संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ शब्द संग्रह
बिष रस रंग संग बहु कीन्हा, करि करि बैस ब्रितेत१ ।
वृद्ध बनाय बूढ़ तन भइया, कारे केस सपेद ॥३॥
सुत दारा आदर अलसाने, बुढ़वा मरै परेत ।
छलबल माया करि गई रे, या दुनिया के हेत ॥४॥
मनी मान से धनी न चीन्हा, चिड़िया चुगि गइ खेत ।
तुलसी चरन सरन सतगुरु बिन, ग्रासत रवि जस केत ॥५॥
॥ बिरह ॥
(१)
सखी मोहिं नींद न आवै री । एरी बैरन बिरह जगावै ॥१
सूनी सेज पिया बिन ब्याकुल । पीर सतावै री ॥२॥
रैन न चैन दिवस दुख ब्यापै । जग नहिं भावै री ॥३॥
तलफत बदन बिना सुख सइयाँ । सब जरि जावै री ॥४॥
बिषधर२ लहर डसै नागिन सी । ज्यौं जस खावै री ॥५॥
देवै मौत दई बिरहन को । होते मरि जावै री ॥६॥
कैफ़३ बिना तुलसी तन सूखै । जिय तरसावै री ॥७॥
(२)
पी की मोहिं लहर उठत खुटत रैन नाहीं ।
कहा कहूँ करमन की रेख हिये की दरदाई ॥ १ ॥
अँखियाँ दुर दुरत नीर सखियाँ सुख नाहीं ।
पपिहा पिउ पिउ के बोल खोलत खिसियाई ॥ २ ॥
जियरा जरजर पिरात संत रटत साईं ।
लाई सुति चरन सरन हित चित चिन्हवाई ॥ ३ ॥
मेरे मन की मुराद साध संगत चाही ।
खोजै खुल खुल बिसेष लेखै अपनाई ॥ ४ ॥
(१) ख़तम । (२) साँप । (३) नशा ।