संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ शब्द संग्रह
अजपा जापहिँ जाप सोहं डोरि लागई ।
बुल्ला ता मैं पैठि जोति मैं गाजई ॥
॥ विरह ॥
(१)
देखो पिया काली घटा मो पै भारी ॥ १ ॥
सूनी सेज भयावन लागी, मरौँ विरह की जारी ॥ २ ॥
प्रेम प्रीति यहि रीति चरन लगु, पल छिन नाहिँ विसारी ॥३
चितवत पंथ अंत नहिं पायो, जन बुल्ला बलिहारी ॥४॥
(२)
नैना मोरे निपट बिकट ठौर अटके ॥ १ ॥
सुख को साथ सबै कोइ चाहे, दुखहिँ परे पर छुटके ॥२॥
भौंह कमान नैन दोउ गाँसी, जहाँ लगे तहँ लटके ॥३॥
जन बुल्ला दाया सतगुरु की, देखु सकल जग भटके ॥४॥
॥ प्रेम ॥
(१)
साची भक्ति गोपाल की, मेरो मन माना ।
मनसा बाचा कर्मना, सुनु संत सुजाना ॥ १ ॥
लँगरा लुंजा है रहो, बहिरा अरु काना ।१
राम नाम सौं खेल है, दीजै तन दाना ॥ २ ॥
भक्ति हेतु गृह छोड़िये, तजि गर्व गुमाना ।
जन बुल्ला पायो बाक² है, सुमिरो भगवाना ॥ ३ ॥
(२)
या बिधि करहु आपुहिँ पार ।
जस मोन जल की प्रीति जानै, देखु आपु विचार ॥ १ ॥
(१) मन को बहिरमुख धावना बंद करो तब मालिक की ओर अंतर में
चाल चलेगी । (२) बचन ।