संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबुल्ला साहिब १७५
जीति आया आपहीं, गुरु यारि सबद् सुनाव ।
तब दास बुल्ला भक्ति ठाना, सदा रामहिं गाव ॥ ४ ॥
॥ उपदेश ॥
(१)
बटोही खोजहु क्यौँ नहिँ आप, सुमिरहु अजपा जाप॥टेक॥
बिन खोजे कहुँ राह न पैहौ, कोटिन करहु बिलाप ॥१॥
निकटहिं राम नाम अभि अंतर, जानहि जाहि मिलाप॥२॥
हाजिर हजूर त्रिवेनी संगम, झिलमिलि नूर जो जाप ॥३॥
जन बुल्ला महबूब नूर मैं, यारी पीर१ प्रताप ॥ ४ ॥
(२)
होली
होरी खेलो रंग भरी, सब सखियन संग लगाई । टेक॥
फागुन आयो मास अनँद भो, खेलि लेहु नर नारी ।
ऐसा समय बहुरि नहिँ पैहो, जैहे जनम जुआ हारी ॥१॥
तीर त्रिवेनी होरी खेलो, अनहद डंक बजाई ।
ब्रह्मा विस्नु महेस तिनौँ जन, रहे चरन लपटाई ॥२॥
बनि बनि आवैँ दरस दिखावैँ, अदुभुत कला बनाई ।
जन बुल्ला ऐसि होरी खेले, रहे नाम लौ लाई ॥ ३ ॥
(३)
अरिल
मुरगी यह संसार चेहुँ चेहुँ करत है ।
आतम राम को नाम हृदै नहिँ धरत है ॥
बिना राम नहिँ मुक्ति झूठ सच कहत है ।
बुल्ला हृदै बिचारि राम सँग रहत है ॥
(१) गुरू ।