संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतुलसी साहब (हाथरसवाले) २४७
॥ उपदेश ॥
होली
कैसे जल भरत गगरिया, तोरी भीँजी न नेक अँगुरिया ॥टेक
सतगुरु घाट गई बिन जाने, पैरी न चीन्ह पकरिया ।
सागर थाह अथाह अगम को, कोइ भर नहिँ जात अनरिया ॥१
सासु ननद के अनँद पिया मोरे, डारैंगे फोड़ गगरिया ।
रीती१ जाति फिरी बिन पानी, मानत नाहिँ बहुरिया ॥२॥
सासू ससुर जेठ जुलमाई, साईँ ने सील सँवरिया ।
बीतत दिवस रही अब रजनी, खुलत न प्रेम किवरिया ॥३॥
तुलसी ताव दाव यहि औसर, पिय सँग पैठ नगरिया ।
सूरति साज सजो नभ मंदर, अंदर बीच डगरिया ॥४॥
॥ मूर्त्ति पूजा ॥
(१)
सवैया
नर को यही ठाठ बैराट बनो ।
अस श्रीमंत२ मैं कह्यो ब्यास बखाना ॥ १ ॥
दुतिया असकंध मैं बूझ बिचारि ।
नहीं कह्यो पूजन काठ पषाना ॥ २ ॥
गीता मैं भाखि कही भगवान ।
सो धरम तजा जिन मोहिँ पिछाना ॥ ३ ॥
पूरन ब्रह्म वेदांत कहे ।
तुहो आप अपनपौ आप भुलाना ॥ ४ ॥
पाहन पूजत जन्म गयो ।
कछु सूझि परी नहिँ लाभ न हाना ॥ ५ ॥
आसा जाइ बसे जड़ मैं ।
जब अंत समय जेहि माहिँ समाना ॥ ६ ॥
(१) खाली । (२) भागवत ।