सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 267 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 244

पलटू साहिब २३५
हरि धरि मेरो रूप करै सब काम है।
अरे हाँ पलटू बीच मँहै इक नाम मोर बदनाम है॥
॥ निन्दक ॥
(१)
कुंडलिया
निन्दक जीवै जुगन जुग काम हमारा होय ॥
काम हमारा होय बिना कौड़ी कौ चाकर ।
कमर बाँधि के फिरै करै तिहुँ लोक उजागर¹ ॥
उसे हमारी सोच पलक भर नाहिं बिसारी ।
लगो रहै दिन रात प्रेम से देता गारी ॥
भक्त कँहै दृढ़ करै जगत को भरम छुड़ावै ।
निन्दक गुरू हमार नाम से वही मिलावै ॥
सुनि के निन्दक मरि गया पलटू दिया है रोय ।
निन्दक जीवै जुगन जुग काम हमारा होय ॥
(२)
रेख़्ता
देखि के निंदकहिँ करौँ परनाम मैं,
धन्य महराज तुम भक्ति धोया ।
किहा निस्तार तुम आइ संसार मैं,
भक्त कै मैल बिनु दाम खोया ॥
भयो परसिद्ध परताप से आप के,
सकल संसार तुम सुजस बोया ।
दास पलटू कहैं निंदक के मुए से,
भया अकाज मैं बहुत रोया ॥
(१) रोशन, मशहूर ।