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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 267 में से

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पृष्ठ 187

१७८ सब्द संग्रह
॥ घट मठ ॥
धनि सो घरी धनि बार, जबहिँ प्रभु पाइये ।
प्रगट प्रकास हजूर, दूर नहिँ जाइये ॥ १ ॥
नहिँ जाइ दूर हजूर साहिब, फूलि सब तन मैँ रह्यो ।
अमर अक्षय सदा जुगन जुग, जक्त दीपक उगि रह्यो ॥२॥
निरखी दसव दिसि सर्व सोभा, कोटि चंद सुहावनं ।
सदा निरभय भज नित सुख, सोई केसौ ध्यावनं ॥३॥
पूरन सर्व निधान, जानि सोइ लीजिये ।
निर्मल निर्गुन कंत, ताहि चित दीजिये ॥ ४ ॥
दीजिये चित रीझि कै उत, बहुरि इतहिँ न आइये ।
जहँ तेज पुंज अनंत सूरज, गगन मैँ मठ छाइये ॥ ५ ॥
लये घट पट खोलि कै प्रभु, अगम गति तब गति करी ।
बढ़ा अधिक सुहाग केसा, बीछुरत नहिँ इक घरी ॥६॥
अदभुत भेष बनाय, अलेख मनाइये ।
निसु बासर करि प्रेम, तो कंठ लगाइये ॥ ७ ॥
लाइये घट छाड़ि कै मठ, उमँगि सोहं भरि रहो ।
बढ़ो अधिक सुहाग सुंदरि, अलख स्वामी रमि रह्यो ॥८॥
मिलो प्रभू अनूप उदै अति, सर्व गति जा सौँ भई ।
आदि अंत रु मध्य सोई, मिलि पिया केसो मई ॥ ९ ॥
फूलि रह्यो सब ठाँव, तो धरनि अकास मैँ ।
सो त्रिभुवन-पति नाथ, निरखि लयो आप मैँ ॥१०॥
निरखि आपु अघात नाहीं, सकल सुख रस सानिये ।
पिवहि अमृत सुरति भर करि, संत बिरला जानिये ॥११॥