संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूलनदासजी १६५
धोती उपरना अंग मैं, रत बेद विद्या रंग मैं ।
विद्यार्थी बहु संग मैं, जिन्ह वास तीरथ तीर का ॥
सूतहिं सदा भुइँ सेज जे, पूरे तपस्या तेज के ।
यह भी न दूलन खूब है, करु ध्यान श्री रघुबीर का ॥
(३)
राखे जटा जिन्ह माथ मैं, वीभूति लाये गात मैं ।
तिरतूल तैंगी हाथ मैं, छाड़ेउ सकल सुख धाम का ॥
भावै जहाँ जावैं तहाँ, पुर बीच में आवैं नहीं ।
रुद्राच्छ का माला गरे, आला१ बिछावन चाम का ॥
दसहूँ दिसा जिन्ह घूमि कै, कीन्हेउ प्रदक्षिण२ भूमि कै।
फिरि मौन होइ बैठेउ तज्यो, मजकूर दौलत दाम का३ ॥
करि जोग देहीं जारते, हरतार पारा मारते ।
यह भी न दूलन खूबहै, करु ध्यान स्यामा स्याम का ॥
॥ मिश्रित ॥
(१)
साहिब अपने पास हो, कोइ दरद सुनावै ॥ टेक ॥
साहिब जल थल घट घट व्यापत, धरती पवन अकास हो॥१
नीची अटरिया की ऊँची दुवरिया, दियना बरत अकास हो।२
सखिया इक पैठो जल भीतर, रटत पियास पियास हो ॥३॥
मुख नहिं पिये चिरुआ नहिं पीयै, नैनन पियत हुलास हो॥४
साँईं सरवर४ साँईं जगजीवन५, चरनन दूलनदास हो ॥५॥
(२)
नीक न लागे बिनु भजन सिंगरवा ॥ टेक ॥
का कहि अयौ हियाँ बरत्यो नाहीं,
भूलि गयल तोरा कौल करारवा ॥ १ ॥
(१) उत्तम । (२) फेरा । (३) फिर मौन (चुप) साध कर बैठे और धन दौलत की चर्चा छोड़ दी । (४) तालाब । (५) संसार के प्राण-आधार ।
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