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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

दूलनदासजी १६३
और कछू हम चाहित नाहीं, तुम्हारे नाम चरन तैं काज ॥३॥
दूलनदास गरीब निवाजहु, साईँ जगजीवन महराज ॥४॥
(२)
साईँ दरस माँगौँ तोर, अपने जन जानि साईँ मान राखहु मोर ॥१॥
अपथ१ पंथ न सूझि इत उत, प्रबल पाँचो चोर ।
भजन केहि विधि करौँ साईँ, चलत नाहीं जोर ॥ २ ॥
नात लाइ दुरात२ काहे, पतित जन की दौर ।
बचन अवधि३ अधार मेरे, आसरा नहिं और ॥ ३ ॥
हेरिये करि कृपा जन तन, ललित४ लोचन कोर ।
दास दूलन सरन आयो, राम बंदी-छोर ॥ ४ ॥
(३)
साईँ तेरे कारन नैना भये बैरागी ।
तेरा सत दरसन चहौँ, कछु और न माँगौ ॥ १ ॥
निसु बासर तेरे नाम की, अंतर धुनि जागी ।
फेरत हौँ माला मनौँ५, अँसुवन भरि लागी ॥ २ ॥
पलक तजी इत उक्ति तैँ६, मन माया त्यागी ।
दृष्टि सदा सत सनमुखी, दरसन अनुरागी ॥ ३ ॥
मदमाते राते मनौँ५, दाधे बिरह आगी ।
मिलि प्रभु दूलनदास के, करु परम सुभागी ॥ ४ ॥
(४)
सुनहु दयाल मोहिँ अपनावहु ॥ टेक ॥
जन मन लगन सुधारन साईँ, मोरि बनै जो तुम्हहिँ बनावहु१
इत उत चित्त न जाइ हमारा, सूरत चरन कमल लपटावहु॥२
तबहूँ अब मैं दास तुम्हारा, अर्ज जिनि बिसरै। जिनि बिसरावहु॥३
दूलनदास के साईँ जगजीवन, हमहूँ कौँ भक्तन माँ लावहु॥४
(१) कुराह। (२) हटाते हो। (३) प्रतिज्ञा। (४) सुंदर, मोहनी। (५) गोया
कि। (६) इधर अर्थात संसार की चतुरता (उक्ति) की ओर से आँख मूँद ली।

१६४ शब्द संग्रह
(५)
साईँ सुनहु बिनती मोरि ॥ टेक
बुधि बल सकल उपाय-हीन मैं, पाँयन परौँ दोऊ कर जोरि १
इत उत कतहूँ जाइ न मनुवाँ, लागि रहै चरनन माँ डोरि ॥२
राखहु दासहिँ पास आपने, कस को सकिहै तोरि ॥३॥
आपन जानि कै मेटहु मेरे, औगुन सब क्रम भ्रम खोरि¹ ॥४॥
केवल एक हितू तुम मेरे, दुनियाँ भरी लाख करोरि ॥५॥
दुलनदास के साईँ जगजीवन, माँगौँ सत दरस निहोरि ॥६॥
(६)
साईँ भजन ना करि जाइ ।
पाँच तसकर संग लागे, मोहिँ हरकत² धाइ ॥ १ ॥
चहत मन सतसंग करना, अधर बैठि न पाइ ।
चढ़त उतरत रहत छिन छिन, नाहिँ तहँ ठहराइ ॥२॥
कठिन फाँसी अहै जग की, लियो सबहिँ बझाइ ।
पास मन मनि नैन निकटहिँ, सत्य गयो भुलाइ ॥ ३ ॥
जगजिवन सतगुरु करहु दाया, चरन मन लपटाइ ।
दास दूलन बास सत माँ, सुरत नहिँ अलगाइ ॥ ४ ॥
(७)
प्रभु तुम किहेउ कृपा बरियाईँ³ ।
तुम कृपाल मैं कृपा अलायक,⁴ समुझि निवजतेहु साईँ ॥१॥
कूकुर धोये होइ न बाछा,⁵ तजै न नीच निचाई ।
बगुला होइ न मानस-बासी,⁶ बसहि जे बिषै तलाई ॥२॥
(१) कसर, ऐब । (२) रोकते हैं । (३) ज़बरदस्ती । (४) अजोग ।
(५) गऊ का बच्चा । (६) मानसरोवर का बासी ।

दूल्लनदासजी १४५
प्रभु सुभाउ अनुहारि चाहिये, पाय चरन सेवकाई ।१
गिरगिट पौरुष करै कहाँ लगि, दौरि कँडौँरे२ जाइ ॥३॥
अब नहिँ बनत बनाये मेरे, कहत अहौँ गोहराई ।
दूल्लनदास के साँईँ जगजीवन, समरथ लेहु बनाई ॥४॥
• ॥ प्रेम ॥
(१)
धनि मोरि आज सुहागिन घड़िया ॥ टेक ॥
आज मोरे अँगना सन्त चलि आये, कौन करौँ मिहमानिया१
निहुरि निहुरि मैं अँगना बुहारौँ, मानो मैं प्रेम लहरिया ॥२
भाव कै भात प्रेम कै फुलका, ज्ञान की दाल उतरिया ॥३॥
दूल्लनदास के साँईँ जगजीवन, गुरु के चरन बलिहरिया ॥४॥
(२)
जागु री मोरि सुरत पियारी ।
चरन कमल छबि झलक निहारी ॥ १ ॥
बिसरि जाइ दे यह संसारी ।
धरहु ध्यान मन ज्ञान बिचारी ॥ २ ॥

१६६ शब्द संग्रह
नाम सनेही बावरे, दृग भरि भरि आवत नीर हो ॥३॥
रस-मतवाले रस-मसे¹, यहि लागी लगन गंभीर हो ॥४॥
सखि इश्क पिया से आसिकाँ, तजि दुनिया दौलत भीर हो² ॥५॥
सखि गोपीचन्दा भरथरी, सुलताना भयो फकीर हो ॥६॥
सखि दूलन का से कहै, यह अटपटि³ प्रेम की पीर हो ॥७॥
(४)
हुआ है मस्त मंसूरा, चढ़ा सूली न छोड़ा हक़।
पुकारा इश्क़बाज़ों को, अहै मरना यही बरहक़ ॥ १ ॥
जो बोले आशिकाँ याराँ, हमारे दिल मैं है जी शक।
अहै यह काम सूराँ का, लगाये पीर से अब तक ॥ २ ॥
शम्सतबरेज़ की सीफ़त, जहाँ मैं ज़ाहिरा अब तक।
निज़ामुद्दीन सुलताना, सभी मेटे दुनी के धक ॥ ३ ॥
निरख रहे नूर अल्लह का, रहे जीते रहे जब तक।
हुआ हाफ़िज़ दिवाना भी, भये ऐसे नहीं हर यक ॥ ४ ॥
सुना है इश्क़ मजनूँ का, लगी लैला कि रहती ज़क।
जलाकर ख़ाक तन कीन्हा, हुए वह भी उसी माफ़िक़ ॥५॥
दुलन जन को दिया मुरशिद, पियाला नाम का थकथक।
वही है शाह जगजीवन, चमकता देखिये लक़लक़ ॥६॥
(५)
अब तो अफ़सोस मिटा दिल का, दिलदार दीद मैं आया है।
संताँ की सुहबत मैं रह कर, हक़ हादी को सिर नावा है॥१॥
उपदेस उग्र गहि सत्त नाम, सोइ अष्ट जाम धुनि लाया है।
मुरशिद की मेहर हुई यौं कर, मज़बूत जोश उपजाया है ॥२॥
(१) रस मैं पगे। (२) प्रेमी जन जिन की प्रीति प्रीतम से लगी है उन्हें
संसार और धन माल की चिन्ता नहीं रहती। (३) अड़बढ़, अनोखी।

or similar, but the word is definitely "अंदर".

Everything is clear and verified. Formatting should follow the prompt line by line with , , etc.हर वक्त़ तसौवर मैं सूरत, सूरत अंदर झलकाया है ।
बूअली क़लंदर औ फ़रीद, तबरेज़ वही मत गाया है ॥३॥
कर सिद्क़ सबूरी लामकान, अल्लाह अलख दरसाया है ।
लखि जन दूलन जगजिवन पीर. महबूब मेरे मन भाया है॥
ख़ाविन्दख़ास ग़ैबी हजूर, वह दिल अंदर मैं आया है॥४॥
(६)
ऐसा रंग रँगैहौँ, मैं तो मतवालिन होइहौँ ॥ टेक ॥
भट्ठी अधर लगाइ, नाम की सोज१ जगैहौँ ।
पवन सँभारि उलटि दै झौँका, करकट कुमति जलैहौँ ॥१
गुरुमति लहन२ सुरति भरि गागरि, नरिया नेह लगैहौँ ।
प्रेम नीर दै प्रीति पुचारी, यहि विधि मदवा चुवैहौँ ॥२॥
अमल अगारी नाम खुमारी, नैन

१६८ शब्द संग्रह
गौरि गनेस औ सेष रटत जेहिँ, नारद सुक१ सनकादि पुकार ।
चारिहुमुख जेहिँ रटत बिधाता२, संभूराज सिव मन सिंगार ४
(२)
भक्तन राम चरन धुनि लाई ॥ टेक ॥
चारिहु जुग गोहारि प्रभु लागे, जब दासन गोहराई ॥१॥
हिरनाकुस रावन अभिमानी, छिन माँ खाक मिलाई ॥२॥
अबिचल भक्ति नाम की महिमा, कोऊ न सकत मिटाई ॥३॥
कोउ उसवास३ न एकै मानहु, दिन दिन की दिनताई ॥४॥
दुलनदास के साइँ जगजीवन, है सतनाम दुहाई ॥ ५ ॥
॥ झूलना ॥
(१)
पंखा चँवर मुरछल ढुरैँ, सूबा सबै खिजमत करैँ ।
जरबफ़ को तंबू तन्यो, बैठक बन्यो मसनंद का ॥
दिन रात झाँझरि बाजती, सुथरी सहेली नाचती ।
पिलसूज४ आगे योँ जलै, उजियार मानौ चंद का ॥
एकै अतर चोवा चमेली, बेला खुसबोई लिये ।
एकै कटोरे मैं किये, सरबत सलोना कंद का ॥
हिन्दू तुरुक दुइ दीन आलम, आपनी ताबीन५ मैं ।
यह भी न दूलन खूब है, करु ध्यान दसरथ-नंद का ॥
(२)
बर६ जे अठारह बरन मैं, बितपन्न७ ह ब्याकरन मैं ।
पहिरे खराऊँ चरन मैं, जानैँ न स्वाद सरीर का ॥
कुस मुद्रिका कर राखते, जे देव-बानी भाखते ।
नहिँ अन्न आमिष८ चाखते, नित पान करते छीर का ॥
(१) सुकदेव । (२) ब्रह्मा । (३) संशय । (४) पतील-सोज़ यानी चौमुखी
दीवट । (५) ताबेदारी । (६) श्रेष्ठ । (७) प्रवीन, कुशल । (८) मांस ।

दूलनदासजी १६५
धोती उपरना अंग मैं, रत बेद विद्या रंग मैं ।
विद्यार्थी बहु संग मैं, जिन्ह वास तीरथ तीर का ॥
सूतहिं सदा भुइँ सेज जे, पूरे तपस्या तेज के ।
यह भी न दूलन खूब है, करु ध्यान श्री रघुबीर का ॥
(३)
राखे जटा जिन्ह माथ मैं, वीभूति लाये गात मैं ।
तिरतूल तैंगी हाथ मैं, छाड़ेउ सकल सुख धाम का ॥
भावै जहाँ जावैं तहाँ, पुर बीच में आवैं नहीं ।
रुद्राच्छ का माला गरे, आला१ बिछावन चाम का ॥
दसहूँ दिसा जिन्ह घूमि कै, कीन्हेउ प्रदक्षिण२ भूमि कै।
फिरि मौन होइ बैठेउ तज्यो, मजकूर दौलत दाम का३ ॥
करि जोग देहीं जारते, हरतार पारा मारते ।
यह भी न दूलन खूबहै, करु ध्यान स्यामा स्याम का ॥
॥ मिश्रित ॥
(१)
साहिब अपने पास हो, कोइ दरद सुनावै ॥ टेक ॥
साहिब जल थल घट घट व्यापत, धरती पवन अकास हो॥१
नीची अटरिया की ऊँची दुवरिया, दियना बरत अकास हो।२
सखिया इक पैठो जल भीतर, रटत पियास पियास हो ॥३॥
मुख नहिं पिये चिरुआ नहिं पीयै, नैनन पियत हुलास हो॥४
साँईं सरवर४ साँईं जगजीवन५, चरनन दूलनदास हो ॥५॥
(२)
नीक न लागे बिनु भजन सिंगरवा ॥ टेक ॥
का कहि अयौ हियाँ बरत्यो नाहीं,
भूलि गयल तोरा कौल करारवा ॥ १ ॥
(१) उत्तम । (२) फेरा । (३) फिर मौन (चुप) साध कर बैठे और धन दौलत की चर्चा छोड़ दी । (४) तालाब । (५) संसार के प्राण-आधार ।
२२

१४० शब्द संग्रह
साचा रँग हिये उपजत नाहीँ,
भेष बनाय रँग लीन्हो कपरवा ॥ २ ॥
बिन रे भजन तोरी ई गति होइहै,
बाँधल जैबे तू जम के दुवरवा ॥ ३ ॥
दुलनदास के साइँ जगजीवन,
हरि के चरन पर हमरो लिलरवा ॥ ४ ॥
बुल्ला साहिब
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १४०]
॥ गुरुदेव ॥
बलि हौँ बलि हौँ सतगुरु की ॥ टेक ॥
जिन ध्यान दियो परमेसुर को ।
त्रिकुटी संगम जिन राह निवेरी ॥ १ ॥
प्रेम बिलास अकास मैं बास है ।
आवागवन रहित भौ फेरी ॥ २ ॥
अनहद बाजे झनकार कि बानी ।
बिन सरवन तहँ सुनत है टेरी ॥ ३ ॥
बुल्ला हिरदे विचारि बोलै ।
ब्रह्म ज्ञान कि बात सुनो मेरी ॥ ४ ॥
॥ नाम ॥
साईँ के नाम की बलि जावैँ ।
सुमिरत नाम बहुत सुख पायो, अंत कतहूँ नहिँ ठाँव ॥१॥
नाम बिना मन स्वान मँजारी,१ घर घर चित लै जाँव ॥२॥
(१) कुत्ता बिल्लो ।

बुल्ला साहिब १७१
बिन दरसन परसन मन कैसा, ज्यों लूले को गाँव१ ॥३॥
पवन मयानी हिरदै ढूँढ़ो, तब पावै मन ठाँव ॥४॥
जन बुल्ला बोलहि कर जोरे, सतगुरु चरन समाँव ॥५॥
॥ अनहद शब्द ॥
(१)
सोहं हंसा लागलि डोर ।
सुरति निरति चढु मनवाँ मोर ॥ १ ॥
झिलिमिलि झिलिमिलि त्रिकुटी ध्यान ।
जगमग जगमग गगन तान ॥ २ ॥
गह गह गह अनहद निसान ।
प्रान-पुरुष तहँ रहत जान ॥ ३ ॥
लहरि लहरि उठि पच्छित्र२ घाट ।
फहरि फहरि चल उत्तर बाट ॥ ४ ॥
सेत बरन तहँ आवै आप ।
कह बुल्ला सोइ माइ बाप ॥ ५ ॥
(२)
अरिल
स्याम घटा घन घेरि चहूँ दिसि आइया ।
अनहद बाजे घोर जो गगन सुनाइया ॥
दामिनि दमकि जो चमकि त्रिवेनी न्हाइया ।
बुल्ला हृदै विचार तहाँ मन लाइया ॥
(३)
अरिल
साम्हिं उगवे सूर भोर ससि जागई ।
गंग जमुन के संगम अनहद बाजई ॥
(१) जिस तरह लूला अपने पैरों से चल कर गाँव (मुक़ाम) को नहीं पहुँच
सकता इसी तरह बिना नाम के दरस परस के मन की हालत है यानी अंतर मैं
चाल नहीं चलती। (२) पच्छिम।

१७२ शब्द संग्रह
अजपा जापहिँ जाप सोहं डोरि लागई ।
बुल्ला ता मैं पैठि जोति मैं गाजई ॥
॥ विरह ॥
(१)
देखो पिया काली घटा मो पै भारी ॥ १ ॥
सूनी सेज भयावन लागी, मरौँ विरह की जारी ॥ २ ॥
प्रेम प्रीति यहि रीति चरन लगु, पल छिन नाहिँ विसारी ॥३
चितवत पंथ अंत नहिं पायो, जन बुल्ला बलिहारी ॥४॥
(२)
नैना मोरे निपट बिकट ठौर अटके ॥ १ ॥
सुख को साथ सबै कोइ चाहे, दुखहिँ परे पर छुटके ॥२॥
भौंह कमान नैन दोउ गाँसी, जहाँ लगे तहँ लटके ॥३॥
जन बुल्ला दाया सतगुरु की, देखु सकल जग भटके ॥४॥
॥ प्रेम ॥
(१)
साची भक्ति गोपाल की, मेरो मन माना ।
मनसा बाचा कर्मना, सुनु संत सुजाना ॥ १ ॥
लँगरा लुंजा है रहो, बहिरा अरु काना ।१
राम नाम सौं खेल है, दीजै तन दाना ॥ २ ॥
भक्ति हेतु गृह छोड़िये, तजि गर्व गुमाना ।
जन बुल्ला पायो बाक² है, सुमिरो भगवाना ॥ ३ ॥
(२)
या बिधि करहु आपुहिँ पार ।
जस मोन जल की प्रीति जानै, देखु आपु विचार ॥ १ ॥
(१) मन को बहिरमुख धावना बंद करो तब मालिक की ओर अंतर में
चाल चलेगी । (२) बचन ।

बुल्ला साहिब १७३
जस सीप रहत समुद्र माहीं, गहत नाहिन बार¹ ।
वा की सुरत आकास लागी, स्वाँति बुंद अधार ॥ २ ॥
(जस) चकोर चन्द साँ दृष्टि लावै, अहार करत अँगार ।
दहत नाहिन पान कीन्हे, अधिक होत उजार² ॥ ३ ॥
कीट भृंग की रहनि जानो, जाति पाँति गँवाय ।
वरन अबरन एक मिलि भे, निरंकार समाय ॥ ४ ॥
(अस) दास बुल्ला आस निरखहि, राम चरन अपार ।
देहु दरसन मुक्ति परसन, आवागवन निवार ॥ ५ ॥
॥ बेहद ॥
(१)
प्रभु निराधार अधार उज्जल, बिन्दु सकल बिराजई ।
अनन्त रूप सरूप तेरो, मो पै बर्रनि न जावई ॥ १ ॥
बाँधि पवनहिँ साधि गगनहिँ, गरज गरज सुनावई ।
तहँ हंस मुनि जन चूगते मनि, रस परसि परसि अघावई ॥२
बिना कर मुख बेनु³ बाजै, बीन सत्र

१७४ शब्द संग्रह
गगन मँडल महँ निरतन होय, सतगुरु मिलै तो देखै सोय॥३
आठ पहर जन बुल्ला गाजै, भक्ति भाव माथे पर छाजै ॥४॥
॥ बिनती ॥
(१)
अब कि बार मो पै होहु दयाल, रोम रोम जन होइ निहाल१
जन बिनवै अ ठौपहवार१, तुम्हरे चरन पर आपा वार॥२॥
तुम तौ राम हहु निरगुन सार, मोरे हिये महँ तुम आधार३
तुम बिन जीवन कौने काज, बार बार मो को आवै लाज ।४
सतगुरू चरनन, साज समाज, बुल्ला माँगे भक्तो राज ॥५॥
(२)
ऐसो बिनय सुनहु अबिनासी ।
अब की बार काटहु जम फाँसी ॥ १ ॥
'भया प्रकास मिटा अँधियारा ।
आदि अंत मध भो उजियारा ॥ २ ॥
रूप रेख तहँ बरनि न जासी ।
निरंकार आपुहिँ अबिनासी ॥ ३ ॥
जन बुल्ला तहँ रहे हजूरा ।
पूरन ब्रह्म देखा जहँ नूरा ॥ ४ ॥
॥ भेद ॥
सुखमनि सुरति डोरी बनाव ।
मेटिहै सब कर्म जिय के, बहुरि इतहिँ न आव ॥ १ ॥
पैठि अँदर देखु कंदर२, जहाँ जिय को बास ।
उलटि प्रान अपान मेटो, सेत सबद निवास ॥ २॥
गंग जमुना मिलि सरसुती, उमँगि सिखर बहाव ।
लवकंति३ त्रिजुली दामिनी, अनहद गरज् सुनाव ॥ ३ ॥
(१) पहर। (२) गुफा । (३) चमकती है ।

बुल्ला साहिब १७५
जीति आया आपहीं, गुरु यारि सबद् सुनाव ।
तब दास बुल्ला भक्ति ठाना, सदा रामहिं गाव ॥ ४ ॥
॥ उपदेश ॥
(१)
बटोही खोजहु क्यौँ नहिँ आप, सुमिरहु अजपा जाप॥टेक॥
बिन खोजे कहुँ राह न पैहौ, कोटिन करहु बिलाप ॥१॥
निकटहिं राम नाम अभि अंतर, जानहि जाहि मिलाप॥२॥
हाजिर हजूर त्रिवेनी संगम, झिलमिलि नूर जो जाप ॥३॥
जन बुल्ला महबूब नूर मैं, यारी पीर१ प्रताप ॥ ४ ॥
(२)
होली
होरी खेलो रंग भरी, सब सखियन संग लगाई । टेक॥
फागुन आयो मास अनँद भो, खेलि लेहु नर नारी ।
ऐसा समय बहुरि नहिँ पैहो, जैहे जनम जुआ हारी ॥१॥
तीर त्रिवेनी होरी खेलो, अनहद डंक बजाई ।
ब्रह्मा विस्नु महेस तिनौँ जन, रहे चरन लपटाई ॥२॥
बनि बनि आवैँ दरस दिखावैँ, अदुभुत कला बनाई ।
जन बुल्ला ऐसि होरी खेले, रहे नाम लौ लाई ॥ ३ ॥
(३)
अरिल
मुरगी यह संसार चेहुँ चेहुँ करत है ।
आतम राम को नाम हृदै नहिँ धरत है ॥
बिना राम नहिँ मुक्ति झूठ सच कहत है ।
बुल्ला हृदै बिचारि राम सँग रहत है ॥
(१) गुरू ।

केशवदास जी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १४१ ]
॥ चितावनी ॥
कवित्त
दौलत निसान बान घरे खुदी अभिमान,
करत न दाया काहू जीव की जगत मैं ।
जानत है नीके यह फीको है सकल रंग,
गहे फिरै काल फंद मारैगो छिनक मैं ॥
घेरा डेरा गज बाजि१ झूठो है सकल साजि,
बादि२ हरि नाम कोऊ काज नाहिं अंत कै ।
बार बार कहौं तोहि छोडु मान माया मोह,
केसो काहे को करै छोभ मोह काम कै ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
निरमल कंत संत हम पाया ।
कोटि सूर जा की निर्मल काया ॥ १ ॥
प्रेम बिलास अमृत रस भरिया ।
अनुभौ चँवर रैन दिन ढुरिया ॥ २ ॥
आनँद मंगल सोहं गावैं ।
सुख सागर प्रभु कंठ लगावैं ॥ ३ ॥
सत्य पुरुष धुनि अति उजियारी ।
कोटि भानु ससि छबि पर वारी ॥ ४ ॥
तेज पुंज निर्गुन उजियारा ।
कह केसो सोइ कंत हमारा ॥ ५ ॥
(१) घोड़ा । (२) सिवाय ।

केशवदास जी १७७
(२)
पिय थारे रूप भुलानी हो ।
प्रेम ठगौरी मन हरो, बिन दाम बिकानी हो ॥ १ ॥
भँवर कँवल रस बोधिया, सुख स्वाद बखानी हो ।
दीपक ज्ञान पतंग सौं, मिलि जोति समानी हो ॥ २ ॥
सिंधु भरा जल पूरना, सुख सीप समानी हो ।
स्वाँति बुंद सौं हेतु है, ऊरध-मुख आनी हो ॥ ३ ॥
नैन स्रवन मुख नासिका, तुम अंतर जानी हो ।
तुम बिन पलक न जीजिये, जस मीन रु पानी हो ॥४॥
व्यापक पूरन दसौ दिसि, परगट पहिचानी हो ।
केसो यारी गुरु मिले, आतम रति मानी हो ॥ ५ ॥
(३)
म्हारे हरिजु सूं जुरलि सगाई हो ।
तन मन प्रान दान दै पिया को, सहज सरूपम पाई हो ॥१॥
अरध उरध के मध्य निरंतर, सुखमन चौक पुराई हो ।
रवि ससि कुंभक अमृत भरिया, गगन मँडल मठ छाई हो॥२
पाँच सखी मिलि मंगल गावाहिं, आनंद तूर बजाई हो ।
प्रेम तत्त दीपक उँजियारो, जगमग जोति जगाई हो ॥३॥
साध संत मिलि कियो बसीठी¹, सतगुरु लगन लगाई हो ।
दरस परस पतिबरता पिव की, सिव घर सक्ति बसाई हो॥४
अमर सुहाग भाग उँजियारो, पूर्व प्रीति प्रगटाई हो ।
रोम रोम मन रस के बसि भइ, केसो पिय मन भाई हो॥५॥
(१) दूत या बिचौलिया का काम
२२

१७८ सब्द संग्रह
॥ घट मठ ॥
धनि सो घरी धनि बार, जबहिँ प्रभु पाइये ।
प्रगट प्रकास हजूर, दूर नहिँ जाइये ॥ १ ॥
नहिँ जाइ दूर हजूर साहिब, फूलि सब तन मैँ रह्यो ।
अमर अक्षय सदा जुगन जुग, जक्त दीपक उगि रह्यो ॥२॥
निरखी दसव दिसि सर्व सोभा, कोटि चंद सुहावनं ।
सदा निरभय भज नित सुख, सोई केसौ ध्यावनं ॥३॥
पूरन सर्व निधान, जानि सोइ लीजिये ।
निर्मल निर्गुन कंत, ताहि चित दीजिये ॥ ४ ॥
दीजिये चित रीझि कै उत, बहुरि इतहिँ न आइये ।
जहँ तेज पुंज अनंत सूरज, गगन मैँ मठ छाइये ॥ ५ ॥
लये घट पट खोलि कै प्रभु, अगम गति तब गति करी ।
बढ़ा अधिक सुहाग केसा, बीछुरत नहिँ इक घरी ॥६॥
अदभुत भेष बनाय, अलेख मनाइये ।
निसु बासर करि प्रेम, तो कंठ लगाइये ॥ ७ ॥
लाइये घट छाड़ि कै मठ, उमँगि सोहं भरि रहो ।
बढ़ो अधिक सुहाग सुंदरि, अलख स्वामी रमि रह्यो ॥८॥
मिलो प्रभू अनूप उदै अति, सर्व गति जा सौँ भई ।
आदि अंत रु मध्य सोई, मिलि पिया केसो मई ॥ ९ ॥
फूलि रह्यो सब ठाँव, तो धरनि अकास मैँ ।
सो त्रिभुवन-पति नाथ, निरखि लयो आप मैँ ॥१०॥
निरखि आपु अघात नाहीं, सकल सुख रस सानिये ।
पिवहि अमृत सुरति भर करि, संत बिरला जानिये ॥११॥

चरनदासजी १७६
कोटि बिस्नु अनंत ब्रह्मा, सदा सिव जेहि ध्यावहीं।
सोइ मिला सहज सरूप केसो, अनँद मंगल गावहीं॥१२॥
चरनदासजी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १४२]
॥ गुरुदेव ॥
(१)
गुरु बिन और न जान, मान मेरा कहो।
चरनदास उपदेस, विचारत ही रहो ॥१॥
बेद रूप गुरु होहिं, कि कथा सुनावहीं।
पंडित को धरि रूप, कि अर्थ बतावहीं ॥२॥
कल्पवृच्छ गुरुदेव, मनोरथ सब सरैं।
कामधेनु गुरुदेव, छुधा तृस्ना हरैं ॥३॥
गुरु ही सेस महेस, तोहि चेतन करैं।
गुरु ब्रह्मा गुरु बिस्नु, हाथ खाली भरैं ॥४॥
गंगा सम गुरु होय, पाप सब धोवहीं।
सूरज सम गुरु होय, तिमिर हरि¹ लेवहीं ॥५॥
गुरु ही को करु ध्यान, नाम गुरु को जपौ।
आपा दीजै भेंट, पुजन गुरु ही थपौ ॥६॥
समरथ खो सुकदेव, कहा महिमा करौं।
अस्तुति कही न जाय, सीस चरनन धरौं ॥७॥
(१) खींच।

१८० शब्द संग्रह
(२)
गुरु दूती¹ बिन हे सखी, पीव न देखो जाय ।
भावै तुम जप तप करि देखौ, भावै तीरथ न्हाय ॥ १ ॥
पाँच सखी पच्चीस सहेली, अति चतुर अधिकाय ।
मोहिं अयानी जानि कै, मेरो बालम लियो लुकाय²॥२॥
बेद पुरान सबै जो ढूँढ़े, स्रुति सिमरित सब धाय ।
आन धर्म औ क्रिया कर्म मैं, दीन्हो मोहिं भरमाय ॥३॥
भटकत भटकत जनमै हारी, चरन सखी गहे आय ।
सुकदेव साहिब किरपा करिकै, दीन्हो अलख लखाय ॥४॥
देखत ही सब भ्रम भय भागे, सिर सूँ गई बलाय ।
चरनदास जब प्रीतम पायो, दरसन कियो अघाय ॥५॥
॥ अनहद शब्द ॥
(१)
अनहद सबद अपार दूर सूँ दूर है ।
चेतन निर्मल सुद्ध दैह भरपूर है ॥ १ ॥
निःअच्छर है ताहि और निःकर्म है ।
परमातम तेहि मानि वही परब्रह्म है ॥ २ ॥
या के कीन्हे ध्यान होत है ब्रह्म हीं ।
धारै तेज अपार जाहिँ सब भर्म हीं ॥ ३ ॥
या को छोड़ै नाहिं सदा रहै लीन हीं ।
यही जो अनहद सार जानि परबीन हीं ॥ ४ ॥
(२)
जब से अनहद घोर सुनी ।
इन्द्री थकित गलित मन हूवा, आसा सकल भुनी ॥१॥
घूमत नैन सिथिल भइ काया, अमल जु सुरत सनी ।
रोम रोम आनंद उपज करि, आलस सहज भनी ॥२॥
(१) बिचौलिया । (२) छिपाय ।

चरनदासजी १८१
मतवारे ज्यौं सबद समाये, अंतर भींज कनी ।
करम भरम के बंधन छूटे, दुबिधा त्रिपत्ति हनी ॥३॥
आपा बिसरि जक्त कूँ बिसरो, कित रहिं पाँच जनी ।
लोक भोग सुधि रही न कोई, भूले ज्ञान गुनी ॥४॥
हो तहँ लीन चरनहीं दासा, कहैं सुकदेव मुनी ।
ऐसा ध्यान भाग सूँ पैये, चढ़ि रहै सिखर अनी¹ ॥५॥
॥ चितावनी ॥
(१)
अरे नर हरि का हेत न जाना ।
उपजाया सुमिरन के काजे, तैं कछु औरै ठाना ॥१॥
गर्भ माहिँ जिन रच्छा कीन्ही, ह्वाँ खाने कूँ दीन्हा ।
ज़ठर अगिन सोँ राखि लियो है, अँग संपूरन कीन्हा ॥२॥
बाहर आय बहुत सुधि लीन्ही, दसन² बिना पय प्यायो।
दाँत भये भोजन बहु भाँती, हित सोँ तोहिँ खिलायो ॥३॥
और दिये सुख नाना बिधि के, समुझि देखु मन माहीं ।
भूलो फिरत महा गर्वायो, तू कछु जानत नाहीं ॥४॥
तुव कारन सब कछु प्रभु कीन्हो, तू कीन्हा निज काजा ।
जग व्यौहार पगे ही बोले, तोहि न आवै लाजा ॥५॥
अजहूँ चेत उलट हरि साँही³, जन्म सुफल करु भाई ।
चरनदास सुकदेव कहैं यौं, सुमिरन है सुखदाई ॥६॥
(२)
कछु मन तुम सुधि राखौ वा दिन की ।
जा दिन तेरी देह छुटैगी, ठौर बसौगे बन की ॥१॥
जिन के संग बहुत सुख कीन्हे, मुख ढकि ह्वैहैं न्यारे ।
जम का त्रास होय बहु भाँती, कौन छुटावनहारे ॥२॥
(१) नोक । (२) दाँत । (३) ओर, तरफ़ ।

१८२ शब्द संग्रह
देहरी लौं तेरी नारि चलैगी, बड़ी पौरि लौं माई ।
मरघट लौं सब बीर भतीजे, हंस अकेलो जाई ॥३॥
द्रव्य गड़े अरु महल खड़े ही, पूत रहैं घर माहीं ।
जिन के काज पचे दिन राती, सो सँग चालत नाहीं ॥४॥
देव पितर तेरे काम न आवैं, जिन की सेवा लावै ।
चरनदास सुकदेव कहत ह, हरि बिन मुक्ति न पावै ॥५॥
(३)
अपना हरि बिन और न कोई ।
मातु पिता सुत बंधु कुटुँब सब, स्वारथ ही के होई ॥१॥
या काया कूँ भोग बहुत दै, मरद्दन करि करि धोई ।
सो भी छूटत नेक तनिक सी, संग न चाली खोई ॥२॥
घर की नारि बहुत ही प्यारी, तिन मैं नाहीं दोई१ ।
जीवत कहती साथ चलूँगी, डरपन लागी सोई ॥३॥
जो कहिये यह द्रव्य आपनो, जिन उज्जल मति खोई।
आवत कष्ट रखत रखवारी, चलत प्रान ले जोई ॥४॥
या जग में कोइ हितू न दीखै, मैं समझाऊँ तोई ।
चरनदास सुकदेव कहैं यौं, सुनि लीजै नर लोई ॥५॥
॥ बिरह ॥
(१)
सुधि बुधि सब गइ खोय री, मैं इश्क दिवानी ।
तलफत हूँ दिन रैन ज्यौँ, मछली बिन पानी ॥ १ ॥
बिन देखे मोहिँ कल न परत है, देखत आँख सिरानी२।
सुधि आये हिय मैं दव३ लागै, नैनन बरखत पानी ॥२॥
जैसे चकोर रटत चंदा को, जैसे पपिहा स्वाँती ।
ऐसे हम तलफत पिय दरसन, बिरह बिथा यहि भाँती ॥३॥
(१) एक जान दो क़ालिब । (२) सीतल हुई । (३) आग ।