संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४४ शब्द संग्रह
बीज कड़क कस कस करूँ, सुधि बुधि रहत न हाथ ।
साथ मिलै पिया पंथ को, मारग चलूँ दिन रात ॥४॥
सुरति निरति डोरी करूँ, मन मत खंभ गड़ाइ ।
लै की लहर उपर मिली, झूलो सुरति चढ़ाइ ॥ ५ ॥
ये सावन तुलसी कहै, खोजो सतसँग माहिँ ।
गाइ गवन सज्जन करै, बूझै सत मति पाइ ॥ ६ ॥
(६)
सावन
पिया बिन बिरहन बावरी, दई¹ दुख दियो री कठोर ।
मोरि खबर सुधि ना लई, ज्योँ बिन चंद चकोर ॥ १ ॥
चकवा चकई बिछोह की, बरनूँ कौन बयान ।
नदिया पार चकवा रहै, चकई वार मिलाप ॥ २ ॥
रैन बिलग सुनती हती, मोरे हिये बरतत आज ।
बिलग पिय से मरिबो भलो, यह दुख सह्यो न जात ॥३॥
सब सिंगार फीका लगै, पिय बिन कछु न सुहाइ ।
हाय हाय तलफत रहूँ, कहो केहि जाइ सुनाइ ॥ ४ ॥
लोग बटाऊ री बिदेस के, नहिँ पर पीर पीछान ।
चरन बिना चहुँ दिसि फिरी, नहिँ कछु जियरा जुड़ान ॥५॥
कल्प² कल्प कलपत भये, जुग जुग जोवत बाट ।
कोइ री सुहागिनि ना मिली, पूछूँ पिया घर घाट ॥६॥
नर तन नगर डगर मिलै, कहैँ सब संत सुजान ।
फिरि पसु पंछिन में नहीं, जड़वत³ जीव भुलान ॥ ७ ॥
(१) दैव, ईश्वर । (२) ब्रह्मा का एक दिन जो एक हज़ार युग या ४३ करोड़
बीस लाख बरस के बराबर होता है और जिस के बीतने पर समस्त सृष्टि का
ब्रह्मांड सहित नाश हो जाता है । (३) जड़ खान में।