संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 245, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें२३६ शब्द संग्रह
॥ तीर्थ व्रत ॥
अरिल
तीरथ व्रत में फिरे बहुत चित लाइ कै ।
जल पखान को पूजि मुए पछिताइ कै ॥
बस्तु न बूझी जाइ अपाने हाथ में ।
अरे हाँ पलटू जो कुछ मिलै सो मिलै संत के साथ में ॥
॥ मंगल ॥
जनमिउँ दुख की राति, परिउँ भौसागर हो ।
सोइ गइउँ भ्रम माहिँ, कुमति कै आगर हो ॥ १ ॥
सतगुरु दिहिनि जगाइ, उठिउँ अकुलाई हो ।
टूटि गइल भ्रम फंद, परम सुख पाई हो ॥ २ ॥
पिय को दिहिनि मिलाइ, हिये मोहिँ लीन्हा हो ।
अपनी दासी जानि, परम पद दीन्हा हो ॥ ३ ॥
सत्त सुकृति कै घैला१, प्रेम कै लेजुर२ हो ।
पनियाँ भरौँ डकोरि३, माँग झरि सेंदुर हो ॥ ४ ॥
सासु मोरि सुतै गजओबरि४, ननद मोरि अँगना हो ।
हम धन सूतैँ धवराहर५, पिय सँग जगना हो ॥ ५ ॥
झिरिहिरि बहै बयारि, अमी रस ढरकै हो ।
वरमी६ नौरँगिया कै डारि, चंदन गछ मरकै६ हो ॥ ६ ॥
तेहि चढ़ि बोलै हंस, सबद सुनि बाउर हो ।
मंगल पलटूदास, जगति कै नाउर७ हो ॥ ७ ॥
(१) घड़ा । (२) रस्सी । (३) पानी को झकझोर कर जिसमें खर कतवार
हट जाय । (४) इतना बड़ा कमरा जिस के दरवाज़े में से हाथी चला जाय ।
(५) ऊपर का कोठा । (६) झुकना । (७) नाऊ जिस के शुभ अवसरों पर