संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 183, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें१७४ शब्द संग्रह
गगन मँडल महँ निरतन होय, सतगुरु मिलै तो देखै सोय॥३
आठ पहर जन बुल्ला गाजै, भक्ति भाव माथे पर छाजै ॥४॥
॥ बिनती ॥
(१)
अब कि बार मो पै होहु दयाल, रोम रोम जन होइ निहाल१
जन बिनवै अ ठौपहवार१, तुम्हरे चरन पर आपा वार॥२॥
तुम तौ राम हहु निरगुन सार, मोरे हिये महँ तुम आधार३
तुम बिन जीवन कौने काज, बार बार मो को आवै लाज ।४
सतगुरू चरनन, साज समाज, बुल्ला माँगे भक्तो राज ॥५॥
(२)
ऐसो बिनय सुनहु अबिनासी ।
अब की बार काटहु जम फाँसी ॥ १ ॥
'भया प्रकास मिटा अँधियारा ।
आदि अंत मध भो उजियारा ॥ २ ॥
रूप रेख तहँ बरनि न जासी ।
निरंकार आपुहिँ अबिनासी ॥ ३ ॥
जन बुल्ला तहँ रहे हजूरा ।
पूरन ब्रह्म देखा जहँ नूरा ॥ ४ ॥
॥ भेद ॥
सुखमनि सुरति डोरी बनाव ।
मेटिहै सब कर्म जिय के, बहुरि इतहिँ न आव ॥ १ ॥
पैठि अँदर देखु कंदर२, जहाँ जिय को बास ।
उलटि प्रान अपान मेटो, सेत सबद निवास ॥ २॥
गंग जमुना मिलि सरसुती, उमँगि सिखर बहाव ।
लवकंति३ त्रिजुली दामिनी, अनहद गरज् सुनाव ॥ ३ ॥
(१) पहर। (२) गुफा । (३) चमकती है ।