संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतुलसी साहिब (हाथरसवाले) २४१
कमानी काल के हाथा । करै जम जीव की घाता ॥
पड़ा मगरूर¹ क्या सोवै । बहुर फिर सीस धरि रोवै ॥२॥
अगर यों सोच अपने सें । गये दिन बीत सपने में ॥
बदन सही पवन पानी । मलामत² हाड़ मिल सानी ॥३॥
गंदगी बीच अंदर में । बदन बदबोय मंदर में ॥
अरे नित क्या अन्हाता है । मैल मन का न जाता है ॥४॥
करेले नीम की भाई । कभी जावै न कड़वाई ॥
अरे दुरगंध का भाँड़ा । निरख कोइ संत ने छाड़ा ॥५॥
खलक दो दिन तमासा यों । परख पानी बतासा ज्यों ॥
अगर यों जान जिंदगानी । अबर ओला घुलै पानी ॥६॥
अवस³ तन यों बिनसता है। इधर घर का न रस्ता है ॥
मिर्ग की नाभि कस्तूरी । भटक ढूँढै जो बन मूरी ॥७॥
तेरा महबूब तेरे में । वस्तु गह ढूँढ़ डेरे में ॥
सगुनिया संत से पावै । आप मैं आप दरसावै ॥८॥
करै सतसंग मन टूटै । मलामत बुद्धि की छूटै ॥
गुरू मिल मैल कूँ काढ़ै । ज्ञान की उग्रता⁴ बाढ़ै ॥ ९ ॥
सुरत जब सीलता पावै । गगन की राह चढ़ जावै ॥
होय पति प्रीति निरधारा । मिलै तुलसी पदम प्यारा ॥१०॥
(२)
क्या सोवत गाफिल चेत, सिर पर काल खड़ा ॥टेक॥
जोर जुलम की रोति बिचारी, करि माया से हेत ।
जम की जबर खबर नहिँ जानी, बाँधि नरक दुख देत ॥१
बिनसै बदन अगिन बिच जारैँ, खीर खाँड रस लेत ।
फिरिफिरि काल कमान चढ़ावै, मार लेत खुल खेत ॥२॥
(१) अहंकारी । (२) गंदगी । (३) व्यर्थ । (४) तेज़ी ।
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