संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूलनदासजी १६३
और कछू हम चाहित नाहीं, तुम्हारे नाम चरन तैं काज ॥३॥
दूलनदास गरीब निवाजहु, साईँ जगजीवन महराज ॥४॥
(२)
साईँ दरस माँगौँ तोर, अपने जन जानि साईँ मान राखहु मोर ॥१॥
अपथ१ पंथ न सूझि इत उत, प्रबल पाँचो चोर ।
भजन केहि विधि करौँ साईँ, चलत नाहीं जोर ॥ २ ॥
नात लाइ दुरात२ काहे, पतित जन की दौर ।
बचन अवधि३ अधार मेरे, आसरा नहिं और ॥ ३ ॥
हेरिये करि कृपा जन तन, ललित४ लोचन कोर ।
दास दूलन सरन आयो, राम बंदी-छोर ॥ ४ ॥
(३)
साईँ तेरे कारन नैना भये बैरागी ।
तेरा सत दरसन चहौँ, कछु और न माँगौ ॥ १ ॥
निसु बासर तेरे नाम की, अंतर धुनि जागी ।
फेरत हौँ माला मनौँ५, अँसुवन भरि लागी ॥ २ ॥
पलक तजी इत उक्ति तैँ६, मन माया त्यागी ।
दृष्टि सदा सत सनमुखी, दरसन अनुरागी ॥ ३ ॥
मदमाते राते मनौँ५, दाधे बिरह आगी ।
मिलि प्रभु दूलनदास के, करु परम सुभागी ॥ ४ ॥
(४)
सुनहु दयाल मोहिँ अपनावहु ॥ टेक ॥
जन मन लगन सुधारन साईँ, मोरि बनै जो तुम्हहिँ बनावहु१
इत उत चित्त न जाइ हमारा, सूरत चरन कमल लपटावहु॥२
तबहूँ अब मैं दास तुम्हारा, अर्ज जिनि बिसरै। जिनि बिसरावहु॥३
दूलनदास के साईँ जगजीवन, हमहूँ कौँ भक्तन माँ लावहु॥४
(१) कुराह। (२) हटाते हो। (३) प्रतिज्ञा। (४) सुंदर, मोहनी। (५) गोया
कि। (६) इधर अर्थात संसार की चतुरता (उक्ति) की ओर से आँख मूँद ली।