:
२३४ शब्द संग्रह
लिखा रहा कुछ आन कर्म मैं दीन्हा आनै ।
जानौँ महीं अकेल कोऊ दूसर नहिं जानै ॥
पाछे भा फिर चेत देय पर नाहीं लीन्हा ।
आखिर बड़े की चूक जोई निकसा सोई कीन्हा ॥
पलटू मैं पापी बड़ा भूल गया भगवान् ।
दूसर पलटू इक रहा भक्ति दई तेहि जान ॥
(२)
कुंडलिया
पतित-पावन बाना धख्यो तुमहिँ परी है लाज ॥
तुमहिँ परी है लाज बात यह हम ने बूझी ।
जब तुम बाना धख्यो नाँहिँ तब तुम कहँ सूझी ॥
अब तो तारे बनै नहीं तो बाना उतारो ।
फिर काहे को बड़ा बाच जो कहिके हारो ॥
आगहिँ तुम गये चूक दोष नहिँ दीजै मेरो ।
तुम यह जानत नाहिं पतित होइहैं बहुतेरो ॥
पलटू मैं तो पतित हाँ कियो असुभ सब काज ।
पतित-पावन बाना धख्यो तुमहिँ परी है
पलटू साहिब २३५
हरि धरि मेरो रूप करै सब काम है।
अरे हाँ पलटू बीच मँहै इक नाम मोर बदनाम है॥
॥ निन्दक ॥
(१)
कुंडलिया
निन्दक जीवै जुगन जुग काम हमारा होय ॥
काम हमारा होय बिना कौड़ी कौ चाकर ।
कमर बाँधि के फिरै करै तिहुँ लोक उजागर¹ ॥
उसे हमारी सोच पलक भर नाहिं बिसारी ।
लगो रहै दिन रात प्रेम से देता गारी ॥
भक्त कँहै दृढ़ करै जगत को भरम छुड़ावै ।
निन्दक गुरू हमार नाम से वही मिलावै ॥
सुनि के निन्दक मरि गया पलटू दिया है रोय ।
निन्दक जीवै जुगन जुग काम हमारा होय ॥
(२)
रेख़्ता
देखि के निंदकहिँ करौँ परनाम मैं,
धन्य महराज तुम भक्ति धोया ।
किहा निस्तार तुम आइ संसार मैं,
भक्त कै मैल बिनु दाम खोया ॥
भयो परसिद्ध परताप से आप के,
सकल संसार तुम सुजस बोया ।
दास पलटू कहैं निंदक के मुए से,
भया अकाज मैं बहुत रोया ॥
(१) रोशन, मशहूर ।
२३६ शब्द संग्रह
॥ तीर्थ व्रत ॥
अरिल
तीरथ व्रत में फिरे बहुत चित लाइ कै ।
जल पखान को पूजि मुए पछिताइ कै ॥
बस्तु न बूझी जाइ अपाने हाथ में ।
अरे हाँ पलटू जो कुछ मिलै सो मिलै संत के साथ में ॥
॥ मंगल ॥
जनमिउँ दुख की राति, परिउँ भौसागर हो ।
सोइ गइउँ भ्रम माहिँ, कुमति कै आगर हो ॥ १ ॥
सतगुरु दिहिनि जगाइ, उठिउँ अकुलाई हो ।
टूटि गइल भ्रम फंद, परम सुख पाई हो ॥ २ ॥
पिय को दिहिनि मिलाइ, हिये मोहिँ लीन्हा हो ।
अपनी दासी जानि, परम पद दीन्हा हो ॥ ३ ॥
सत्त सुकृति कै घैला१, प्रेम कै लेजुर२ हो ।
पनियाँ भरौँ डकोरि३, माँग झरि सेंदुर हो ॥ ४ ॥
सासु मोरि सुतै गजओबरि४, ननद मोरि अँगना हो ।
हम धन सूतैँ धवराहर५, पिय सँग जगना हो ॥ ५ ॥
झिरिहिरि बहै बयारि, अमी रस ढरकै हो ।
वरमी६ नौरँगिया कै डारि, चंदन गछ मरकै६ हो ॥ ६ ॥
तेहि चढ़ि बोलै हंस, सबद सुनि बाउर हो ।
मंगल पलटूदास, जगति कै नाउर७ हो ॥ ७ ॥
(१) घड़ा । (२) रस्सी । (३) पानी को झकझोर कर जिसमें खर कतवार
हट जाय । (४) इतना बड़ा कमरा जिस के दरवाज़े में से हाथी चला जाय ।
(५) ऊपर का कोठा । (६) झुकना । (७) नाऊ जिस के शुभ अवसरों पर
पलटू साहिब २३७
॥ मिश्रित ॥
(१)
कुंडलिया
बार बार बिनती करै, पलटूदास न लेइ ॥
पलटू दास न लेइ रहै कर जोरे ठाढ़ी ।
सरनागति मैं रहैँ सरन बिनु लागै गाढ़ी१ ॥
गोड़ दाबि मैं देउँ चरन धै सेवा करिहैँ ।
चौका देइहैँ लीपि बहुरि मैं पानी भरिहैँ ॥
पैँड़ा देउँ बुहारि सबन कै जूठ उठावौँ ।
जनि दुरियावहु मोहिँ रहै मैं इहवाँ पावौँ ॥
मुक्ति रहै द्वारे खड़ी लट से झाडू देइ ।
बार बार बिनती करै पलटूदास न लेइ ॥
(२)
कुंडलिया
बनिया पूरा सोई है जो तौलै सतनाम ॥
जो तौलै सतनाम छिमा का टाट बिछावै ।
प्रेम तराजू करै बाट बिस्वास बनावै ॥
बिबेक की करै दुकान ज्ञान का लेना देना ।
गादी है संतोष नाम का मारै टेना ॥
लादै उलदै भजन बचन फिर मीठे बोलै ।
कुंजी लावै सुरत सबद का ताला खोलै ॥
पलटू जिसकी बनि परी उसी से मेरा काम ।
बनिया पूरा सोई है जो तौलै सतनाम ॥
(१) गाढ़ = दुख ।
२३८ शब्द संग्रह
(३)
कुंडलिया
चिन्ता की लगी आग है जरै सकल संसार ॥
जरै सकल संसार जरत निरपति को देखा ।
बादसाह उमराव जरत हैं सैयद सेखा ॥
सुर नर मुनि सब जरैं जती जोगी सन्यासी ।
पंडित ज्ञानी चतुर जरैँ कनफटा उदासी ॥
जंगम सेवरा जरैँ जरैँ नागा बैरागी ।
कोउ न बचते आगि दुपहरी लागी आगी ॥
पलटू बचते संत जन जिन किया नाम आधार ।
चिन्ता की लगी आग है जरै सकल संसार ॥
(४)
अरिल
सब भैँड़ो की राह चले हैं जूटि१ के ।
आसिक बीर अकेल चला है फूटि के ॥
उलटि के खेलै खेल भया मन मगन मेँ ।
अरे हाँ पलटू छुटा भुइँचपा जाय एक ठो गगन में ॥
(५)
अरिल
खाला२ कै घर नाहिं भक्ति है नाम की ।
दाल भात है नाहिं खाये के काम की ॥
साहिब का घर दूर सहज ना जानिये ।
अरे हाँ पलटू गिरै तो चकनाचूर बचन को मानिये ॥
(६)
अरिल
माया ठगनी बड़ी ठगे यह जात है ।
बचै न या से कोऊ लगी दिन रात है ॥
कौड़ी नाहीं संग करोरनि जोरि कै ।
अरे हाँ पलटू गये हैं राजा रंक लँगोटो छोरि कै ॥
(१) झुंड के। (२) मौसी ।
तुलसी साहिब (हाथरसवाले)
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ २२६]
॥ गुरुदेव ॥
(१)
कोइ सतगुरु देव री बताइ, चरन गहौँ ताहि के ॥टेक॥
चहुँ दिसि ढूँढ़ि फिरी कोइ भेदी, पूछत हौँ गुहराय ।
उन से कहौँ बिथा सब अपनी, केहि बिधि जीव जुड़ाय ॥१
जो कोइ सखी सुहागिनि होवै, कहै तन तपन बुझाय ।
पिउ की खोलि खबर कहै मो से, मरौँ री बिकल करि हाय ॥२
जो न्यामत दुनिया दौलत की, सो सब देउँ बहाय ।
बारम्बार वारि तन डारौँ, यह कहा मोल बिकाय ॥३॥
बिन स्वामी सिंगार सुहागिनि, लानत तोबा ताय।
पिय बिन सेज बिछावै ऐसी, नारि मरै बिख खाय ॥४॥
सतगुरु बिरहिनि बान कलेजे, रोवै और चिल्लाय ।
हाय हाय हिय मैं निसि बासर, हर दम पीर पिराय ॥५॥
यहि झुँड मैं कोइ पाऊ पियारी, पिया दुलारी आहि¹ ।
मैं दुखिया हौँ दर्द दिवानी, प्रीतम दरस लखाय ॥६॥
तुलसी प्यास बुझै प्यारे से, चढ़ि घर अधर समाय ।
किरपावंत संत समझावैँ, और न लगै उपाय ॥ ७ ॥
(२)
जिनके हिरदे गुरु संत नहीं :
उन नर औतार लिया न लिया ॥ टेक ॥
सूरत बिमल बिकल नहिँ जा के ।
बहु बक ज्ञान किया न किया ॥ १ ॥
(१) है।
२४० शब्द संग्रह
करम काल बस उद्र१ निहारा ।
जग बिच मूढ़ जिया न जिया ॥ २ ॥
अगम राह रस रीति न जानी ।
बहु सतसंग किया न किया ॥ ३ ॥
नाम अमल घट घोंटि न पीया ।
अमल अनेक पिया न पिया ॥ ४ ॥
मोटे मात जात ज़िंदगी मैं ।
सिर धरि पैर छुवा न छुवा ॥ ५ ॥
तुलसीदास साध नहिँ चीन्हा ।
तन मन धन न दिया न दिया ॥ ६ ॥
(३)
अरिल
संत मता है सार और सब जाल पसारा ।
परमहंस जग भेष बहे सब मन की लारा ॥
संत बिना नहिँ घाट बाट एको नहिँ पावै ।
अरे हाँ रे तुलसी अटक भटकि भ्रमखान संत बिन भव मैं आवै ॥
(४)
अरिल
भव जल अगम अथाह थाह नहिँ मिलै ठिकाना ।
सतगुरु केवट मिलै पार घर अपना जाना ॥
जग रचना जंजाल जीव माया ने घेरा ।
अरे हाँ रे तुलसी लोभ मोह बस परे करैं चौरासी फेरा ॥
॥ चितावनी ॥
(१)
रेख़्ता
जगत मद मान मैं माता । खुदी का खौफ नहिँ लाता ॥
कजा सिर पर खड़ी द्वारे । फिरिस्ते तीर तकि मारे ॥१॥
(१) पेट ।
तुलसी साहिब (हाथरसवाले) २४१
कमानी काल के हाथा । करै जम जीव की घाता ॥
पड़ा मगरूर¹ क्या सोवै । बहुर फिर सीस धरि रोवै ॥२॥
अगर यों सोच अपने सें । गये दिन बीत सपने में ॥
बदन सही पवन पानी । मलामत² हाड़ मिल सानी ॥३॥
गंदगी बीच अंदर में । बदन बदबोय मंदर में ॥
अरे नित क्या अन्हाता है । मैल मन का न जाता है ॥४॥
करेले नीम की भाई । कभी जावै न कड़वाई ॥
अरे दुरगंध का भाँड़ा । निरख कोइ संत ने छाड़ा ॥५॥
खलक दो दिन तमासा यों । परख पानी बतासा ज्यों ॥
अगर यों जान जिंदगानी । अबर ओला घुलै पानी ॥६॥
अवस³ तन यों बिनसता है। इधर घर का न रस्ता है ॥
मिर्ग की नाभि कस्तूरी । भटक ढूँढै जो बन मूरी ॥७॥
तेरा महबूब तेरे में । वस्तु गह ढूँढ़ डेरे में ॥
सगुनिया संत से पावै । आप मैं आप दरसावै ॥८॥
करै सतसंग मन टूटै । मलामत बुद्धि की छूटै ॥
गुरू मिल मैल कूँ काढ़ै । ज्ञान की उग्रता⁴ बाढ़ै ॥ ९ ॥
सुरत जब सीलता पावै । गगन की राह चढ़ जावै ॥
होय पति प्रीति निरधारा । मिलै तुलसी पदम प्यारा ॥१०॥
(२)
क्या सोवत गाफिल चेत, सिर पर काल खड़ा ॥टेक॥
जोर जुलम की रोति बिचारी, करि माया से हेत ।
जम की जबर खबर नहिँ जानी, बाँधि नरक दुख देत ॥१
बिनसै बदन अगिन बिच जारैँ, खीर खाँड रस लेत ।
फिरिफिरि काल कमान चढ़ावै, मार लेत खुल खेत ॥२॥
(१) अहंकारी । (२) गंदगी । (३) व्यर्थ । (४) तेज़ी ।
२१
२४२ शब्द संग्रह
बिष रस रंग संग बहु कीन्हा, करि करि बैस ब्रितेत१ ।
वृद्ध बनाय बूढ़ तन भइया, कारे केस सपेद ॥३॥
सुत दारा आदर अलसाने, बुढ़वा मरै परेत ।
छलबल माया करि गई रे, या दुनिया के हेत ॥४॥
मनी मान से धनी न चीन्हा, चिड़िया चुगि गइ खेत ।
तुलसी चरन सरन सतगुरु बिन, ग्रासत रवि जस केत ॥५॥
॥ बिरह ॥
(१)
सखी मोहिं नींद न आवै री । एरी बैरन बिरह जगावै ॥१
सूनी सेज पिया बिन ब्याकुल । पीर सतावै री ॥२॥
रैन न चैन दिवस दुख ब्यापै । जग नहिं भावै री ॥३॥
तलफत बदन बिना सुख सइयाँ । सब जरि जावै री ॥४॥
बिषधर२ लहर डसै नागिन सी । ज्यौं जस खावै री ॥५॥
देवै मौत दई बिरहन को । होते मरि जावै री ॥६॥
कैफ़३ बिना तुलसी तन सूखै । जिय तरसावै री ॥७॥
(२)
पी की मोहिं लहर उठत खुटत रैन नाहीं ।
कहा कहूँ करमन की रेख हिये की दरदाई ॥ १ ॥
अँखियाँ दुर दुरत नीर सखियाँ सुख नाहीं ।
पपिहा पिउ पिउ के बोल खोलत खिसियाई ॥ २ ॥
जियरा जरजर पिरात संत रटत साईं ।
लाई सुति चरन सरन हित चित चिन्हवाई ॥ ३ ॥
मेरे मन की मुराद साध संगत चाही ।
खोजै खुल खुल बिसेष लेखै अपनाई ॥ ४ ॥
(१) ख़तम । (२) साँप । (३) नशा ।
तुलसी साहिब (हाथरसवाले) २४३
तुलसी तत मत विलास पास प्रेम छाई ।
पाई घर धधक धीर रमक सी जनाई ॥ ५ ॥
(३)
मेरे दरद की पीर कसक किस से मैं कहूँ ॥ टेक ॥
ऐसा हकीम होय जोई जान दे दहूँ ।
खटकै कलेजे बीच बान तोर से सहूँ ॥ १ ॥
घायल की समझ सूर चूर घाव मैं रहूँ ।
हीये हवाल हाल गला काटि के लहूँ ॥ २ ॥
जैसे तड़पती मीन नीर पीर ज्योँ सहूँ ।
जैसे चकोर चंद चाह चित्त से चहूँ ॥ ३ ॥
सोची सुबह और साम पिया धाम कस गहूँ ।
तुलसी बिना मिलाप छुरी मार मर रहूँ ॥ ४ ॥
(४)
प्यारी पिया पीर खली आधी रतियाँ ॥ टेक ॥
सोवत समझ उठी अपने मैं । क्या कहूँ बरनि बिपतियाँ ॥१
चोली बन्द बदन बिच खटकै । उमँग उमँग फटै छतियाँ ॥२
रोवत रैन चैन नहिँ चित मैं । कूर करम की बतियाँ ॥३
तुलसी देस ऐस बिन पिय के । सोच लिखूँ कित पतियाँ ॥४
(५)
सावन
पिय बिन सावन सुख नहीं, हिये बिच उठत हिलोर ।
बोल बचन भावै नहीं, तन मन तड़पि अतोल ॥ १ ॥
पिय बिन बिरहन बावरी, जिय जस कसकत हूल ।
सूल उठै पति पीर की, धन संपत सुख धूल ॥ २ ॥
इत बैरी बदरा भये, गरजि घुमरि घनघोर ।
घुमरि घुमरि घर द्वार मैं, कूकै दादुर मोर ॥ ३ ॥
२४४ शब्द संग्रह
बीज कड़क कस कस करूँ, सुधि बुधि रहत न हाथ ।
साथ मिलै पिया पंथ को, मारग चलूँ दिन रात ॥४॥
सुरति निरति डोरी करूँ, मन मत खंभ गड़ाइ ।
लै की लहर उपर मिली, झूलो सुरति चढ़ाइ ॥ ५ ॥
ये सावन तुलसी कहै, खोजो सतसँग माहिँ ।
गाइ गवन सज्जन करै, बूझै सत मति पाइ ॥ ६ ॥
(६)
सावन
पिया बिन बिरहन बावरी, दई¹ दुख दियो री कठोर ।
मोरि खबर सुधि ना लई, ज्योँ बिन चंद चकोर ॥ १ ॥
चकवा चकई बिछोह की, बरनूँ कौन बयान ।
नदिया पार चकवा रहै, चकई वार मिलाप ॥ २ ॥
रैन बिलग सुनती हती, मोरे हिये बरतत आज ।
बिलग पिय से मरिबो भलो, यह दुख सह्यो न जात ॥३॥
सब सिंगार फीका लगै, पिय बिन कछु न सुहाइ ।
हाय हाय तलफत रहूँ, कहो केहि जाइ सुनाइ ॥ ४ ॥
लोग बटाऊ री बिदेस के, नहिँ पर पीर पीछान ।
चरन बिना चहुँ दिसि फिरी, नहिँ कछु जियरा जुड़ान ॥५॥
कल्प² कल्प कलपत भये, जुग जुग जोवत बाट ।
कोइ री सुहागिनि ना मिली, पूछूँ पिया घर घाट ॥६॥
नर तन नगर डगर मिलै, कहैँ सब संत सुजान ।
फिरि पसु पंछिन में नहीं, जड़वत³ जीव भुलान ॥ ७ ॥
(१) दैव, ईश्वर । (२) ब्रह्मा का एक दिन जो एक हज़ार युग या ४३ करोड़
बीस लाख बरस के बराबर होता है और जिस के बीतने पर समस्त सृष्टि का
ब्रह्मांड सहित नाश हो जाता है । (३) जड़ खान में।
तुलसी साहिब (हाथरसवाले) २४५
बिन सतगुरु ब्याकुल हिये, जियरा धरत न धीर ।
पीर पिया बिन को हरै, तुलसी गगन गँभीर ॥ ८ ॥
(७)
ब्याकुल बिरह दिवानी, झड़ै नित नैनन पानी ॥ टेक ॥
हर दम पीर पिया की खटकै, सुधि बुधि बदन हिरानी ॥१॥
होस हवास नहीं कुछ तन मैं, बेदम जीव भुलानी ॥२॥
बहु तरंग चित चेतन नाहीं, मन मुरदे की बानी ॥३॥
नाड़ी बैद बिथा नहिं जानै, क्यौँ औषद् दे आनी ॥४॥
हिये मैं दाग जिगर के अंदर, क्या कहि दरद बखानी ॥५॥
सतगुरु बैद बिथा पहिचानैं, बूटी है उनकी जानी ॥६॥
तुलसी यह रोग रोगिया बूझै, जिस को पीर पिरानी ॥७॥
(८)
प्रीतम पीर पिरानी, दरद कोइ बिरले जानी ॥ टेक ॥
डसत भुवंग चढ़त सननननन, जहर लहर लहरानी ॥१॥
घनन घनन घन्नाटी आवै, भावै अन्न न पानी ॥२॥
भँवर चक्र की उठत घुमेरैं, फिरै दसो दिसि आनी ॥३॥
अंदर हाल बिहाल हलावत, दुरगम प्रीति निभानी ॥४॥
आसिक इसक इसक आसिक से, करना मौत निसानी ॥५॥
मुरदा है करि खाक मिली अब, जब पट अमर लिखानी ॥६॥
पिय को रोग सोग तन मन मैं, सतगुरु सुधि अलगानी ॥७॥
तुलसी यह मारग मुस्किल का, धड़ बिन सीस बिकानी ॥८॥
॥ विनय ॥
कुंडलिया
बार बार बिनती करूँ सतगुरु चरन निवास ॥
सतगुरु चरन निवास बास मोहिं दीन्ह लखाई ।
नित नित करूँ बिलास पास घर अपने आई ॥
२४६ शब्द संग्रह
मैं अति पत मत हीन दीन देखा मोहिँ साईँ ।
लीन्हा अंग लगाय कहूँ अस कौन बड़ाई ॥
तुलसी मैं अति हीन हूँ दीन्हा अगम अवास ।
बार बार बिनती करूँ सतगुरु चरन निवास ॥
॥ भेद ॥
(१)
रेख़ता
पैठ मन पैठ दरियाव दर आप मैं ।
कँवल बिच झाज¹ मैं कमठ राजै ॥
होत जहाँ सोर घनघोर घट मैं लखै ।
निरख मन मौज अनहद्द बाजै ॥
गगन की गिरा पर सुरत से सैल कर ।
चढ़ै तिल तोड़ घर अगम साजै ॥
दास तुलसी कहै पच्छिम के द्वार पर ।
साहिब घर अद्भुत बिराजै ॥
(२)
कुंडलिया
सुरत चढ़ि गई अकास मैं सोर भया ब्रह्मांड ॥
सोर भया ब्रह्मांड अंड मैं धधक चढ़ाई ।
जब फूटा असमान गगन मैं सहज समाई ॥
सुन्न सहर के बीच ब्रह्म से भया मिलापा ।
परभातम पद देख देख कर भया हुलासा ॥
तुलसी गति मति लखि पड़ी निरखि लखा सब अंड ।
सुरत चढ़ि गई अकास मैं सोर भया ब्रह्मांड ॥
(१) जहाज़ ।
तुलसी साहब (हाथरसवाले) २४७
॥ उपदेश ॥
होली
कैसे जल भरत गगरिया, तोरी भीँजी न नेक अँगुरिया ॥टेक
सतगुरु घाट गई बिन जाने, पैरी न चीन्ह पकरिया ।
सागर थाह अथाह अगम को, कोइ भर नहिँ जात अनरिया ॥१
सासु ननद के अनँद पिया मोरे, डारैंगे फोड़ गगरिया ।
रीती१ जाति फिरी बिन पानी, मानत नाहिँ बहुरिया ॥२॥
सासू ससुर जेठ जुलमाई, साईँ ने सील सँवरिया ।
बीतत दिवस रही अब रजनी, खुलत न प्रेम किवरिया ॥३॥
तुलसी ताव दाव यहि औसर, पिय सँग पैठ नगरिया ।
सूरति साज सजो नभ मंदर, अंदर बीच डगरिया ॥४॥
॥ मूर्त्ति पूजा ॥
(१)
सवैया
नर को यही ठाठ बैराट बनो ।
अस श्रीमंत२ मैं कह्यो ब्यास बखाना ॥ १ ॥
दुतिया असकंध मैं बूझ बिचारि ।
नहीं कह्यो पूजन काठ पषाना ॥ २ ॥
गीता मैं भाखि कही भगवान ।
सो धरम तजा जिन मोहिँ पिछाना ॥ ३ ॥
पूरन ब्रह्म वेदांत कहे ।
तुहो आप अपनपौ आप भुलाना ॥ ४ ॥
पाहन पूजत जन्म गयो ।
कछु सूझि परी नहिँ लाभ न हाना ॥ ५ ॥
आसा जाइ बसे जड़ मैं ।
जब अंत समय जेहि माहिँ समाना ॥ ६ ॥
(१) खाली । (२) भागवत ।
२४८ शब्द संग्रह
बेद की प्रीति की रीति करी ।
कर्म कांड रचे भव जन्म सिराना ॥ ७ ॥
यह तत ज्ञान कहै तुलसी ।
तैं पत्थर में पग्मेसुर जाना ॥ ८ ॥
(२)
तन के तत मंदर को देखौ जाई ।
आतम सा देव जाहि पूजौ भाई ॥
पाहन की मूरत का झूठ पसारा ।
तुलसी पूजै बेहोस जन्म बिगारा ॥
॥ निन्दा ॥
(१)
रेखता
निंदा साध संत को नित्त करै,
काला मुँह कर काल घुमावता है ॥
जुग जुग नरक की खानि पड़े,
जम जाल जँजीर फिर पावता है ॥
तुलसी कुबास बेहाल मरै,
दर हाल का स्वाल कहावता है ॥
(२)
कवित्त
साध संत से उपाध रहत बेसवा१ के साथ ।
बड़े कुटिल हैं कुपथ चलैं पंथ ना निहारि के ॥ १ ॥
कर्मन के मैले और बिष रस के पेले ।
सो ऐसे हरामखोर दोजख में परत हैं ॥ २ ॥
देखत के नीके और करनी के फीके ।
सो काढ़ि काढ़ि टोके उपद्रव को खड़े हैं ॥ ३ ॥
(१) कसबी ।
तुलसी साहिब (हाथरसवाले) २४६
खोट मोट मानी आठो गाँठ के हरामी ।
सो ऐसे कुटिल कामी काम राग हू मैं भरे हैं ॥ ४ ॥
देखत के ज्ञानी कूर खान की निसानी ।
अधम ऐसे अभिमानी सो जानि हानि करत हैं ॥ ५ ॥
साचे संसार लार संतन से फेर फार ।
तुलसी मुख परत छार१ छली छिद्र भरे हैं ॥ ६ ॥
अरिल
इंद्री रस सुख स्वाद बाद ले जन्म बिगारा ।
जिभ्या रस बस काज पेट भया बिष्टा सारा ॥
टुक जीवन के काज लाज मन मैं नहिं आवै ।
अरे हाँ रे तुलसी काल खड़ा सिर उपर घड़ी घड़ियाल बजावै ॥
॥ आहरण ॥
कुंडलिया
जग जग कहते जुग भये जगा न एकै बार ॥
जगा न एकै बार सार कहो कैसे पावै ।
सोवत जुग जुग भये संत बिन कौन जगावै ॥
पड़े भरम के माहिँ बंद से कौन छुड़ावै ।
जो कोइ कहै बिबेक ताहि की नेकु न भावै ॥
तुलसी पंडित भेष से सब भूला संसार ।
जग जग कहते जुग भये जगा न एकै बार ॥
॥ बारहमासा लावनी ॥
आली असाढ़ के मास बिरह उठि बादल घहराने ।
चहुँ दिस चमकै बीज बिकल पिया के बिन हैराने ॥
खबर बिन धीरज नहिं आवै ।
तन मन बदन बेहाल बिपति मैं नहिं कोइ कुछ भावै ॥
(१) धूल ।
३२
२५० शब्द संग्रह
कहूँ नहिं दिल दारुन अटकै ।
हर दम पिय की पीर दरस बिन मन मोरा भटकै ॥ १ ॥
सखि सावन के मास सोक मैं सुन्दर घबरानी ।
रिमझिम बरसै मेघ मोर दादुर की सुन बानी ॥
जिगर अन्दर जिय लहरावै ।
तड़पै तन के माहिँ हाय पिय खोजै कहँ पावै ॥
रही हिये मैं पिय को रट कै । हर दम पिय० ॥ २ ॥
भर भादौँ झड़ मेघ अखंडित बरसै जल धारा ।
आवै पिय की पीर नीर नैनाँ बहै जस धारा ॥
सुरख सब अँखियन मैं लाली ।
मारै गोसा तानि तीर हिये ज्योँ कसकै भाली ॥
कलेजे अन्दर मैं खटकै । हर दम पिय० ॥ ३ ॥
ऋतु कुआर के मास आस कागा सँग सुध बिसरी ।
हंस सिरोमनि मूल भूल से तजि सेवा मिसरी ॥
मरम संगत बिन कहँ पाऊँ ।
बिन सतगुरु के बाट घाट घर चढ़ि कैसे जाऊँ ॥
सुरत मन बयौँकरके लटकै । हर दम पिय० ॥ ४ ॥
कातिक तिल के माहिँ जाय सोइ सुधि बुधि दरसावै ।
अष्ट कँवल दल द्वार पार पद हद सब समझावै ॥
सरन ह्वै सतगुरु की चेली ।
मैली बुद्धि निकारि सार पावै जब लखि हेली ॥
चाँदनी हियरे मैं छिटकै । हर दम पिय० ॥ ५ ॥
अघ अगहन के मास पाप पुन सब जब जरि जावै ।
निर्मल नीर बनाय जाय सोइ तिरबेनी न्हावै ॥
तुलसी साहिब (हाथरसवाले) २५१
करम का भोग भरम छूटै ।
बिन बेनी असनान पकड़ जम घर घर के लूटै ॥
बचै नहिँ कोइ सब को पटकै । हर दम पिय० ॥ ६ ॥
पूस पुरुप की आस बास बिन नहिँ जिव निस्तारा।
सतगुरु केवट गैल गवन करि जब जावै पारा ॥
मिलै जब पिउ परसै प्यारी ।
सुन्दर सेज बिछाय पिया सँग सोवै कर यारी ॥
अरज करि प्रीतम से हटकै । हर दम पिय० ॥ ७ ॥
माघ मनोरथ प्रीति परम पद की सुधि संभारी ।
ऐसी हैँ कोइ नारि जगत तजि तन मन से न्यारी ॥
सुरत की डोरी लै लावै ।
मूल मुकर१ की राह दाव करि सहजहि चढ़ि जावै ॥
कुमति कुनबे की बुधि झटकै । हर दम पिय० ॥ ८ ॥
फागुन फरक निकारि यार सँग खेलै खुल होली ।
आस अबीर उड़ाय गुनन की भर मारै झोली ॥
अरगजा घिसि चन्दन लेपै ।
नील सिखर की राह सुरत चढ़ि सुन्दर में चेपै२ ॥
चरन में हित चित से गठि कै । हर दम पिय० ॥ ९ ॥
चतुर सहेली चेत हेत हियरे से मन लावै ।
पल पल पालै प्रीति रीति पिया को जो रस चावै ॥
अमल करि होवै मतवारी ।
नसा नैन के माहिँ बिसरि गइ सुधि बुधि सब सारी ॥
गरक३ डोरी बाँधै बटि कै । हर दम पिय० ॥ १० ॥
(१) दर्पन । (२) चिपक जाय । (३) डूबी हुई, मतवाली ।
२५२ शब्द संग्रह
बुन्द बैसाख की साख सिन्ध गति सन्तन ने गाई ।
सुनि के सज्जन होय समझ करि छोड़ै चतुराई ॥
दीन दिल दुरमत को छोड़ै ।
मन मकरन्द१ की जानि मानि तन मन को सब तोड़ै ॥
लहर सतसँग की जब चटकै । हर दम पिय० ॥११॥
जबर जेठ की रीति करै कोइ किंकर जब होवै ।
मन के बिखम विकार काढ़ि के तुलसी सब धोवै ॥
भरम तजि भक्ति भजन करना ।
मन मूरख को बाँधि पकड़ कर जीवतही मरना ॥
निकल घट न्यारी ह्वै फटकै ।
हर दम पिय की पीर दरस बिन मन मोरा भटकै ॥१२॥
काष्ठ जिह्वास्वामी (देव)
जीवन समय—सं० १८३४ से १६०६ तक । जन्म स्थान—काशी । सतसंग
स्थान—काशी और रामनगर । जाति—सरजूपारी ब्राह्मण भीटरी मिश्र शाखा के ।
इन का विवाह काशी ही में हो गया था परंतु वैराग्य उपजने पर गृहस्थ
आश्रम को