संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 175, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ शब्द संग्रह
नाम सनेही बावरे, दृग भरि भरि आवत नीर हो ॥३॥
रस-मतवाले रस-मसे¹, यहि लागी लगन गंभीर हो ॥४॥
सखि इश्क पिया से आसिकाँ, तजि दुनिया दौलत भीर हो² ॥५॥
सखि गोपीचन्दा भरथरी, सुलताना भयो फकीर हो ॥६॥
सखि दूलन का से कहै, यह अटपटि³ प्रेम की पीर हो ॥७॥
(४)
हुआ है मस्त मंसूरा, चढ़ा सूली न छोड़ा हक़।
पुकारा इश्क़बाज़ों को, अहै मरना यही बरहक़ ॥ १ ॥
जो बोले आशिकाँ याराँ, हमारे दिल मैं है जी शक।
अहै यह काम सूराँ का, लगाये पीर से अब तक ॥ २ ॥
शम्सतबरेज़ की सीफ़त, जहाँ मैं ज़ाहिरा अब तक।
निज़ामुद्दीन सुलताना, सभी मेटे दुनी के धक ॥ ३ ॥
निरख रहे नूर अल्लह का, रहे जीते रहे जब तक।
हुआ हाफ़िज़ दिवाना भी, भये ऐसे नहीं हर यक ॥ ४ ॥
सुना है इश्क़ मजनूँ का, लगी लैला कि रहती ज़क।
जलाकर ख़ाक तन कीन्हा, हुए वह भी उसी माफ़िक़ ॥५॥
दुलन जन को दिया मुरशिद, पियाला नाम का थकथक।
वही है शाह जगजीवन, चमकता देखिये लक़लक़ ॥६॥
(५)
अब तो अफ़सोस मिटा दिल का, दिलदार दीद मैं आया है।
संताँ की सुहबत मैं रह कर, हक़ हादी को सिर नावा है॥१॥
उपदेस उग्र गहि सत्त नाम, सोइ अष्ट जाम धुनि लाया है।
मुरशिद की मेहर हुई यौं कर, मज़बूत जोश उपजाया है ॥२॥
(१) रस मैं पगे। (२) प्रेमी जन जिन की प्रीति प्रीतम से लगी है उन्हें
संसार और धन माल की चिन्ता नहीं रहती। (३) अड़बढ़, अनोखी।