संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतुलसी साहिब (हाथरसवाले) २४६
खोट मोट मानी आठो गाँठ के हरामी ।
सो ऐसे कुटिल कामी काम राग हू मैं भरे हैं ॥ ४ ॥
देखत के ज्ञानी कूर खान की निसानी ।
अधम ऐसे अभिमानी सो जानि हानि करत हैं ॥ ५ ॥
साचे संसार लार संतन से फेर फार ।
तुलसी मुख परत छार१ छली छिद्र भरे हैं ॥ ६ ॥
अरिल
इंद्री रस सुख स्वाद बाद ले जन्म बिगारा ।
जिभ्या रस बस काज पेट भया बिष्टा सारा ॥
टुक जीवन के काज लाज मन मैं नहिं आवै ।
अरे हाँ रे तुलसी काल खड़ा सिर उपर घड़ी घड़ियाल बजावै ॥
॥ आहरण ॥
कुंडलिया
जग जग कहते जुग भये जगा न एकै बार ॥
जगा न एकै बार सार कहो कैसे पावै ।
सोवत जुग जुग भये संत बिन कौन जगावै ॥
पड़े भरम के माहिँ बंद से कौन छुड़ावै ।
जो कोइ कहै बिबेक ताहि की नेकु न भावै ॥
तुलसी पंडित भेष से सब भूला संसार ।
जग जग कहते जुग भये जगा न एकै बार ॥
॥ बारहमासा लावनी ॥
आली असाढ़ के मास बिरह उठि बादल घहराने ।
चहुँ दिस चमकै बीज बिकल पिया के बिन हैराने ॥
खबर बिन धीरज नहिं आवै ।
तन मन बदन बेहाल बिपति मैं नहिं कोइ कुछ भावै ॥
(१) धूल ।
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