सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 267 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 250

तुलसी साहिब (हाथरसवाले) २४१
कमानी काल के हाथा । करै जम जीव की घाता ॥
पड़ा मगरूर¹ क्या सोवै । बहुर फिर सीस धरि रोवै ॥२॥
अगर यों सोच अपने सें । गये दिन बीत सपने में ॥
बदन सही पवन पानी । मलामत² हाड़ मिल सानी ॥३॥
गंदगी बीच अंदर में । बदन बदबोय मंदर में ॥
अरे नित क्या अन्हाता है । मैल मन का न जाता है ॥४॥
करेले नीम की भाई । कभी जावै न कड़वाई ॥
अरे दुरगंध का भाँड़ा । निरख कोइ संत ने छाड़ा ॥५॥
खलक दो दिन तमासा यों । परख पानी बतासा ज्यों ॥
अगर यों जान जिंदगानी । अबर ओला घुलै पानी ॥६॥
अवस³ तन यों बिनसता है। इधर घर का न रस्ता है ॥
मिर्ग की नाभि कस्तूरी । भटक ढूँढै जो बन मूरी ॥७॥
तेरा महबूब तेरे में । वस्तु गह ढूँढ़ डेरे में ॥
सगुनिया संत से पावै । आप मैं आप दरसावै ॥८॥
करै सतसंग मन टूटै । मलामत बुद्धि की छूटै ॥
गुरू मिल मैल कूँ काढ़ै । ज्ञान की उग्रता⁴ बाढ़ै ॥ ९ ॥
सुरत जब सीलता पावै । गगन की राह चढ़ जावै ॥
होय पति प्रीति निरधारा । मिलै तुलसी पदम प्यारा ॥१०॥
(२)
क्या सोवत गाफिल चेत, सिर पर काल खड़ा ॥टेक॥
जोर जुलम की रोति बिचारी, करि माया से हेत ।
जम की जबर खबर नहिँ जानी, बाँधि नरक दुख देत ॥१
बिनसै बदन अगिन बिच जारैँ, खीर खाँड रस लेत ।
फिरिफिरि काल कमान चढ़ावै, मार लेत खुल खेत ॥२॥
(१) अहंकारी । (२) गंदगी । (३) व्यर्थ । (४) तेज़ी ।
२१