संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ शब्द संग्रह
गौरि गनेस औ सेष रटत जेहिँ, नारद सुक१ सनकादि पुकार ।
चारिहुमुख जेहिँ रटत बिधाता२, संभूराज सिव मन सिंगार ४
(२)
भक्तन राम चरन धुनि लाई ॥ टेक ॥
चारिहु जुग गोहारि प्रभु लागे, जब दासन गोहराई ॥१॥
हिरनाकुस रावन अभिमानी, छिन माँ खाक मिलाई ॥२॥
अबिचल भक्ति नाम की महिमा, कोऊ न सकत मिटाई ॥३॥
कोउ उसवास३ न एकै मानहु, दिन दिन की दिनताई ॥४॥
दुलनदास के साइँ जगजीवन, है सतनाम दुहाई ॥ ५ ॥
॥ झूलना ॥
(१)
पंखा चँवर मुरछल ढुरैँ, सूबा सबै खिजमत करैँ ।
जरबफ़ को तंबू तन्यो, बैठक बन्यो मसनंद का ॥
दिन रात झाँझरि बाजती, सुथरी सहेली नाचती ।
पिलसूज४ आगे योँ जलै, उजियार मानौ चंद का ॥
एकै अतर चोवा चमेली, बेला खुसबोई लिये ।
एकै कटोरे मैं किये, सरबत सलोना कंद का ॥
हिन्दू तुरुक दुइ दीन आलम, आपनी ताबीन५ मैं ।
यह भी न दूलन खूब है, करु ध्यान दसरथ-नंद का ॥
(२)
बर६ जे अठारह बरन मैं, बितपन्न७ ह ब्याकरन मैं ।
पहिरे खराऊँ चरन मैं, जानैँ न स्वाद सरीर का ॥
कुस मुद्रिका कर राखते, जे देव-बानी भाखते ।
नहिँ अन्न आमिष८ चाखते, नित पान करते छीर का ॥
(१) सुकदेव । (२) ब्रह्मा । (३) संशय । (४) पतील-सोज़ यानी चौमुखी
दीवट । (५) ताबेदारी । (६) श्रेष्ठ । (७) प्रवीन, कुशल । (८) मांस ।