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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

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बुल्ला साहिब १७१
बिन दरसन परसन मन कैसा, ज्यों लूले को गाँव१ ॥३॥
पवन मयानी हिरदै ढूँढ़ो, तब पावै मन ठाँव ॥४॥
जन बुल्ला बोलहि कर जोरे, सतगुरु चरन समाँव ॥५॥
॥ अनहद शब्द ॥
(१)
सोहं हंसा लागलि डोर ।
सुरति निरति चढु मनवाँ मोर ॥ १ ॥
झिलिमिलि झिलिमिलि त्रिकुटी ध्यान ।
जगमग जगमग गगन तान ॥ २ ॥
गह गह गह अनहद निसान ।
प्रान-पुरुष तहँ रहत जान ॥ ३ ॥
लहरि लहरि उठि पच्छित्र२ घाट ।
फहरि फहरि चल उत्तर बाट ॥ ४ ॥
सेत बरन तहँ आवै आप ।
कह बुल्ला सोइ माइ बाप ॥ ५ ॥
(२)
अरिल
स्याम घटा घन घेरि चहूँ दिसि आइया ।
अनहद बाजे घोर जो गगन सुनाइया ॥
दामिनि दमकि जो चमकि त्रिवेनी न्हाइया ।
बुल्ला हृदै विचार तहाँ मन लाइया ॥
(३)
अरिल
साम्हिं उगवे सूर भोर ससि जागई ।
गंग जमुन के संगम अनहद बाजई ॥
(१) जिस तरह लूला अपने पैरों से चल कर गाँव (मुक़ाम) को नहीं पहुँच
सकता इसी तरह बिना नाम के दरस परस के मन की हालत है यानी अंतर मैं
चाल नहीं चलती। (२) पच्छिम।